देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनाव संचालन प्रक्रिया को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में एक नई कानूनी अर्जी लगाई गई है। भारतीय निर्वाचन आयोग के कामकाज में कथित कमियों को दुरुस्त करने और चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया गया है। इस जनहित याचिका के जरिए न्यायपालिका से आग्रह किया गया है कि वह देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के वास्ते तुरंत कदम उठाए।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में हो उच्चस्तरीय जांच
याचिकाकर्ता और वकील विशाल तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई है कि निर्वाचन आयोग की कार्यशैली की गहराई से जांच के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए। इस प्रस्तावित कमेटी की कमान भारत के किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश या शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को सौंपे जाने का प्रस्ताव रखा गया है। याचिका के अनुसार, लोकतंत्र की रीढ़ मजबूत बनाए रखने के लिए नागरिकों का चुनाव निकाय पर पूरा भरोसा होना बेहद जरूरी है और यह न्यायिक समीक्षा उसी भरोसे को पुख्ता करेगी।
चुनावी रैलियों में धर्म के इस्तेमाल पर लगे पूर्ण प्रतिबंध
इस कानूनी अर्जी का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा चुनाव प्रचार के दौरान बढ़ते सांप्रदायिक तनाव और धार्मिक ध्रुवीकरण को रोकना है। याचिका में अदालत से मांग की गई है कि राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों को प्रचार के वक्त धार्मिक पहचान भुनाने, प्रतीकों का प्रदर्शन करने या आस्था से जुड़ी भावुक अपील करने से सख्त रूप से रोका जाए। चुनाव के दौरान वोटों के ध्रुवीकरण के लिए अक्सर धार्मिक भावनाओं को आहत किया जाता है, जिससे समाज में दरार पैदा होती है।
हेट स्पीच और भड़काऊ बयानों पर सख्त कार्रवाई का आग्रह
याचिका में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि नफरती भाषणों के माध्यम से जनमानस को उकसाने वालों पर आयोग को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। चुनाव प्रचार का आधार केवल विकास कार्य, नीतियां और जनता से जुड़े मुद्दे होने चाहिए, न कि किसी तरह का संकीर्ण एजेंडा। जनप्रतिनिधित्व कानून के नियमों को ताक पर रखने वालों के खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों की आवश्यकता जताई गई है, और आने वाले दिनों में शीर्ष अदालत इस मामले पर सुनवाई कर सकती है।



















