पाकिस्तान के लाहौर शहर में दो विदेशी नागरिकों के साथ हुई बंधक बनाकर वसूली और यौन उत्पीड़न की घटना में कानूनी प्रक्रिया ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया है. ट्रायल कोर्ट में पेश की गई आधिकारिक जांच रिपोर्ट में मामले के पांच रसूखदार आरोपियों को गंभीर यौन अपराधों के आरोपों से बाहर कर दिया गया है. इस निर्णय ने प्रशासनिक निष्पक्षता और राजनीतिक प्रभाव को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है, क्योंकि राहत पाने वाले व्यक्तियों में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री इशाक डार का एक पारिवारिक संबंधी भी शामिल है. पूरी न्यायिक प्रक्रिया अब इस बात को लेकर सवालों के घेरे में है कि किस तरह मुख्य साजिशकर्ताओं को बचाकर निचले स्तर के कर्मचारियों पर पूरा शिकंजा कसा गया है.
क्रिप्टोकरेंसी के नाम पर सिंगापुर से बिछाया गया था जाल
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत साल 2025 में हुई थी, जब पीड़ित विदेशी महिलाओं का संपर्क सिंगापुर में मुख्य आरोपी के साथ हुआ था. मुख्य आरोपी ने दोनों महिलाओं को क्रिप्टोकरेंसी निवेश योजना में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और बहुत कम समय में भारी वित्तीय लाभ कमाने का सब्जबाग दिखाया. शुरुआती चरणों में योजना के मुताबिक निवेशकों को अच्छा मुनाफा दिया गया, जिससे महिलाओं का इस व्यवस्था पर पूरी तरह भरोसा कायम हो गया.
इसी भरोसे के चलते एक पीड़िता ने उस योजना में 4 करोड़ रुपये से अधिक की भारी-भरकम पूंजी लगा दी. कुछ समय बीत जाने के बाद जब वादा किया गया वित्तीय रिटर्न मिलना बंद हो गया, तो महिलाओं ने अपने मूल धन की वापसी के लिए दबाव बनाना शुरू किया. आरोपी ने तुरंत पैसे लौटाने में असमर्थता जताते हुए झांसा दिया कि यदि वे जून के महीने में पाकिस्तान आएं, तो वह उनका पूरा पैसा वापस दिलवा देगा या किसी बड़े निवेशक से सीधी मुलाकात करवाकर मामले का निपटारा कर देगा.
लाहौर के रिहायशी इलाके में बंधक बनाकर वसूली
आरोपी के दिए गए भरोसे पर यकीन करके दोनों विदेशी नागरिक पाकिस्तान पहुंच गईं. इसके बाद 29 जून को उन्हें लाहौर के अत्यंत सुरक्षित और पॉश माने जाने वाले डिफेंस फेज-VII स्थित एक निजी आवास में ले जाया गया. मकान के भीतर दाखिल होते ही स्थिति पूरी तरह बदल गई और दोनों को असलहे के बल पर गैरकानूनी ढंग से बंधक बना लिया गया.
हथियारबंद लोगों ने दोनों महिलाओं को जान से मारने की धमकियां दीं और पिस्तौल तानकर उनसे लगभग 19,500 डॉलर की रकम जबरन इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से ट्रांसफर करवा ली. लगातार दो दिनों तक उन्हें प्रताड़ित किया गया और बंधक बनाकर रखा गया, जिससे वे अत्यधिक दहशत में आ गईं.
सड़क दुर्घटना बनी पीड़ितों के बचने का जरिया
बंधक बनाए जाने के बाद 1 जुलाई को आरोपी दोनों महिलाओं को किसी अन्य स्थान पर ले जाने के लिए गाड़ी में बैठाकर निकले. इसी दौरान भाटा चौक के निकट उनकी गाड़ी एक सड़क हादसे का शिकार हो गई. टक्कर के बाद मौके पर मची अफरा-तफरी और हंगामे का लाभ उठाकर दोनों विदेशी महिलाएं आरोपियों के चंगुल से बच निकलीं और सीधे स्थानीय थाने पहुंचकर अपनी आपबीती दर्ज कराई.
कानूनी शिकायत दर्ज कराने और पुलिस को जरूरी विवरण देने के बाद दोनों विदेशी महिलाएं 3 जुलाई को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए पाकिस्तान से अपने वतन के लिए रवाना हो गईं. घटना के सामने आने के बाद जांच एजेंसियों ने कार्रवाई शुरू की थी.
जांच में बरामदगी और अदालत में पेश चालान
मामले की शुरुआती पड़ताल के दौरान पुलिस तंत्र ने विभिन्न ठिकानों से रंगदारी की वसूली से जुड़े 43 लाख रुपये की नकदी जब्त की. इसके अलावा एक वाहन, कई मोबाइल फोन, एक पिस्तौल और एक राइफल भी बरामद की गई. इन पुख्ता बरामदगियों के बावजूद जब जांच का अंतिम चालान अदालत में दाखिल किया गया, तो उसके निष्कर्षों ने कानूनी जानकारों को चकित कर दिया.
पुलिस अधिकारियों ने अपनी चालान रिपोर्ट में कहा कि उप प्रधानमंत्री इशाक डार के रिश्तेदार और मुख्य गिरोह के कर्ताधर्ताओं समेत पांच प्रमुख आरोपियों के खिलाफ यौन उत्पीड़न के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं. नतीजतन उन्हें इस गंभीर आरोप से मुक्त कर दिया गया. हालांकि जांच एजेंसी ने यह स्पष्ट किया है कि इन सभी पांचों व्यक्तियों पर अवैध रूप से बंधक बनाने और रंगदारी वसूलने की धाराओं के तहत मुकदमा जारी रहेगा.
निचले स्तर के कर्मचारियों पर डाला गया पूरा दारोमदार
अदालत में पेश रिपोर्ट में सबसे अजीब बात यह सामने आई कि जिन पांच रसूखदार लोगों को यौन उत्पीड़न के आरोपों से मुक्त किया गया, उनके स्थान पर मुख्य आरोपी के यहां मामूली वेतन पर काम करने वाले तीन छोटे कर्मचारियों को यौन अपराधों का मुख्य आरोपी बना दिया गया. चालान में सारा दोष इन तीन कर्मचारियों पर मढ़ दिया गया है.
इस फेरबदल के बाद आरोपी कर्मचारियों का पक्ष रखने वाले वकीलों ने जांच तंत्र पर कड़े आक्षेप लगाए हैं. बचाव पक्ष के वकीलों का कहना है कि यह जांच निष्पक्ष नहीं है बल्कि सत्ता से जुड़े प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए तैयार किया गया एक सुनियोजित कवर-अप है. वकीलों का सीधा तर्क है कि राजनेताओं के रिश्तेदारों और साधन संपन्न लोगों को क्लीन चिट देने के लिए गरीब कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है.
फोरेंसिक नतीजों के बिना अधूरा चालान पेश करने की मजबूरी
अदालती कार्यवाही के दौरान जांच अधिकारियों ने स्वीकार किया कि अभी तक कई महत्वपूर्ण तकनीकी साक्ष्य जांच का हिस्सा नहीं बन पाए हैं. अधिकारियों के अनुसार मामले से जुड़ी अहम फोरेंसिक जांच रिपोर्ट अभी प्रतीक्षित हैं, जिनमें निम्नलिखित पहलू शामिल हैं
- घटनास्थल और वस्तुओं से उठाए गए फिंगरप्रिंट यानी उंगलियों के निशानों की वैज्ञानिक मिलान रिपोर्ट.
- आरोपियों के पॉलीग्राफ यानी लाई डिटेक्टर परीक्षण के आधिकारिक परिणाम.
- संबंधित कानूनी प्रक्रिया की धारा 164 के अंतर्गत दर्ज किए जाने वाले अदालती बयान.
इन सभी बुनियादी साक्ष्यों और वैज्ञानिक जांच परिणामों के लंबित रहने के बावजूद पुलिस ने अदालत के समक्ष अधूरा चालान दाखिल कर दिया. विधि विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के बिना दाखिल यह रिपोर्ट पूरे मामले की दिशा को प्रभावित कर सकती है.
अगली सुनवाई पर टिकी नजरें
इस पूरे प्रकरण ने देश की आपराधिक न्याय प्रणाली और राजनीतिक दखलंदाजी पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या जांच एजेंसियों ने केवल सबूतों के अभाव में यह निर्णय लिया या फिर रसूख के आगे कानून के हाथ छोटे पड़ गए, यह सवाल अनुत्तरित है. ट्रायल कोर्ट ने अब इस बहुचर्चित मुकदमे की अगली नियमित सुनवाई के लिए 11 नवंबर की तारीख तय की है, जिस दिन आगे की कानूनी कार्रवाई पर बहस होगी.



















