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बहूबाजार में समीक भट्टाचार्य के 1946 वाले बयान से मचा सियासी घमासान, तृणमूल बोली अपमानराजनीति
7 सित॰ 2026, 10:17 am (5 दिन पहले)· 2

बहूबाजार में समीक भट्टाचार्य के 1946 वाले बयान से मचा सियासी घमासान, तृणमूल बोली अपमान

भाजपा पश्चिम बंगाल अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य ने कोलकाता में 1946 के दंगों का जिक्र कर एकजुटता की अपील की, जिस पर तृणमूल और कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है.

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा शुरू होने से ठीक पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य के एक बयान ने सियासी माहौल गरमा दिया है. रविवार को मध्य कोलकाता के बहूबाजार इलाके में आयोजित एक खूंटी पूजा कार्यक्रम में उन्होंने शहरवासियों से एकजुटता बनाए रखने की अपील करते हुए 1946 में हुए कोलकाता के सांप्रदायिक दंगों का हवाला दिया, ताकि पूजा के दौरान माहौल शांतिपूर्ण बना रहे.

1946 के दंगों का जिक्र क्यों किया गया?

समीक भट्टाचार्य ने कार्यक्रम में दावा किया कि 1946 के दंगों के वक्त गुप्ता और जायसवाल परिवारों ने बंगाली समाज को सहारा देकर बड़ी तबाही से उबारा था. उन्होंने यह भी बताया कि इन परिवारों ने उस दौर में तलवारें बनाने के लिए जरूरी लोहा जुटाने में अपनी काफी दौलत खर्च कर दी थी, और उनके मुताबिक उत्तर कोलकाता के कई कुलीन बंगाली परिवार आज इसी वजह से मौजूद हैं. इसके साथ ही भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि पिछले कुछ बरसों में बांग्लादेश की सीमा से सटे बंगाल के इलाकों में दुर्गा पूजा का आयोजन करना बेहद मुश्किल भरा रहा है.

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मुर्शिदाबाद के मूर्तिकारों की मौत का जिक्र

अपने भाषण में भट्टाचार्य ने मुर्शिदाबाद के मूर्तिकार पिता-पुत्र हरगोबिंद दास और चंदन दास की मौत का हवाला भी दिया. उनका कहना था कि इन दोनों को काली, सरस्वती और लक्ष्मी की प्रतिमाएं बनाने में माहिर होने के चलते कथित तौर पर जान से मार दिया गया था. इसके अलावा उन्होंने यह आरोप भी दोहराया कि तृणमूल सरकार के कार्यकाल में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन की तारीख और तरीका भी प्रशासन ही तय करता था, जिससे पूजा समितियों की स्वायत्तता प्रभावित होती थी.

विपक्षी दलों ने साधा निशाना

भट्टाचार्य के इस बयान पर विपक्षी खेमे से तीखी प्रतिक्रिया आई. तृणमूल प्रवक्ता कुणाल घोष ने पलटवार करते हुए भाजपा नेता पर बंगाली समाज को अपमानित करने का आरोप मढ़ा और कहा कि बंगाली समुदाय की अपनी सांस्कृतिक परंपरा, स्वाधीनता आंदोलन की विरासत और अलग पहचान रही है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने चेताया कि इस तरह की बयानबाजी कोलकाता की साझा सांस्कृतिक विरासत को नुकसान पहुंचा सकती है, जबकि पार्टी ने इसे सियासी फायदे के लिए दिया गया बयान बताया. माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती ने भट्टाचार्य के दावों को इतिहास के तथ्यों के विपरीत बताते हुए उन्हें गैरजिम्मेदाराना करार दिया.

इस बार पूजा पंडालों में क्या बदलेगा?

भट्टाचार्य ने कार्यक्रम में यह भरोसा भी दिलाया कि इस साल शहरवासी बिना किसी बंद गेट या ट्रैफिक की रोक-टोक के पूजा पंडालों में आ-जा सकेंगे. साथ ही उन्होंने कहा कि वर्षों से पूजा का आयोजन करती आ रही समितियों को महज राजनीतिक वजहों से हटाने की किसी भी कोशिश को भाजपा का समर्थन कभी नहीं मिलेगा.

सवाल-जवाब

समीक भट्टाचार्य ने यह बयान कहां दिया?
उन्होंने रविवार को मध्य कोलकाता के बहूबाजार इलाके में हुए खूंटी पूजा कार्यक्रम में यह बयान दिया.
उन्होंने 1946 के दंगों में गुप्ता-जायसवाल परिवारों की क्या भूमिका बताई?
उनके मुताबिक इन परिवारों ने दंगों के दौरान बंगाली समाज की मदद की और तलवारें बनाने के लिए जरूरी लोहा जुटाने में अपनी दौलत लगाई.
मुर्शिदाबाद के किन मूर्तिकारों का जिक्र हुआ?
पिता-पुत्र हरगोबिंद दास और चंदन दास का, जिन्हें भट्टाचार्य के मुताबिक काली, सरस्वती और लक्ष्मी की मूर्तियां बनाने में माहिर होने के चलते मार डाला गया.
तृणमूल कांग्रेस ने इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया दी?
प्रवक्ता कुणाल घोष ने भट्टाचार्य पर बंगालियों का अपमान करने का आरोप लगाया.
कांग्रेस और माकपा ने क्या कहा?
कांग्रेस ने इसे राजनीति से प्रेरित बताया, जबकि माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती ने इसे इतिहास के तथ्यों के विपरीत करार दिया.
इस साल पूजा पंडालों में क्या बदलाव होगा?
भट्टाचार्य के मुताबिक इस बार लोग बिना बंद गेट और ट्रैफिक प्रतिबंधों के पंडालों में जा सकेंगे.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के करीब आते ही 1946 के दंगों का जिक्र राजनीतिक ध्रुवीकरण को गहरा करने की एक सोची-समझी रणनीति लगता है। बंगाल जैसे संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में अतीत के जख्मों को कुरेदने से चुनावी फायदे की भले ही उम्मीद हो, लेकिन यह प्रशासनिक और सामाजिक ताने-बाने को दीर्घकालिक नुकसान पहुँचा सकता है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा उत्सव के माहौल पर भारी पड़ सकता है और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर प्रशासन के लिए नई चुनौतियां खड़ी करेगा।

Aisha Khan@aisha-khan·4 दिन पहले

मनोरंजन और संस्कृति के दृष्टिकोण से देखें तो दुर्गा पूजा सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा मंच है। जब राजनीतिक मंचों पर अतीत के संघर्षों और संवेदनशीलता का इस तरह इस्तेमाल होता है, तो इसका सीधा असर उत्सव से जुड़ी रचनात्मकता, कला और पर्यटन पर पड़ता है। इस प्रकार की बयानबाजी से कलाकारों, मूर्तिकारों और पंडाल समितियों की कलात्मक स्वतंत्रता प्रभावित होती है, जिससे दर्शकों और पर्यटकों के बीच एक असहज माहौल बन सकता है। आने वाले दिनों में यह जरूरी है कि कला और राजनीति को अलग रखा जाए ताकि उत्सव की मूल भावना जीवित रहे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

समीक भट्टाचार्य द्वारा 1946 के दंगों और तलवार निर्माण जैसे संवेदनशील ऐतिहासिक संदर्भों का सार्वजनिक मंच पर उपयोग कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। दुर्गा पूजा जैसे बड़े उत्सव के ठीक पहले इस तरह के बयानों से ध्रुवीकरण बढ़ने और सार्वजनिक सुरक्षा को चुनौती मिलने की पूरी आशंका है। यदि प्रशासन ने एहतियाती कदम नहीं उठाए, तो यह चुनावी राजनीति के चलते राज्य में पुलिस और खुफिया तंत्र के लिए गंभीर कानून-व्यवस्था की समस्या बन सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

त्योहार के माहौल में इस प्रकार की संवेदनशीलता और राजनीतिक बयानबाज़ी का सीधा असर राज्य की अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता बाज़ारों पर पड़ता है। पश्चिम बंगाल के त्योहारी सीजन में रिटेल सेक्टर, हॉस्पिटैलिटी और पर्यटन उद्योगों को हजारों करोड़ रुपये का कारोबार मिलता है। यदि ऐसे बयानों से राजनीतिक अस्थिरता या कानून-व्यवस्था का संकट पैदा होता है, तो शहर के छोटे-बड़े व्यवसायों और स्थानीय स्टार्टअप्स की फेस्टिव सेल्स सीधे तौर पर प्रभावित होंगी, जिससे निवेशकों का भरोसा भी डगमगा सकता है।

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