उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है। इस बार सारा ध्यान असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के एक प्रमुख और जाने-पहचाने चेहरे पर आकर टिक गया है। सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और टेलीविजन डिबेट्स का चर्चित चेहरा सैयद आसिम वकार जल्द ही ओवैसी का साथ छोड़ सकते हैं। अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, वकार बुधवार को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर सकते हैं। यदि यह सियासी कदम उठाया जाता है, तो इसे ओवैसी के लिए एक बहुत बड़ा झटका माना जाएगा क्योंकि वकार पिछले करीब दस वर्षों से इस संगठन से मजबूती से जुड़े रहे हैं और प्रदेश स्तर पर पार्टी के एजेंडे को आक्रामकता से आगे बढ़ाते रहे हैं।
कांग्रेस में शामिल होने की अटकलों पर सस्पेंस बरकरार
हालांकि इन तमाम राजनीतिक चर्चाओं के बीच सैयद आसिम वकार की तरफ से अभी तक अपनी अगली पारी को लेकर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। उन्होंने न तो मीडिया में चल रही इन खबरों की पुष्टि की है और न ही इन्हें सिरे से खारिज किया है। इस चुप्पी के कारण उनकी राजनीतिक दिशा को लेकर असमंजस और सस्पेंस लगातार बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस तरह के घटनाक्रम अक्सर अंदरखाने चल रही बड़ी रणनीतियों का संकेत होते हैं, जिनका खुलासा सही समय पर किया जाता है।
पार्टी के भीतर असंतोष और पुराना राजनीतिक इतिहास
सामने आ रही मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आसिम वकार पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश इकाई के भीतर लिए जा रहे कुछ संगठनात्मक फैसलों से असहज और असंतुष्ट चल रहे थे। इसी अंदरूनी नाराजगी और कलह के बीच उनके कांग्रेस खेमे में जाने की खबरों ने तूल पकड़ लिया है। आपको बता दें कि एआईएमआईएम में आने से पहले वकार का समाजवादी पार्टी के साथ करीब बीस साल लंबा पुराना नाता रहा है। इसका साफ मतलब यह है कि उत्तर प्रदेश के राजनीतिक मैदान में उनका अनुभव बहुत व्यापक है और वह राज्य के अलग-अलग राजनीतिक दलों के कामकाज के तरीके से अच्छी तरह वाकिफ हैं।
इमरान प्रतापगढ़ी की रणनीति और मुस्लिम मतदाताओं पर नजर
यदि सैयद आसिम वकार का कांग्रेस में शामिल होना तय होता है, तो इसे उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पैठ और जनाधार को दोबारा मजबूत करने की कांग्रेस पार्टी की सुनियोजित कोशिश के तौर पर देखा जाएगा। जानकारों का दावा है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी की बहुत अहम भूमिका रही है, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर वकार को पार्टी के पाले में लाने के लिए पूरी चाल चली है।
चुनावी माहौल और ओवैसी की तैयारियां
आसिम वकार के इस संभावित दल-बदल का समय बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं। असदुद्दीन ओवैसी पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि उनकी पार्टी इस बार पूरे दमखम और ताकत के साथ चुनावी अखाड़े में उतरेगी। हालांकि, पार्टी कुल कितनी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी, इस पर अंतिम फैसला अभी नहीं लिया गया है। ओवैसी का यह भी मानना है कि पिछला चुनावों की तुलना में अब उनका संगठन जमीनी स्तर पर काफी ताकतवर हुआ है और जनता के एक वर्ग में उनकी पार्टी को एक सशक्त राजनीतिक विकल्प के रूप में देखने की सोच लगातार पनप रही है।
वोटकटवा छवि से बाहर निकलने की कवायद
पिछले महीने दिए गए अपने एक बयान में ओवैसी ने दो टूक कहा था कि पार्टी चुनाव में अपने प्रत्याशी जरूर उतारेगी और यदि उनका प्रदर्शन इस बार पहले से बेहतर रहता है, तो इससे यह भी बिल्कुल साफ हो जाएगा कि भविष्य में किन-किन सीटों पर पार्टी अपना दावा और ज्यादा मजबूत कर सकती है। उनकी मुख्य कोशिश उस पुरानी धारणा को तोड़ने की भी है जिसके तहत उनकी पार्टी को अक्सर एक वोटकटवा दल के रूप में चित्रित किया जाता रहा है। वह लगातार अपनी पार्टी को एक स्वतंत्र और मजबूत राजनीतिक विकल्प के रूप में जनता के सामने पेश करने की जुगत में लगे हुए हैं।
मुस्लिम वोटों के समीकरण और दलों की खींचतान
उत्तर प्रदेश के चुनावी गणित में मुस्लिम मतदाता हमेशा से ही हार-जीत तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते आए हैं। यही कारण है कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी समेत कई अन्य दल इस महत्वपूर्ण मतदाता वर्ग को अपने पाले में करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। इस समय कांग्रेस और समाजवादी पार्टी राज्य में आपसी गठबंधन के तहत आगामी चुनावों की तैयारी में जुटे हुए हैं, हालांकि दोनों प्रमुख दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर अभी तक कोई औपचारिक और अंतिम बातचीत शुरू नहीं हो पाई है।
सीट शेयरिंग की बातचीत पर असर
ऐसी परिस्थितियों में कांग्रेस पार्टी के खेमे में किसी लोकप्रिय और चर्चित चेहरे का आना निश्चित तौर पर सीट बंटवारे की आगामी बातचीत में उसकी सौदेबाजी की ताकत को मजबूत कर सकता है। सैयद आसिम वकार के कांग्रेस में आने की चर्चाओं को इसी बड़ी राजनीतिक रणनीति का एक अनिवार्य हिस्सा माना जा रहा है। बहरहाल, इस सियासी उथल-पुथल का असल चुनावी असर कितना और क्या होगा, यह तो आने वाला वक्त ही पूरी तरह से साफ कर पाएगा।





















