लुधियाना नगर निगम बैठक में भारी हंगामा, आम आदमी पार्टी और बीजेपी पार्षदों के बीच हाथापाईडूंगरपुर के स्कूल में गिरी जर्जर कमरे की छत, टला बड़ा हादसामेघालय के ईस्ट जयंतिया हिल्स में धारा 163 लागू, डीसी दफ्तर के पास प्रदर्शनों पर रोकस्पिरिट एयरलाइंस डेटा सौदा विवाद: गूगल को कर्मचारियों की जानकारी बेचने की योजना पर भड़के पूर्व फ्लाइट अटेंडेंटकनाडाई डॉलर पर मंडराया टैरिफ का खतरा, अमेरिकी फैसलों और बातचीत की उम्मीदों के बीच बाजार की चालक्या चाय पीने से कमजोर होती हैं हड्डियां और शरीर से गायब हो जाता है कैल्शियम?क्रिप्टो बाजार में जबरदस्त तेजी, बिटकॉइन ने चार महीने में पहली बार 80,000 डॉलर का स्तर पार कियाप्रेग्नेंसी के दौरान कियारा आडवाणी ने कैसे पूरी की टॉक्सिक की शूटिंग, यश का रिएक्शन देख छलक आए थे आंसूफरक्का संधि पर क्यों गरमाई सियासत? 30 साल बाद खत्म हो रहे समझौते से बिहार को है भारी खतरायूरो के मुकाबले पाउंड पर मंडरा रहा कमजोरी का खतरा, बैंक ऑफ इंग्लैंड की ब्याज दरों को लेकर अनुमान नरम
आरक्षण सुधार की मांग पर छिड़ी सियासत: INDI और NDA आमने-सामने, जानिए कौन फैला रहा है भ्रमराजनीति
25 अग॰ 2026, 2:08 pm (2 घंटे पहले)· 2

आरक्षण सुधार की मांग पर छिड़ी सियासत: INDI और NDA आमने-सामने, जानिए कौन फैला रहा है भ्रम

देश में आरक्षण व्यवस्था में सुधार और समीक्षा की मांग को लेकर चल रहे आंदोलनों ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है।

देशभर में इन दिनों आरक्षण के मुद्दे को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। एक तरफ जहां सामान्य वर्ग के तमाम लोग यह मांग कर रहे हैं कि आरक्षण व्यवस्था लागू हुए 70 साल बीत चुके हैं और अब इसकी समीक्षा व सुधार पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए, वहीं दूसरी तरफ इस मांग ने राजनीतिक गलियारों में भारी भूचाल ला दिया है। इस आंदोलन के उठते ही सत्ताधारी गठबंधन और विपक्षी दलों के बीच जुबानी जंग छिड़ गई है। अखिलेश यादव से लेकर चंद्रशेखर आजाद तक और एनडीए खेमे से चिराग पासवान व रामदास अठावले जैसे दिग्गज नेता इस पर खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, जिससे देश की सियासत गरमा गई है।

विपक्षी गठबंधन के नेताओं का आरोप है कि आरक्षण में सुधार की आड़ में एक खास राजनीतिक माहौल तैयार किया जा रहा है। उनका पुराना नैरेटिव एक बार फिर सामने आ रहा है जिसके तहत यह प्रचारित किया जा रहा है कि मौजूदा सरकार आरक्षण को पूरी तरह समाप्त करना चाहती है। हालांकि, वास्तविकता यह है कि किसी भी स्तर पर आरक्षण को खत्म करने की बात आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आई है और सरकार भी कई बार यह स्पष्ट कर चुकी है कि इस व्यवस्था को कोई हाथ नहीं लगा सकता। इसके बावजूद राजनीतिक नफा-नुकसान को ध्यान में रखते हुए वही पुराना राजनीतिक दांव चला जा रहा है, जिसका इस्तेमाल साल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान भी किया गया था।

ये भी पढ़ें

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के हथकंडों का उपयोग आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों और अन्य प्रांतीय चुनावों में राजनीतिक लाभ उठाने के लिए किया जा रहा है। यदि इन प्रदर्शनों और आंदोलनों की जमीनी हकीकत पर गौर किया जाए तो कोई भी आंदोलनकारी यह मांग नहीं कर रहा है कि आरक्षण को पूरी तरह से हटा दिया जाए या किसी का हक छीना जाए। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि इतने लंबे समय के बाद यह गहराई से देखा जाना चाहिए कि आरक्षण का यह तंत्र सही ढंग से काम कर रहा है या नहीं और क्या इसका वास्तविक और जरूरी लाभ उन लोगों तक पहुंच रहा है जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

दूसरी ओर, दिल्ली से लेकर लखनऊ तक सड़कों पर उतरे लोगों का यही कहना है कि समय के साथ हर व्यवस्था में संशोधन की गुंजाइश होती है। जैसे ही यह मांग मुखर हुई, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया। दिल्ली और लखनऊ के प्रदर्शनों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि आरक्षण सुधार के नाम पर दरअसल आरक्षण को खत्म करने का बड़ा षड्यंत्र रचा जा रहा है। उन्होंने इसे पीडीए समाज के खिलाफ एक गहरी साजिश करार देते हुए कहा कि आरक्षण इस समाज का अधिकार है और यह किसी की इच्छा या दया का विषय नहीं है।

अखिलेश यादव ने यह भी आरोप लगाया कि बीजेपी और उनके सहयोगी दल समय-समय पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आरक्षण का विरोध करते रहते हैं। कभी वे समीक्षा तो कभी सुधार जैसे अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तो कभी क्रीमीलेयर या आरक्षण त्यागने की सलाह देते हैं। उनका यह भी कहना है कि सदियों से शोषित और वंचित रहे लोगों को मिले अधिकारों को छीनने की कोशिश हो रही है, लेकिन उनका साफ कहना है कि आरक्षण था, आरक्षण है और आरक्षण हमेशा रहेगा।

इस पूरे घटनाक्रम पर आजाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर आजाद रावण की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने प्रदर्शन कर रहे लोगों को एक अलग सलाह देते हुए कहा कि वे अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाएं और खुद का राजनीतिक दल बनाएं। उनका तर्क है कि जब तक लोग अपनी संख्या मजबूत करके संसद या विधानसभाओं में बहुमत हासिल नहीं करेंगे, तब तक अपने मन मुताबिक नियम और कानून पास नहीं करवा पाएंगे। उन्होंने यह भी तंज कसा कि आज जो लोग विरोध दर्ज करा रहे हैं, उन्होंने अतीत में कभी कुछ नहीं दिया।

आरक्षण के इस पूरे सियासी घमासान के बीच एनडीए के दलित नेताओं ने भी विपक्ष के हमलों का करारा जवाब दिया है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने दो टूक शब्दों में कहा कि आरक्षण किसी की ओर से दी गई कोई खैरात नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर नागरिकों के संवैधानिक अधिकार हैं। उन्होंने दावा किया कि दुनिया की कोई भी ताकत इस व्यवस्था को समाप्त नहीं कर सकती। चिराग पासवान ने यह भरोसा दिलाया कि जब तक वह राजनीति में हैं और जिस सरकार में वह शामिल हैं, वहां इस व्यवस्था को कभी बिगड़ने नहीं दिया जाएगा। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने भी ऐसे ही सुर में विपक्ष के दावों को खारिज किया।

इस बहस में कांग्रेस पार्टी भी पूरी तरह कूद पड़ी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए एक लंबी सूची सामने रखी है। उनका दावा है कि केंद्र सरकार चोर दरवाजे से धीरे-धीरे आरक्षण को खत्म करने की योजना पर काम कर रही है। आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि साल 2015 में केंद्र सरकार के विभागों में कुल 4.21 लाख पद खाली पड़े थे, जो बढ़कर साल 2024 में 8.24 लाख हो गए। अकेले रेलवे विभाग में 2.40 लाख पद रिक्त हैं, जबकि रक्षा मंत्रालय में 2.41 लाख और गृह मंत्रालय में 1.10 लाख पद खाली पड़े हैं।

इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों यानी पीएसयू में 5.1 लाख स्थायी नौकरियां खत्म होने का दावा करते हुए खड़गे ने कहा कि ठेका कर्मचारियों की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत से उछलकर 49 प्रतिशत तक पहुंच गई है। उनका यह भी तर्क है कि यह लड़ाई केवल रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर सामाजिक न्याय की लड़ाई है। उनका आरोप है कि यदि सरकारी पद खाली रखे जाएंगे तो आरक्षण का अवसर अपने आप समाप्त हो जाएगा, और यदि पीएसयू को बेचा जाएगा या स्थायी नौकरियों को ठेकेदारी प्रथा में बदला जाएगा, तो भी आरक्षण स्वतः ही खत्म हो जाएगा।

कांग्रेस का यह भी मानना है कि आरक्षण को समाप्त करने के लिए संविधान में संशोधन करने की भी आवश्यकता नहीं है, बल्कि यदि आरक्षण वाली नौकरियों को ही समाप्त कर दिया जाए तो वही काफी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सामाजिक न्याय की विरोधी पार्टियां इसी एजेंडे पर काम कर रही हैं ताकि अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से उनका संवैधानिक हक छीना जा सके।

सवाल-जवाब

आरक्षण पर वर्तमान विवाद की मुख्य वजह क्या है?
आरक्षण व्यवस्था के 70 साल पूरे होने के बाद इसके सुधार और समीक्षा की मांग को लेकर हो रहे आंदोलनों के कारण राजनीतिक दलों में घमासान मचा हुआ है।
विपक्ष का आरक्षण को लेकर मुख्य आरोप क्या है?
विपक्षी दलों का आरोप है कि सुधार के नाम पर सरकार पिछड़ों और दलितों के संवैधानिक अधिकारों को खत्म करने की साजिश रच रही है।
एनडीए के नेताओं ने आरक्षण के मुद्दे पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
चिराग पासवान और रामदास अठावले जैसे एनडीए नेताओं ने स्पष्ट किया है कि आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है और इसे कोई समाप्त नहीं कर सकता।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकारी नौकरियों को लेकर क्या आंकड़े पेश किए हैं?
कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार के विभागों में खाली पद साल 2015 के 4.21 लाख से बढ़कर 2024 में 8.24 लाख हो गए हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

आरक्षण सुधार की इस बहस का असर सीधे तौर पर देश के कॉर्पोरेट निवेश, वित्तीय बाज़ारों के सेंटिमेंट और आगामी राज्य चुनावों पर पड़ेगा। जब इस तरह के नीतिगत मुद्दों पर राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ती है, तो निवेशकों का भरोसा और स्टार्टअप इकोसिस्टम में स्थिरता अस्थायी रूप से प्रभावित होती है। यदि इस आर्थिक और सामाजिक ध्रुवीकरण को समय रहते नहीं संभाला गया, तो यह बाजार की कारोबारी गतिशीलता के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

एक क्राइम संवाददाता और कानूनी मामलों के विशेषज्ञ के रूप में, मेरा मानना है कि आरक्षण सुधार और समीक्षा की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे समूहों और राजनीतिक दलों के बीच बढ़ता यह टकराव कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर एक गंभीर चुनौती बन सकता है। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक जिस तरह से प्रदर्शन तेज हो रहे हैं और दोनों तरफ से तीखे सियासी बयान दिए जा रहे हैं, उससे सार्वजनिक सुरक्षा और शांति व्यवस्था पर सीधा असर पड़ने की आशंका है। यदि प्रशासन ने इस संवेदनशील सामाजिक-राजनीतिक तनाव को समय रहते नियंत्रित नहीं किया, तो यह जमीनी स्तर पर हिंसक झड़पों या सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान का कारण बन सकता है, जिससे पुलिस और न्याय व्यवस्था पर भारी दबाव बढ़ेगा।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR