बच्चों की हर छोटी-बड़ी मांग को फौरन पूरा कर देना कई बार माता-पिता को आसान रास्ता लग सकता है। बच्चा रोया, जिद्द पर अड़ा और उसकी पसंद की चीज उसके हाथ में थमा दी गई। लेकिन बच्चों की हर ख्वाहिश को तुरंत मान लेने की आदत उनके व्यवहार और मानसिकता पर गहरा असर डालती है। आधुनिक दौर में महंगे गैजेट्स, ब्रांडेड सामान और स्मार्टफोन को लेकर बच्चों की बेजा जिदों को नजरअंदाज करना भविष्य में भारी पड़ सकता है और इसके अंजाम बहुत भयानक हो सकते हैं। ऐसी ही एक दर्दनाक घटना महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से सामने आई थी, जहां एक बच्चे की जिद के कारण तीन लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
आईफोन खरीदने की मांग को लेकर शुरू हुआ विवाद कुछ ही पलों में इस कदर बढ़ गया कि महज पांच सेकंड के भीतर पूरा परिवार खत्म हो गया। इस खौफनाक वाकये में कुणाल खवड्या पहाड़ की ओर बढ़ा और बिल्कुल छोर पर जा खड़ा हुआ, जबकि माता-पिता उसे लगातार समझाते रहे कि वे उसकी हर बात मान लेंगे और उसे फोन दिला देंगे। हर कोई उसे सुरक्षित लौटने की मिन्नतें करता रहा, लेकिन बेटे ने गहरी खाई में छलांग लगाने का फैसला कर लिया था। उसे बचाने की कोशिश में पिता ने अपना संतुलन खो दिया और वे भी बेटे के साथ नीचे जा गिरे, जिसके बाद यह सब देख रही मां ने भी फौरन खाई में छलांग लगा दी। जरा सोचिए कि केवल एक गैजेट पाने की जिद ने महज पांच सेकंड के अंदर एक हंसता-खेलता परिवार तबाह कर दिया।
इस मार्मिक और झकझोर देने वाली घटना ने बाल विकास और पैरेंटिंग के तौर-तरीकों पर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है। समाज में यह सवाल भी जोर-शोर से उठ रहा है कि बच्चों को शुरुआती उम्र से ही किस तरह संभालना चाहिए और उन्हें कैसे सिखाया जाए ताकि बड़े होकर वे इस तरह के जिद भरे और जानलेवा कदम न उठाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की परवरिश में कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है ताकि वे जीवन की वास्तविक सच्चिदानंद को समझ सकें।
जरूरत और इच्छा के बीच का अंतर समझाएं
बच्चों को बचपन से ही यह स्पष्ट रूप से बताना जरूरी है कि हर पसंद की चीज कोई अनिवार्य जरूरत नहीं होती। स्मार्टफोन, महंगे फोन, आधुनिक गेमिंग डिवाइस या फिर ब्रांडेड कपड़े चाहना एक अलग बात है और जीवन में उनकी वास्तविक आवश्यकता होना बिल्कुल अलग। जब भी कोई बच्चा किसी महंगी वस्तु की मांग करे, तो सीधे तौर पर केवल 'नहीं' कहने के बजाय उसे बैठकर समझाएं कि परिवार का कुल बजट क्या है और हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं। इससे बच्चा धीरे-धीरे चीजों के वास्तविक मूल्य और उनकी उपयोगिता को परखना सीख जाता है।
बच्चे के रोने, चिल्लाने या गुस्सा दिखाने पर उसकी बात मान लेना आसान विकल्प लग सकता है, लेकिन ऐसा करने से उसे गलत संदेश मिलता है कि वह अपनी हर जिद्द अनुचित दबाव बनाकर मनवा सकता है। माता-पिता को हमेशा संयम बरतते हुए घर के लिए स्पष्ट सीमाएं तय करनी चाहिए। यदि कोई मनचाही वस्तु फिलहाल खरीदना संभव नहीं है, तो बच्चे को बहुत ही सरल भाषा में इसके पीछे की वजह बताएं और जरूरत पड़ने पर उसे कोई उचित विकल्प दें।
वित्तीय समझ और निराशा से निपटने का हुनर
बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से पैसों के प्रबंधन और खर्चों के तौर-तरीकों के बारे में बताना बहुत जरूरी है। उन्हें समझाएं कि बाजार में मिलने वाली चीजें पाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और हर परिवार की आमदनी की अपनी एक सीमा होती है। बच्चों को छोटी-छोटी बचत करने की आदत सिखाना भी बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है। इससे वे यह समझ पाते हैं कि दुनिया में हर चीज पलक झपकते ही हासिल नहीं की जा सकती, बल्कि उसके लिए धैर्य की जरूरत होती है।
बच्चे के लिए यह स्वीकार करना सीखना भी जरूरी है कि हर बार उसकी पसंद के मुताबिक ही सब कुछ हो यह संभव नहीं है। उन्हें धीरे-धीरे जीवन की निराशाओं और असफलताओं को संभालना सिखाना चाहिए। यदि बच्चा अपनी कोई मांग पूरी न होने पर उग्र हो जाता है, तो पहले उसकी भावनाओं को समझें, लेकिन किसी भी सूरत में उसके गलत और आक्रामक व्यवहार के आगे न झुकें। उसे यह बात स्पष्ट करें कि नाराज होना एक स्वाभाविक भावना है, लेकिन चिल्लाना, घर में तोड़फोड़ करना, धमकी देना या खुद को नुकसान पहुंचाना बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।
खुली बातचीत और जिम्मेदारी की भावना
बच्चों के साथ हमेशा एक स्वस्थ संवाद बनाए रखें और घर से जुड़े छोटे-मोटे फैसलों में उनकी उम्र को ध्यान में रखते हुए उन्हें भी शामिल करें। घर के छोटे-मोटे कार्यों की जिम्मेदारी सौंपने से वे अधिक आत्मनिर्भर और जिम्मेदार इंसान बनते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अच्छी परवरिश का अर्थ बच्चों की हर ख्वाहिश को पूरा करना कतई नहीं है, बल्कि उन्हें सही और गलत के बीच का फर्क समझाना है। यदि किसी बच्चे का व्यवहार अत्यधिक आक्रामक हो जाता है, लगातार नियंत्रण से बाहर नजर आता है या वह खुद को अथवा किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की बातें करता है, तो इस स्थिति को हल्के में न लें और फौरन किसी योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या काउंसलर से पेशेवर मदद लें।



















