बिहार की राजधानी पटना में सोमवार को एक ऐसा राजनीतिक वाकया सामने आया जिसने सबको चौंका दिया। राष्ट्रीय जनता दल के राज्य कार्यालय में पर्वत पुरुष दशरथ मांझी की पुण्यतिथि के मौके पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में पार्टी के बड़े नेता तेजस्वी यादव भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने पहुंचे थे। जब उन्हें मंच पर अपनी बात रखने और श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए बुलाया गया, तो भाषण की शुरुआत में उनसे एक बड़ी जुबान फिसलने वाली गलती हो गई। उन्होंने दशरथ मांझी को याद करने की बजाय सीधे तौर पर जीतनराम मांझी के श्रद्धांजलि समारोह में उपस्थित होने की बात कह दी। हालांकि, जैसे ही वहां मौजूद समर्थकों और कार्यकर्ताओं ने उन्हें इस भूल के बारे में टोका, उन्होंने अपनी गलती का अहसास करते हुए तुरंत अपनी बात में सुधार कर लिया था।
जीतनराम मांझी का सोशल मीडिया पर तीखा हमला
राजनीति में इस तरह की चूक विरोधी दलों के लिए बड़ा मौका बन जाती है। जैसे ही तेजस्वी यादव की यह जुबान फिसलने वाली बात जीतनराम मांझी तक पहुंची, उन्होंने तुरंत मोर्चा संभाल लिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक तीखा पोस्ट लिख डाला। उन्होंने अपने अंदाज में लिखा कि नशा शराब में होता तो बोतल नाचती, और यह नशा कुछ भी करवा सकता है। उन्होंने आगे यह भी कटाक्ष किया कि लगता है बाबू साहब का पिछली रात का नशा उतरा नहीं था, जिसके कारण वे उन्हें ही श्रद्धांजलि अर्पित कर बैठे। बात को और आगे बढ़ाते हुए उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में लिखा कि यदि यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में यह नेता जीते-जी अपने पिता लालू यादव और माता राबड़ी देवी को भी श्रद्धांजलि दे देंगे क्योंकि ऐसा नशा इंसान से कुछ भी करवा सकता है।
झारखंड के छात्र आंदोलन और अन्य मुद्दों पर भी चर्चा
इससे ठीक दो हफ्ते पहले यानी 6 अगस्त को भी तेजस्वी यादव एक अलग वजह से चर्चा में आए थे जब झारखंड में छात्रों का बड़ा प्रदर्शन चल रहा था। उस दौरान जब मीडिया ने उनसे झारखंड के छात्र आंदोलन पर प्रतिक्रिया मांगी थी, तो उन्होंने किसी प्रकार की विस्तृत बात करने से बचते हुए केवल यह कहकर बात टाल दी थी कि इस पर कल बात करेंगे... कल बात करेंगे। यह वह दौर था जब झारखंड में छात्र आंदोलन अपने चरम पर था और वहां सत्ता में काबिज महागठबंधन सरकार का राष्ट्रीय जनता दल एक अहम घटक दल था। इसके बावजूद उन्होंने झारखंड के मुद्दों पर अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुप्पी साधे रखी और पूरा ध्यान बिहार की कानून व्यवस्था तथा बंटी यादव हत्याकांड जैसे स्थानीय मामलों पर केंद्रित किया। हालांकि, बाद में हेमंत सोरेन की सरकार ने रात के समय ही छात्रों की अधिकांश मांगों को स्वीकार कर लिया था जिसके बाद वह आंदोलन समाप्त हो गया था।



















