भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर हुई ऐतिहासिक फरक्का जल संधि इसी साल दिसंबर में अपनी निर्धारित 30 साल की अवधि पूरी कर रही है। इस समझौते के खत्म होने से पहले ही इसके नवीनीकरण को लेकर राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है, क्योंकि बिहार सरकार इसके भारी नुकसानों का हवाला देते हुए इसका खुलकर विरोध कर रही है। राज्य के नेताओं का मानना है कि इस समझौते से बिहार को लगातार जल संकट और बाढ़ जैसी विभीषिकाओं का सामना करना पड़ा है, जिस पर अब केंद्र सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए।
फरक्का जल संधि का इतिहास और उसका उद्देश्य
यह द्विपक्षीय समझौता 12 दिसंबर, 1996 को भारत और बांग्लादेश के बीच अमल में आया था। इसका मुख्य मकसद सूखे मौसम यानी एक जनवरी से 31 मई के बीच पश्चिम बंगाल के फरक्का बैराज पर गंगा के पानी के बंटवारे को विनियमित करना था। इस बैराज का निर्माण मूल रूप से 1975 में इसलिए किया गया था ताकि गंगा से पानी को हुगली नदी की ओर मोड़ा जा सके। इससे गाद को बाहर निकालने में मदद मिलती थी और कोलकाता बंदरगाह पर नौकायन सुचारू रूप से चलता रहता था। हालांकि, इस व्यवस्था के कारण बांग्लादेश की तरफ पानी का बहाव काफी घट गया, जिससे वहां दक्षिणी हिस्से में पानी की भारी किल्लत, मिट्टी में खारापन और पर्यावरण से जुड़ी गंभीर चुनौतियां पैदा हो गईं। इन तमाम मुद्दों को सुलझाने के लिए ही 1996 में यह तीन दशक का बाइंडिंग फ्रेमवर्क तैयार किया गया था।
बिहार की मुख्य आपत्तियां और नुकसान
बिहार सरकार का साफ कहना है कि इस संधि की वजह से राज्य में जल प्रबंधन की स्थिति बदतर हुई है और ऊपर की तरफ बाढ़ और सूखे दोनों का संकट पैदा हो गया है। बैराज के पीछे भारी मात्रा में गाद यानी सिल्ट जमा होने की वजह से गंगा नदी की तलहटी काफी ऊंची हो गई है, जिससे नदी की प्राकृतिक जल भंडारण क्षमता खत्म हो चुकी है। इसका सबसे बुरा असर मानसून के दौरान देखने को मिलता है, जब भागलपुर और मुंगेर जैसे नजदीकी जिलों में भयंकर बाढ़ का प्रकोप झेलना पड़ता है। पिछले दो दशकों से नीतीश कुमार से लेकर सम्राट चौधरी तक के नेतृत्व में बिहार सरकार लगातार केंद्र के सामने इस बैराज और संधि के दुष्प्रभावों को उठाती रही है।
दिल्ली में उच्च स्तरीय बैठकों का दौर
संधि के नवीनीकरण की आहट के बीच बिहार का सियासी पारा चढ़ गया है। हाल ही में बिहार के उपमुख्यमंत्री और जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने केंद्रीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात कर राज्य का पक्ष मजबूती से रखा। इस उच्च स्तरीय बैठक के बाद नेताओं ने मीडिया को बताया कि राज्य ने फरक्का संधि से जुड़े तमाम नुकसानों और अपनी चिंताओं को विस्तार से केंद्र के सामने रख दिया है, और केंद्रीय मंत्री ने इस पर उचित ध्यान देने का आश्वासन भी दिया है।
राजनीतिक दलों की मांग और भविष्य की जरूरतें
जनता दल यूनाइटेड यानी JDU के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा ने भी इस संधि के रिन्यूवल का पुरजोर विरोध किया है। उनका तर्क है कि साल 2050 तक बिहार में पानी की मांग और जरूरतों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। किसी भी भावी कूटनीतिक समझौते में एक व्यापक राष्ट्रीय गाद प्रबंधन नीति और राज्य की सीधी भागीदारी होना अनिवार्य है। उनका यह भी कहना है कि पिछले 30 सालों में इस संधि की कभी समीक्षा ही नहीं की गई, जबकि गर्मियों के दिनों में जब बिहार को खुद पानी की आवश्यकता होती है, तब भी समझौते के तहत बांग्लादेश को पानी देना पड़ता है। इसके अलावा, साल 2011 में संसद के भीतर राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव ने भी इस बैराज को पूरी तरह से हटाने की पुरजोर मांग उठाई थी। अब सबकी निगाहें केंद्र की एनडीए सरकार पर टिकी हैं कि वह घरेलू बाढ़ प्रबंधन और पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक संबंधों के बीच कैसे संतुलन बिठाती है।





















