उत्तर प्रदेश और बिहार के हालिया एमएलसी चुनावों के दौरान व्यापक पैमाने पर बूथ कैप्चरिंग, धांधली और हिंसक झड़पों की घटनाएं सामने आई हैं, जिसके बाद मतपत्रों के दौर की कमियों पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। इन चुनावों में आम जनता मतदान नहीं करती है बल्कि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के प्रतिनिधि चुने जाते हैं, और इनमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। ठप्पे वाली पर्चियों के जरिए हुए इस मतदान ने देश को उस पुरानी व्यवस्था की याद दिला दी है जिसमें बाहुबलियों का दबदबा हुआ करता था।
मतपत्रों की इस वापसी के साथ ही राजनीति से जुड़े पुराने जख्म और अराजकता का दौर भी लौट आया है। मतदान केंद्रों के बाहर से आपसी भिड़ंत और मारपीट की तस्वीरें सामने आई हैं, जिससे उन लोगों को जमीनी हकीकत का अंदाजा हो गया है जो लगातार बैलेट पेपर से चुनाव करवाने की मांग उठाते रहे हैं। कैमरा की नजर में कैद हुई इन वारदातों ने यह साफ कर दिया कि मतपत्र के माध्यम से किस तरह बूथों पर कब्जा जमाया जाता है। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि मौजूदा घटनाएं उस दौर के मुकाबले बेहद कम हैं जब कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं हुआ करती थी।
पुराने दिनों को याद करें तो ऐसे कई दौर देखे गए हैं जब मतदान के दिन दर्जनों हथियारबंद लोग गाड़ियों में सवार होकर आते थे। वे हवा में गोलियां चलाकर मतदाताओं में खौफ पैदा कर देते थे, जिसके बाद चुनाव ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी और इक्का-दुक्का पुलिसकर्मी भी छिपने को मजबूर हो जाते थे। ये बंदूकधारी सीधे मतपत्रों पर कब्जा जमाकर अपनी पसंद के ठप्पे लगाते थे और कुछ ही घंटों में पूरी प्रक्रिया को अपने पक्ष में मोड़ लेते थे। उस समय न तो हर हाथ में मोबाइल फोन होता था और न ही कैमरे, जिसके चलते इन आपराधिक कृत्यों के पुख्ता सबूत जुटाना बेहद मुश्किल काम हुआ करता था।
उत्तर प्रदेश और बिहार के कई इलाकों में दबंगों द्वारा एक ही दिन में कई-कई बूथों को अपने कब्जे में लेने के किस्से आम हुआ करते थे। कभी-कभार किसी अखबार का फोटो जर्नलिस्ट ऐसी किसी घटना को कैमरे में कैद कर लेता था, और जब अगले दिन वह तस्वीर छपती थी तो वह एक सनसनीखेज खुलासा बन जाती थी, जिसके बाद उस खास बूथ पर दोबारा मतदान करवाना पड़ता था। जिन लोगों ने केवल इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का दौर ही देखा है, वे शायद इस कल्पना भी नहीं कर सकते कि किस प्रकार बाहुबली जबरन मतदान को प्रभावित करते थे।
इस तरह की बूथ कैप्चरिंग और चुनावी लूट ने ही भारतीय राजनीति में अपराधियों और माफियाओं का दखल तेजी से बढ़ाया था। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि बूथ कब्जाने वाले ये बाहुबली खुद ही राजनीतिक मैदान में उतरकर चुनाव लड़ने लगे। आज से लगभग 30 साल पहले जब पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का चलन शुरू हुआ, तब जाकर इस वोट माफिया के असर पर धीरे-धीरे लगाम लग सकी। जो लोग आज फिर से पुरानी व्यवस्था यानी मतपत्रों के जरिए चुनाव कराने की वकालत करते हैं, वे अनजाने में ही सही, देश को उसी भयावह अतीत की तरफ धकेलने का काम कर रहे हैं।
वोट चोरी के आरोपों और विरोध प्रदर्शनों की हकीकत
दूसरी तरफ, मतपत्र से चुनाव कराने की मांग करने वाले कुछ संगठन और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाने वाले लोग हाल ही में सड़कों पर उतरे थे। हालांकि इन विरोध प्रदर्शनों में जुटने वाली भीड़ बेहद सीमित रही और इनमें मुख्य रूप से वामपंथी दलों के कार्यकर्ता ही नजर आए। 'वोट चोरी' के नाम पर बड़ा जन आंदोलन खड़ा करने के प्रयास विफल हो रहे हैं क्योंकि आम जनता इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखा रही है।
इस उदासीनता के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें समझ आती हैं। पहली यह कि मतदाता सूची में नाम जुड़वाने या कटने का मसला अब आम आदमी की रोजमर्रा की भावना से नहीं जुड़ पा रहा है, बल्कि यह सिर्फ राजनीतिक दलों तक सीमित होकर रह गया है। दूसरी वजह यह है कि चुनाव आयोग ने भी हालिया विवादों के बाद अपनी कार्यशैली में सुधार किया है, जिससे अब सूचियों में नाम दर्ज कराना काफी आसान हो गया है। जिन नागरिकों के नाम कट गए थे, उनसे चुनाव आयोग खुद संपर्क कर रहा है ताकि उनकी शिकायत दूर हो सके।
प्रशासनिक स्तर पर चुनाव प्रक्रिया की पुरानी खामियों को काफी हद तक दूर कर लिया गया है। यही कारण है कि देश के असली मतदाता, जो अपने मत की ताकत से सरकारें बनाते हैं, वे 'वोट चोरी' के इस नारे को कोई खास वजन या महत्व नहीं देते हैं। अधिक जानकारी के लिए दर्शक आज की बात कार्यक्रम का प्रसारण देख सकते हैं।
























