पैरेंटिंग के सफर में माता-पिता की हमेशा यही चाहत होती है कि उनका बेटा या बेटी स्कूल के माहौल में पूरी तरह सुरक्षित रहे, मन लगाकर पढ़ाई करे और हमेशा खुश रहे। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि हंसता-खेलता और चंचल बच्चा अचानक से एकदम शांत क्यों हो जाता है? कई बार बच्चे किसी ऐसी गंभीर मानसिक और शारीरिक तकलीफ से जूझ रहे होते हैं, जिसके बारे में वे खुलकर किसी से कुछ कह नहीं पाते। इस तरह की खामोश पीड़ा की एक बहुत बड़ी वजह स्कूल बुलिंग होती है। हाल ही में जयपुर में सामने आई एक बेहद दुखद घटना ने देश भर के माता-पिता को झकझोर कर रख दिया है, जहां चौथी कक्षा के एक मासूम छात्र ने लंबे समय तक चुप्पी साधते हुए अपनी जान गंवा दी। इस मामले की जांच में यह बात उजागर हुई कि वह बच्चा महीनों से किसी अनकहे मानसिक दबाव और बुलिंग के गंभीर दौर से गुजर रहा था।
बाल मनोविज्ञान और रिपोर्ट के आंकड़े
अक्सर वयस्क यह मान लेते हैं कि 8 से 10 साल की छोटी उम्र के बच्चे मौत या तनाव जैसे भारी शब्दों के अर्थ से पूरी तरह अनजान होते हैं। हालांकि, बाल मनोविज्ञान यह स्पष्ट करता है कि जब कोई बच्चा लंबे समय तक लगातार बुलिंग का सामना करता है, तो वह धीरे-धीरे अत्यधिक मानसिक तनाव की स्थिति में चला जाता है। नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स और युनेस्को की रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, देश भर के स्कूलों के भीतर बुलिंग एक बेहद आम लेकिन आमतौर पर नजरअंदाज की जाने वाली समस्या बन चुकी है। ज्यादातर परिस्थितियों में बच्चे अत्यधिक डर या सामाजिक शर्मिंदगी की वजह से घर पर अपने साथ हुई ज्यादती का जिक्र नहीं करते हैं। ऐसे में माता-पिता उनके स्वभाव में आए बदलावों को केवल आम मूड स्विंग्स या बच्चों के उम्र के नखरे समझकर आसानी से टाल देते हैं।
वे 4 खामोश इशारे जो बुलिंग की ओर करते हैं इशारा
विशेषज्ञों का मानना है कि पीड़ित बच्चे कभी भी सीधे तौर पर आकर यह नहीं कहते कि उन्हें कोई परेशान कर रहा है। उनका सारा छिपा हुआ डर और मानसिक तनाव उनके अजीब व्यवहार के जरिए बाहर आता है। यदि आपको अपने बच्चे की दिनचर्या और हरकतों में ये चार प्रमुख बदलाव नजर आएं, तो तुरंत सतर्क हो जाने की जरूरत है। सबसे पहला संकेत यह है कि बच्चा अचानक बहुत गुमसुम या पूरी तरह अलग-थलग हो जाता है। यदि आपका बच्चा पहले बहुत अधिक बातें किया करता था, लेकिन अब उसने अचानक चुप रहना शुरू कर दिया है, अपने साथियों से दूरी बना ली है या घर लौटते ही खुद को कमरे में बंद कर लेता है, तो यह कोई सामान्य बात नहीं है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत होता है कि वह अंदर ही अंदर किसी अज्ञात भय से मुकाबला कर रहा है।
स्कूल जाने से घबराना और शारीरिक लक्षण
दूसरा बड़ा संकेत यह है कि बच्चा सुबह उठते ही स्कूल जाने के नाम पर घबराहट महसूस करता है या तरह-तरह के बहाने बनाने लगता है। सुबह आंख खुलते ही पेट दर्द या सिरदर्द की शिकायत करना अथवा स्कूल की बस आते ही जोर-जोर से रोने लगना केवल आलस का नतीजा नहीं हो सकता है। यदि बच्चा रोजाना स्कूल जाने से बुरी तरह डर रहा है या वहां पहुंचने के नाम पर उसे पैनिक अटैक जैसी स्थिति महसूस होती है, तो पूरी संभावना है कि उसे स्कूल के साथियों, सीनियर छात्रों या किसी शिक्षक के अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, अत्यधिक मानसिक तनाव का बुरा असर बच्चे की शारीरिक सेहत पर भी साफ दिखाई देने लगता है। रात के वक्त काफी देर तक नींद न आना, बार-बार डरावने सपने देखना या अचानक से भोजन के प्रति रुचि कम हो जाना—ये सभी इस बात की गवाही देते हैं कि बच्चा मानसिक रूप से बिल्कुल शांत नहीं है। तीसरा संकेत यह है कि बच्चा बात-बात पर बहुत अधिक चिड़चिड़ा हो जाता है या छोटी-छोटी बातों पर रो पड़ता है। बुलिंग का सामना कर रहा छात्र अपनी भावनाओं पर संतुलन नहीं रख पाता और अपनी लाचारी व गुस्से को इसी रूप में बाहर निकालता है।
विशेषज्ञों की सलाह: माता-पिता क्या कदम उठाएं
आईसी3 मूवमेंट के संस्थापक गणेश कोहली का कहना है कि जब भी किसी बच्चे का स्वभाव बदला-बदला सा महसूस हो, तो उस पर गुस्सा करने या चिल्लाने के बजाय पूरी सहानुभूति और उत्सुकता के साथ उससे बातचीत करें। सबसे पहले बच्चे को बिल्कुल भी न डांटें और न ही उसे यह कहें कि वह खुद ही कमजोर है। इसके विपरीत, उसे इस बात का पूरा भरोसा दिलाएं कि आप हर परिस्थिति में मजबूती के साथ उसके साथ खड़े हैं। बच्चे की बात को बिना बीच में टोके पूरी तरह से समझें और दोस्ताना माहौल बनाकर उससे पूछें कि स्कूल में उसका पूरा दिन कैसा बीता, कौन-कौन नए दोस्त बने और क्या किसी ने उसे किसी भी तरह से परेशान किया है। इसके साथ ही, यदि आपको बुलिंग का थोड़ा सा भी संदेह हो, तो बिना देर किए तुरंत स्कूल प्रशासन और काउंसलर से बात करें। इस तरह के मामलों को बच्चों का आपस का साधारण मामला मानकर कभी भी नजरअंदाज न करें। आपका थोड़ा सा कीमती वक्त, सही ध्यान और बेइंतहा प्यार आपके बच्चे को एक बहुत बड़े मानसिक संकट से सुरक्षित बचा सकता है।



















