अक्सर स्कूल की घंटी बजते ही बच्चे चहकते हुए बाहर आते हैं, लेकिन हर बच्चे के लिए दिन का अनुभव एक जैसा खुशनुमा नहीं होता। कभी-कभी घर लौटते ही बच्चा अपना बस्ता एक कोने में पटक देता है, चुपचाप कमरे में चला जाता है या डाइनिंग टेबल पर खाना खाते वक्त खामोश नजर आता है। जब माता-पिता पूछते हैं कि आज स्कूल में क्या हुआ, तो जवाब में केवल एक औपचारिक बात सुनने को मिलती है कि सब ठीक था। इस संक्षिप्त उत्तर की तह में कई बार एक अनकही पीड़ा छिपी होती है। खेल के मैदान की चहल-पहल के बीच कुछ संवेदनशील बच्चे खुद को बेहद तन्हा महसूस करते हैं, जिसे वे सीधे शब्दों में व्यक्त करने में हिचकिचाते हैं।
शुरुआत में बच्चे सीधे यह नहीं कहते कि उनका कोई साथी नहीं बन रहा या वे भीतर से दुखी हैं। इसके बजाय वे छोटी-छोटी घटनाओं का जिक्र करते हैं, जैसे किसी साथी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया, पूरा समूह उन्हें छोड़कर आगे निकल गया, या लंच ब्रेक के दौरान अकेले बैठकर खाना बहुत लंबा लगने लगा। ऐसे नाजुक मोड़ पर अभिभावकों को स्थिति की गंभीरता समझनी चाहिए और बिना डांटे या जल्दबाजी किए बच्चे को भावनात्मक सहारा देना चाहिए।
तुरंत सलाह देने की बजाय बिना टोके सिर्फ सुनें
जब बच्चा अपने मन की उलझन बयां करता है, तो माता-पिता अक्सर तुरंत समाधान निकालने लगते हैं। वे झट से कह देते हैं कि कल जाकर दूसरे साथियों के पास बैठ जाना या खुद आगे बढ़कर बातचीत शुरू करना। इस तरह की सलाह उस वक्त बच्चे को और असहज कर सकती है। उस पल उसे किसी व्याख्यान या निर्देश की जरूरत नहीं होती, बल्कि वह सिर्फ यह चाहता है कि कोई उसकी भावना को समझे और उसके साथ शांति से बैठे। जब अभिभावक बिना किसी आलोचना या टोक-टाक के बच्चे की बात सुनते हैं, तो बच्चे के मन में सुरक्षा का भाव पैदा होता है। उसे यह विश्वास मिलता है कि उसकी छोटी सी दुनिया की बातें किसी के लिए सचमुच अहमियत रखती हैं।
शिक्षक से बात करें और क्लासरूम के हालात समझें
अक्सर जो बातें बच्चे घर आकर नहीं बता पाते, वे स्कूल में शिक्षक की नजरों से नहीं छिपतीं। इसलिए माता-पिता को शिक्षक से मिलकर जासूस की तरह पूछताछ करने के बजाय एक सहयोगी की तरह बातचीत करनी चाहिए। शिक्षक से यह जानने का प्रयास करें कि लंच या गतिविधियों के दौरान बच्चे का व्यवहार कैसा रहता है, क्या वह किसी समूह के करीब जाकर संकोच में पीछे हट जाता है, या फिर कक्षा के किसी शांत कोने में ही बैठे रहना पसंद करता है। इस तरह के संवाद से ऐसे पहलू सामने आते हैं, जो समस्या की असली जड़ को समझने में मदद करते हैं।
शांत माहौल में दोस्ती के छोटे अवसर तलाशें
हर बच्चे का स्वभाव भीड़-भाड़ वाले माहौल में आसानी से घुलने-मिलने का नहीं होता। कुछ बच्चों को शांत और सहज वातावरण अधिक रास आता है। ऐसे में माता-पिता पार्क में किसी एक परिचित बच्चे के साथ मुलाकात तय कर सकते हैं, ताकि आमने-सामने बातचीत की झिझक मिट सके। इसके अलावा बच्चे की पसंद की हॉबी क्लास, जैसे पेंटिंग, संगीत या खेलकूद में दाखिला दिलाना भी मददगार साबित होता है। साझा रुचियों के आधार पर बच्चे बिना किसी दबाव के बात करने लगते हैं। घर के आसपास या चचेरे भाई-बहनों के साथ हंसने-खेलने का दायरा भी बच्चे के भीतर ऐसा भरोसा भर देता है, जो स्कूल के मैदान में उसके लिए एक ढाल का काम करता है।
इनकार झेलने की हिम्मत सिखाएं
स्कूल के मैदान में सबसे मुश्किल पल वह होता है जब किसी समूह से पूछना पड़ता है कि क्या वे खेल में शामिल हो सकते हैं। अगर वहां से मनाही मिलती है, तो कई बच्चे इसे अपने आत्मसम्मान पर ले लेते हैं और खुद को कमतर आंकने लगते हैं। अभिभावकों का काम यह है कि वे बच्चे को बहुत ही सहज अंदाज में समझाएं कि किसी का इनकार उसकी अपनी व्यक्तिगत कमी नहीं है। बच्चे को यह भरोसा दिलाएं कि अगर आज किसी खेल में जगह नहीं मिली, तो कल बिना किसी हिचकिचाहट के नए सिरे से कोशिश की जा सकती है।
बच्चे को अपनी असली पहचान पर भरोसा दिलाएं
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे के मन में यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसकी अपनी कीमत इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने लोग उससे बात करते हैं। उसकी जो भी व्यक्तिगत खूबियां हैं, चाहे वह चित्रकारी हो, फुटबॉल खेलना, नई कहानियां पढ़ना, बेकिंग करना या कोई क्राफ्ट बनाना, उन्हें बढ़ावा देना चाहिए। सच्चा आत्मविश्वास इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हर कोई स्वीकृति दे, बल्कि यह इस समझ से आता है कि अकेले होने पर भी इंसान अपने आप में संपूर्ण है। जब बच्चा इस आत्मसम्मान को अपना लेता है, तो वह स्कूल के मैदान में किसी हिचकिचाहट के बिना पूरे विश्वास के साथ कदम रखता है।



















