उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल 2027 के विधानसभा चुनावों की सुगबुगाहट के साथ ही पोस्टर वार ने रफ्तार पकड़ ली है। ताजा विवाद समाजवादी पार्टी के राज्य कार्यालय के बाहर लगाए गए एक होर्डिंग को लेकर उपजा है, जिसमें एक व्यक्ति को घुटनों के बल झुके हुए दिखाया गया है और उसके धार्मिक प्रतीकों जैसे त्रिपुंड और जनेऊ को चंदा चोरी जैसे गंभीर आरोपों से जोड़ा गया है। इस होर्डिंग के सामने आते ही सियासी पारा चढ़ गया है और योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री मनोज कुमार पांडेय ने इस पर कड़ा विरोध जताते हुए समाजवादी पार्टी पर ब्राह्मण समुदाय के अपमान का सीधा आरोप लगाया है।
मनोज कुमार पांडेय की तीखी प्रतिक्रिया और चेतावनी
मंत्री मनोज कुमार पांडेय ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि राजनीतिक मतभेद और प्रतिद्वंद्विता अपनी जगह हैं, लेकिन किसी भी समाज के सम्मान, स्वाभिमान और उसकी धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती। उन्होंने समाजवादी पार्टी की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि पार्टी कार्यालय के बाहर ऐसा अपमानजनक पोस्टर कैसे प्रदर्शित किया जा सकता है जिसमें ब्राह्मण समाज के लोगों को घुटनों के बल बैठाकर चंदा चोर करार दिया जा रहा हो। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि इस तरह के कृत्यों पर शर्म आनी चाहिए क्योंकि इस समुदाय ने देश के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर राष्ट्र के निर्माण और विकास तक में एक अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी ब्राह्मण वर्ग को कमजोर और नगण्य मानती है और इसी सोच के तहत उन्हें लगातार अपमानित करने के रास्ते तलाश रही है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो लोग समाज को असहाय और लाचार समझ रहे हैं, वे इतिहास के पन्नों को पलटकर देख लें और किसी भी प्रकार की गलतफहमी में न रहें क्योंकि इस बार इस तरह के अपमान को बिल्कुल सहन नहीं किया जाएगा।
जातीय समीकरण और साल 2027 के चुनावों की बिसात
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में लगभग 10 से 12 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले ब्राह्मण मतदाता को हमेशा से एक बड़ा ओपिनियन मेकर माना जाता रहा है। जैसे-जैसे साल 2027 के विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, राज्य के सभी प्रमुख राजनीतिक दल इस प्रभावशाली वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक फार्मूले के साथ-साथ माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपकर और परशुराम चेतना के आयोजनों के माध्यम से ब्राह्मण समाज को अपने पाले में लाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। इसके साथ ही, पार्टी राम मंदिर निर्माण को लेकर चंदा चोरी के दावों के जरिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी सरकार और ट्रस्ट को लगातार घेरने का प्रयास कर रही है। कुछ समय पहले जनेश्वर मिश्र की पुण्यतिथि के अवसर पर लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम के दौरान अखिलेश यादव ने पीडीए में पी का अर्थ पंडित बताते हुए ब्राह्मणों को साधने का एक बड़ा राजनीतिक दांव भी चला था।
भारतीय जनता पार्टी की रणनीति और आक्रामक तेवर
समाजवादी पार्टी की तरफ ब्राह्मण वोटों के झुकाव को रोकने के लिए अब भारतीय जनता पार्टी ने भी अपने एक कद्दावर ब्राह्मण चेहरे को आगे करके अखिलेश यादव पर तीखा दबाव बनाना शुरू कर दिया है। भाजपा की यह सोची-समझी रणनीति है कि ऐसे विवादित पोस्टरों को सीधे तौर पर ब्राह्मण समाज की धार्मिक आस्था का खुला अपमान बताया जाए, जिससे समाजवादी पार्टी को रक्षात्मक मुद्रा में धकेला जा सके। मनोज कुमार पांडेय का यह आक्रामक और कड़ा रुख इसी रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए मतदाताओं के बीच यह संदेश प्रसारित किया जा रहा है कि समाजवादी पार्टी केवल चुनावी फायदे और सत्ता हासिल करने के लिए जातीय अपमान की राजनीति करने से भी गुरेज नहीं करती है।
पोस्टर हटाने और सार्वजनिक माफी की मांग
विवाद के तूल पकड़ने के बाद मनोज कुमार पांडेय ने समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से यह स्पष्ट मांग की है कि इस आपत्तिजनक पोस्टर को तुरंत प्रभाव से हटाया जाए और पार्टी की ओर से सार्वजनिक रूप से ब्राह्मण समाज से माफी मांगी जाए। उन्होंने दो टूक कहा कि केवल वोटों की राजनीति के लिए किसी भी समाज के स्वाभिमान को कुचलने का कुत्सित प्रयास अब उत्तर प्रदेश की जनता कतई स्वीकार नहीं करेगी। इस ताज़ा घटनाक्रम के बाद से राजधानी लखनऊ के राजनीतिक हलकों में खलबली मची हुई है। आगामी 2027 के चुनावी रण में एक तरफ जहां राज्य सरकार द्वारा विकास कार्यों और कानून-व्यवस्था के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इस तरह के पोस्टर वार और जातीय अस्मिता के मुद्दे आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ने के स्पष्ट संकेत दे रहे हैं।



















