पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के शासन के विरुद्ध जनता का आक्रोश चरम पर पहुंच गया है। स्थानीय नागरिकों द्वारा चलाए जा रहे व्यापक विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए पाकिस्तानी सशस्त्र बलों ने अत्यधिक बल प्रयोग करते हुए निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर सीधी गोलीबारी की है। इस हिंसक फौजी कार्रवाई में 30 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि सैकड़ों अन्य गंभीर रूप से घायल हुए हैं। स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों और आंदोलनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तानी सेना ने हताहतों की वास्तविक संख्या छिपाने के उद्देश्य से कई शवों को जबरन गायब कर दिया है। इसके साथ ही, पूरे क्षेत्र में इंटरनेट सेवाओं को पूर्ण रूप से निलंबित कर दिया गया है ताकि जमीनी सच्चाइयों और मानवाधिकार उल्लोंघनों की जानकारी बाहरी दुनिया तक न पहुंच सके।
पाक नेतृत्व का कठोर रुख और प्रदर्शनकारियों को दुश्मन करार देने का बयान
क्षेत्र में उत्पन्न हुए तनावपूर्ण हालात के बीच पाकिस्तान सरकार ने किसी भी प्रकार की बातचीत की संभावना को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने आंदोलन कर रहे नागरिकों के प्रति सख्त रवैया अपनाते हुए उन्हें भारत की तर्ज पर ही देश का दुश्मन घोषित कर दिया है। ख्वाजा आसिफ के इस बयान को प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के विशेष सलाहकार राणा सनाउल्लाह खान का भी पूर्ण समर्थन मिला है। राणा सनाउल्लाह ने स्पष्ट लहजे में कहा कि जिन तत्वों की परवरिश पाकिस्तान ने की है, यदि वे ही राज्य सत्ता को चुनौती देंगे या आंखें दिखाएंगे, तो उनके खिलाफ सैन्य बल और गोलियों का प्रयोग ही किया जाएगा। सरकार के इस कड़े रुख से घाटी में असंतोष और अधिक गहरा गया है।
अवामी एक्शन कमेटी का आंदोलन और असंतोष के मुख्य कारण
पीओके में जारी इस व्यापक जनआंदोलन की अगुवाई सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के साझा मंच ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) द्वारा की जा रही है। विवाद का मुख्य कारण वहां की 12 विवादित सीटें हैं। जेएएसी का आरोप है कि इस्लामाबाद स्थित केंद्रीय सरकार इन विवादित विधानसभा सीटों का इस्तेमाल अपनी मनपसंद कठपुतली सरकार और प्रधानमंत्री को सत्ता में बैठाने के लिए करती रही है। इसके अतिरिक्त, पिछले कई महीनों से क्षेत्र के निवासी अत्यधिक महंगाई, प्रशासनिक उपेक्षा, राजनीतिक भेदभाव और अल्पसंख्यकों पर हो रहे कथित अत्याचारों के खिलाफ सड़कों पर उतरकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। नागरिकों की मांग है कि उन्हें बुनियादी अधिकार दिए जाएं और स्थानीय संसाधनों का दोहन बंद किया जाए।
भारत का करारा जवाब और विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया
पीओके के बिगड़ते हालात पर भारत सरकार ने पाकिस्तानी शासन को आड़े हाथों लिया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि क्षेत्र में देखने को मिल रहा विशाल जन आक्रोश पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे आर्थिक शोषण, नागरिकों को मौलिक अधिकारों से वंचित रखने और निरंतर प्रशासनिक दमन का स्वाभाविक परिणाम है। विदेश मंत्रालय ने वहां कराए जा रहे स्थानीय निकाय चुनावों पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह चुनावी प्रक्रिया पाकिस्तान द्वारा अपने गैरकानूनी कब्जे पर पर्दा डालने और क्षेत्र में हो रहे गंभीर मानवाधिकार हनन को छुपाने का एक कूटनीतिक प्रयास मात्र है। इससे पहले भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और यूएन मंचों पर भी कश्मीरी जनता के बुनियादी अधिकारों के हनन और हिंसा को लेकर पाकिस्तान की कड़ी निंदा की थी।
नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला की वैश्विक समुदाय से अपील
पीओके में नागरिकों पर हो रहे अत्याचारों और मौतों पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए चिंता जताई है। फारूक अब्दुल्ला ने भारत सरकार से इस संवेदनशील मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज उठाने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग को तुरंत एक प्रतिनिधिमंडल पीओके भेजना चाहिए ताकि वहां के निवासियों की समस्याओं का जायजा लिया जा सके और उनके समाधान के कदम उठाए जा सकें। इसके साथ ही उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री से भी हस्तक्षेप करने की अपील की है ताकि क्षेत्र में निर्दोष नागरिकों की रक्षा की जा सके।



















