20 जुलाई को आयोजित सीजेपी प्रदर्शन और संसद मार्च के दौरान पुलिस के साथ हुई झड़प के बाद भारतीय राजनीति में डिजिटल संचार का एक नया दौर देखने को मिल रहा है। पारंपरिक चुनावी रैलियों, भाषणों और टेलीविजन बहसों से परे देश के शीर्ष नेता अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर अपनी मौजूदगी बेहद मजबूत कर रहे हैं। युवाओं और खास तौर पर जन-ज़ी (Gen-Z) पीढ़ी तक अपनी बात सीधे पहुंचाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों ने अपनी सोशल मीडिया गतिविधियों में नया मोड़ दिया है। डेटा बीइंग्स द्वारा 20 जुलाई के बाद किए गए विस्तृत विश्लेषण के आंकड़ों से यह साफ जाहिर होता है कि इस रणनीतिक बदलाव के कारण दोनों नेताओं के औसत इंस्टाग्राम इंगेजमेंट में अभूतपूर्व उछाल आया है।
20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के बाद इंस्टाग्राम पर बदली राजनीतिक रणनीति
संसद मार्च के दौरान हुए घटनाक्रम के बाद राजनीतिक संवाद का केंद्र बिंदु बदल गया। जन-ज़ी जिस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपना अधिकांश समय बिताती है, वहीं नेताओं ने उनसे सीधा संवाद कायम करने की योजना बनाई। डेटा बीइंग्स ने 20 जुलाई के बाद चार प्रमुख राजनीतिक इंस्टाग्राम अकाउंट्स का गहन विश्लेषण किया। इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आधिकारिक खाते शामिल थे। इस विश्लेषण से पता चला कि चारों ही अकाउंट्स के इंगेजमेंट ग्राफ में बढ़ोतरी दर्ज हुई है। हालांकि, सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली छलांग नेताओं के व्यक्तिगत पेजों पर देखने को मिली, जिससे यह संकेत मिलता है कि राजनीतिक दल अब अपनी प्राथमिक संवाद रणनीति के तौर पर इंस्टाग्राम का बहुतायत से प्रयोग कर रहे हैं।
देर रात रील्स और वीडियो कंटेंट से बढ़ा नरेंद्र मोदी का इंगेजमेंट
विश्लेषण के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंस्टाग्राम अकाउंट पर इंगेजमेंट में सबसे बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 20 जुलाई से पहले की अवधि में मोदी की प्रत्येक इंस्टाग्राम पोस्ट पर औसत इंगेजमेंट लगभग 11.9 लाख था। 20 जुलाई के बाद के आंकड़ों में यह आंकड़ा बढ़कर 46.3 लाख के स्तर पर पहुंच गया। इस प्रकार उनके औसत इंगेजमेंट में 289.9 फीसदी की जोरदार वृद्धि दर्ज की गई।
नरेंद्र मोदी की नई इंस्टाग्राम रणनीति में रील्स और नियमित वीडियो पोस्टिंग का अहम योगदान रहा है। वे देर रात करीब 12 बजे भी रील्स पोस्ट करते देखे गए, जिन्हें इंस्टाग्राम यूजर्स से व्यापक प्रतिक्रिया मिली। रात के समय पोस्ट की गई रील्स और युवाओं से जुड़े विषयों पर केंद्रित वीडियो कंटेंट की वजह से उनके इंगेजमेंट आंकड़ों में यह बड़ी छलांग देखने को मिली है।
एएमए सेशन और छात्रों के साथ संवाद से राहुल गांधी का बढ़ा ग्राफ
दूसरी तरफ राहुल गांधी ने युवाओं से जुड़ने के लिए संवादात्मक और अनौपचारिक तरीकों पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर आस्क मी एनीथिंग (AMA) सेशन आयोजित किए, जिनमें उन्होंने विभिन्न विषयों पर यूजर्स के सवालों के सीधे जवाब दिए। इसके अतिरिक्त उन्होंने छात्रों और युवाओं के साथ की गई अपनी बातचीत की रील्स भी साझा कीं।
डेटा बीइंग्स के आंकड़ों के मुताबिक, 20 जुलाई से पहले राहुल गांधी की पोस्ट्स पर औसत इंगेजमेंट 1.52 लाख था, जो 20 जुलाई के बाद बढ़कर 4.26 लाख तक पहुंच गया। यह उनके औसत इंगेजमेंट में 180.7 फीसदी की वृद्धि को दर्शाता है। हालांकि, दोनों नेताओं की व्यक्तिगत सफलता के बावजूद नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच का इंगेजमेंट गैप काफी बड़ा बना हुआ है। 20 जुलाई के बाद की अवधि में नरेंद्र मोदी का औसत इंगेजमेंट राहुल गांधी के मुकाबले लगभग 10 गुना अधिक दर्ज किया गया।
पार्टियों के आधिकारिक अकाउंट्स से कई गुना आगे निकले व्यक्तिगत नेता
डेटा बीइंग्स की रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई है कि राजनीतिक दलों के आधिकारिक इंस्टाग्राम हैंडल अपने शीर्ष नेताओं की तुलना में काफी पीछे छूट रहे हैं। कांग्रेस के आधिकारिक अकाउंट का औसत इंगेजमेंट 50 हजार से बढ़कर 72 हजार हो गया, जो कि 43.4 फीसदी की वृद्धि है। वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के आधिकारिक अकाउंट का औसत इंगेजमेंट 25 हजार से बढ़कर 34 हजार पहुंचा, जिसमें 37.1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
इन आंकड़ों से यह रुझान स्पष्ट होता है कि इंस्टाग्राम जैसे विजुअल प्लेटफॉर्म्स पर जनता किसी पार्टी के संगठन या ब्रांड के बजाय व्यक्तिगत नेताओं से जुड़ना अधिक पसंद करती है। भारत में राजनीतिक ब्रांडिंग तेजी से पर्सनालिटी सेंट्रिक होती जा रही है, जहां शीर्ष चेहरा ही डिजिटल इंगेजमेंट का मुख्य चालक बनता है।
डिजिटल इंगेजमेंट बनाम चुनावी नतीजे: क्या बदल जाएगी जमीनी राजनीति?
हालांकि यह आंकड़े निर्विवाद रूप से साबित करते हैं कि इंस्टाग्राम भारतीय राजनीति में विचारों के आदान-प्रदान का एक प्रमुख मंच बन चुका है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सोशल मीडिया इंगेजमेंट को सीधे तौर पर चुनावी नतीजों या वोट बैंक से जोड़ना पूरी तरह सही नहीं होगा। किसी रील्स या पोस्ट पर मिलने वाले लाइक्स, शेयर्स और कमेंट्स जनसमर्थन के संकेतक हो सकते हैं, परंतु वे निश्चित तौर पर वोट में बदलेंगे ही, यह कहना संभव नहीं है।
इसके बावजूद यह बिल्कुल स्पष्ट है कि भारत की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां अब जन-ज़ी की डिजिटल भाषा को समझ रही हैं और उसे अपनी रणनीति में शामिल कर रही हैं। रील्स, एएमए सेशंस और सीधी बातचीत अब महज प्रयोग न रहकर मुख्य सियासी रणनीति का हिस्सा बन चुके हैं। आने वाले समय में होने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इंस्टाग्राम की यह डिजिटल जंग जमीनी स्तर पर मतदाताओं के फैसलों को किस हद तक प्रभावित करती है।



















