पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने हाल ही में हवा से हवा में प्रहार करने में सक्षम अपनी नई मिसाइल 'फाज' के सफल परीक्षण की घोषणा की है। इस रक्षा परियोजना को वहां की सैन्य संस्थाएं पूरी तरह घरेलू तकनीक पर आधारित बता रही हैं और यह दावा भी सामने आया है कि इसे तैयार करने के लिए किसी चीनी सहायता का सहारा नहीं लिया गया। पाकिस्तानी वायुसेना इस हथियार को अपने सैन्य साजो-सामान के इतिहास में एक ऐतिहासिक पड़ाव मानकर पेश कर रही है। हालांकि रणनीतिक गलियारों में यह बहस छिड़ गई है कि क्या यह प्रणाली सचमुच क्षेत्रीय हवाई संतुलन पर कोई बड़ा असर डालने की क्षमता रखती है अथवा यह केवल अपने देश की जनता का ध्यान खींचने और मनोबल ऊंचा रखने का एक औपचारिक प्रदर्शन भर है।
फाज मिसाइल का खाका और इसकी जरूरत
आधिकारिक विवरणों के अनुसार, यह लंबी दूरी तक आसमान से आसमान में वार करने वाला अस्त्र है, जिसे पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमानों पर तैनात करने के उद्देश्य से ढाला गया है। परियोजना का मुख्य मकसद सीमावर्ती इलाकों में गश्त कर रहे विरोधी लड़ाकू विमानों, जासूसी अथवा हमलावर ड्रोनों और अन्य हवाई खतरों को काफी पहले ही दूर से नष्ट करना है। अपने सैन्य तंत्र को आत्मनिर्भर दिखाने की होड़ में इस्लामाबाद ने इसे पूरी तरह अपनी मिट्टी पर विकसित प्रणाली के तौर पर प्रचारित किया है। वायुसेना के अधिकारियों का मानना है कि इस हथियार के पूरी तरह सेवा में शामिल होने के पश्चात उनकी सेना की सीमा पार दूर तक मार करने की क्षमता में काफी इजाफा दर्ज किया जाएगा।
टर्मिनल गाइडेंस सिस्टम पर सारा जोर
इस पूरे परीक्षण अभियान से जुड़ी सरकारी घोषणाओं में जिस मुख्य बिंदु का सबसे अधिक बखान किया गया है, वह इसकी आधुनिक टर्मिनल गाइडेंस प्रणाली है। किसी भी लड़ाकू विमान को निशाना बनाते समय मिसाइल का अंतिम चरण सबसे जटिल साबित होता है। हवा में उड़ रहा कोई भी आधुनिक जेट स्थिर निशाने की भांति व्यवहार नहीं करता, बल्कि वह अत्यधिक तीव्र गति से अपनी उड़ान की दिशा बदल सकता है, कलाबाजियां खा सकता है या पीछा कर रही मिसाइल को गुमराह करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स और फ्लेयर्स जैसे रक्षात्मक उपाय अपना सकता है।
टर्मिनल गाइडेंस असल में मिसाइल के भीतर लगा वह संवेदी मस्तिष्क और इलेक्ट्रॉनिक आंख है, जो अंतिम क्षणों में भी पैंतरे बदलते शत्रु विमान पर सटीक नजर टिकाए रखती है। यह तकनीक अंतिम सेकेंडों में मिसाइल के दिशा नियंत्रकों को संचालित करके उसे सीधे लक्ष्य से टकराने अथवा उसके बिल्कुल निकट पहुंचकर जोरदार विस्फोट करने का सटीक आदेश देती है। इस्लामाबाद के सैन्य प्रतिष्ठान का कहना है कि फाज के भीतर इसी परिष्कृत तकनीक को शामिल किया गया है, जिसे वे अपनी नई मिसाइल की सबसे बड़ी पूंजी मान रहे हैं।
घरेलू निर्माण का दावा या आर्थिक तंगी की विवशता
पाकिस्तान के रक्षा विश्लेषक इस बात का जमकर प्रचार कर रहे हैं कि फाज पूरी तरह स्वदेशी अनुसंधान का प्रतिफल है। इस नीतिगत बदलाव के पीछे इस्लामाबाद की दोहरी मजबूरियां स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। पहली वजह यह है कि वह बाहरी मुल्कों पर अपनी लंबी निर्भरता को सीमित करना चाहता है। बीते दशकों में पाकिस्तान अपने सैन्य बेड़े के लिए अमेरिकी, चीनी और फ्रांसीसी हथियारों तथा उपकरणों पर अत्यधिक निर्भर रहा है। इस विदेशी निर्भरता को घटाकर अपनी जमीन पर सैन्य ढांचा खड़ा करने की चाहत वहां के योजनाकारों की पुरानी नीति रही है।
दूसरी सबसे बड़ी वजह मुल्क की खस्ताहाल आर्थिक दशा और विदेशी मुद्राओं का भारी संकट है। विदेशी रक्षा कंपनियों से अत्याधुनिक और बहुमूल्य मिसाइलें खरीद पाना पाकिस्तान के लिए आर्थिक रूप से लगातार कठिन होता जा रहा है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर असेंबल या विकसित करने का प्रयास करना उनके लिए एक अनिवार्य विकल्प भी बन चुका है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय सैन्य विश्लेषक इस बात को खारिज नहीं करते कि पूरी तरह स्वदेशी कहे जाने के बावजूद इस परियोजना में चीन का अप्रत्यक्ष सहयोग अवश्य मौजूद हो सकता है। पाकिस्तान का अतीत का मिसाइल इतिहास गवाह रहा है कि उसके अधिकांश प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम बीजिंग के तकनीकी हस्तांतरण, कलपुर्जों की आपूर्ति और रिवर्स इंजीनियरिंग के बलबूते ही आगे बढ़ते रहे हैं।
बुनियादी तकनीकी आंकड़ों पर चुप्पी
परीक्षण की भव्य घोषणा के बावजूद सैन्य विशेषज्ञों की नजर में सबसे संदेहास्पद पहलू यह है कि इस मिसाइल के मूल तकनीकी आंकड़े पूरी तरह गुप्त रखे गए हैं। सार्वजनिक तौर पर यह साफ नहीं किया गया है कि फाज की वास्तविक मारक दूरी कितनी है। क्या यह मिसाइल 80 किलोमीटर तक हमला कर सकती है, 100 किलोमीटर तक मार कर सकती है या फिर इसका दायरा 150 किलोमीटर तक फैला हुआ है। इसी तरह इसकी अधिकतम उड़ान गति के बारे में भी कोई संकेत नहीं दिया गया है कि क्या यह ध्वनि की गति से आगे निकल सकती है या नहीं।
इसके वारहेड यानी पेलोड की मारक क्षमता और इसके निशाने की अचूकता का वास्तविक पैमाना क्या है, इन सवालों पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण उपलब्ध नहीं है। किसी भी आधुनिक अस्त्र को केवल दावों और परीक्षण के वीडियो जारी करके युद्धक्षेत्र का पासा पलटने वाला नहीं माना जा सकता, जब तक कि निष्पक्ष और पुख्ता तकनीकी प्रमाण सामने न आएं। वास्तविक संघर्ष की परिस्थितियों में केवल कागजी बयानबाजी काम नहीं आती, बल्कि मिसाइल का खरा परीक्षण रिकॉर्ड ही निर्णायक होता है।
भारतीय रक्षा कवच के सामने क्या है स्थिति
यदि इस नए हथियार की तुलना सीमा के दूसरी तरफ मौजूद तैयारियों से की जाए, तो भारतीय वायुसेना के पास पहले से ही युद्ध की कसौटी पर परखे गए बेहद घातक अस्त्र उपलब्ध हैं। भारत की स्वदेशी अस्त्र मिसाइल शृंखला इसका ज्वलंत उदाहरण मानी जाती है। भारत की अस्त्र मार्क-1 और अस्त्र मार्क-2 प्रणालियां 110 से 160 किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर मौजूद दुश्मन के लड़ाकू जहाजों को पल भर में ध्वस्त करने में सक्षम हैं।
इसके अतिरिक्त भारतीय वायुसेना के बेड़े में सुखोई-30एमकेआई और अत्याधुनिक लड़ाकू विमान राफेल शामिल हैं। विशेषकर राफेल लड़ाकू जेट मीटियोर जैसी विश्वस्तरीय एयर-टू-एयर मिसाइल से लैस है, जिसकी नो-एस्केप जोन क्षमता और अचूक टर्मिनल ट्रैकिंग दुनिया भर में बेजोड़ मानी जाती है। पश्चिमी और स्वदेशी तकनीकी तालमेल के आगे पाकिस्तान की इस अघोषित मिसाइल की क्षमताएं अभी बेहद अपरिपक्व प्रतीत होती हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पाकिस्तान का यह परीक्षण उसकी घरेलू साख सुधारने और मनोवैज्ञानिक संदेश देने की कवायद ज्यादा नजर आता है। जब तक इसके आधिकारिक तकनीकी मानक दुनिया के सामने प्रमाणित नहीं होते, तब तक इसे एक शुरुआती दौर का प्रयोग ही समझा जाएगा।



















