नई दिल्ली। केंद्र सरकार और बिहार की सियासत में आरक्षण के नए प्रावधानों को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर ही भारी राजनीतिक घमासान मच गया है। मोदी सरकार में शामिल दो प्रमुख बिहारी नेता और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान तथा जीतन राम मांझी दलित आरक्षण के भीतर क्रीमी लेयर और उप-वर्गीकरण के विचार को लेकर पूरी तरह आमने-सामने आ चुके हैं। यह वैचारिक मतभेद अब खुलकर सड़क पर आ गया है, और हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने सार्वजनिक तौर पर जीतन राम मांझी और बिहार सरकार में मंत्री उनके बेटे संतोष सुमन से अपने-अपने मंत्री पदों से इस्तीफा देने की मांग तक कर डाली है। इस तीखे हमले के बाद हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के प्रमुख जीतन राम मांझी ने भी पलटवार करते हुए चिराग पासवान को चुनौती दी है, जिससे सत्ताधारी गठबंधन की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से गरमाया आरक्षण का मुद्दा
यह पूरा राजनीतिक विवाद अदालत के उस हालिया फैसले और उसके बाद शुरू हुई व्यापक बहसों से जुड़ा है जिसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के भीतर उप-वर्गीकरण करने तथा क्रीमी लेयर की अवधारणा को लागू करने की पैरवी की गई थी। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का स्पष्ट तर्क है कि दलित समाज के भीतर भी कई ऐसी जातियां और उप-जातियां मौजूद हैं, जिन्हें आजादी के इतने दशकों बाद भी आरक्षण का जमीनी और वास्तविक लाभ नहीं मिल पाया है। मांझी का मानना है कि समाज के सबसे ज्यादा पिछड़े, वंचित और गरीब तबके को मुख्यधारा में लाकर ऊपर उठाने के लिए यह वर्गीकरण और क्रीमी लेयर की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। उनके अनुसार, इस तरह की व्यवस्था के बिना सबसे ज्यादा जरूरतमंद गरीबों को उनके वास्तविक अधिकार कभी नहीं मिल पाएंगे।
विभाजनकारी नीति बताकर चिराग पासवान ने किया विरोध
दूसरी तरफ, चिराग पासवान इस पूरी व्यवस्था और उप-वर्गीकरण के विचार के सख्त खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं। उनका मानना है कि इस तरह के प्रावधानों और वर्गीकरण को लागू करने से दलित समाज की एकजुटता पर विपरीत असर पड़ेगा और वे बिखर जाएंगे, जिससे आरक्षण का मूल उद्देश्य और उसका मूल स्वरूप ही प्रभावित होगा। इसी बुनियादी वैचारिक मतभेद के चलते दोनों सहयोगी दलों के नेताओं के बीच जुबानी जंग तीखी हो गई है। चिराग पासवान ने जीतन राम मांझी के रुख से बेहद नाराज होकर आक्रामक तेवर अपनाए और दो टूक कहा कि जो नेता दलित समुदाय के मूलभूत हितों के खिलाफ जाकर इस प्रकार का विभाजनकारी रुख अपनाते हैं, उन्हें मंत्रिमंडल में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं बनता है। इसी आधार पर उन्होंने जीतन राम मांझी और संतोष सुमन दोनों से अपने पदों से तुरंत इस्तीफा देने की मांग की।
जीतन राम मांझी का पलटवार और भविष्य की राजनीतिक हलचल
चिराग पासवान की इस आक्रामक मांग पर तीखा पलटवार करते हुए केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि जो व्यक्ति व्यापक जनहित और गरीबों के कल्याण की असल बात को समझने में असमर्थ है और ऐसी बचकानी मांग करता है, उसे अपनी राजनीतिक समझ पर पुनर्विचार करना चाहिए। मांझी ने स्पष्ट शब्दों में दोहराया कि वे देश के सबसे शोषित और गरीबों के हक के लिए अपनी आवाज उठाते रहेंगे क्योंकि यह सामाजिक विभाजन समाज के सबसे कमजोर तबके के उत्थान के लिए अनिवार्य है। एनडीए के भीतर दो प्रमुख सहयोगी दलों के बीच इस तरह की खुलकर सामने आ रही खींचतान और बयानों के कारण विपक्षी दलों को भी सरकार पर जुबानी हमले करने का खुला मौका मिल गया है। अब राजनीतिक गलियारों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि इस अंदरूनी कलह को शांत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व क्या और किस तरह के कदम उठाता है।



















