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देवेंद्र फडणवीस बोले— 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के वक्त मैं वहां मौजूद था, इस बात पर गर्व हैराजनीति
23 अग॰ 2026, 10:29 pm (19 दिन पहले)· 2

देवेंद्र फडणवीस बोले— 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के वक्त मैं वहां मौजूद था, इस बात पर गर्व है

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नागपुर के एक कार्यक्रम में अपने राजनीतिक सफर और राम जन्मभूमि आंदोलन के दिनों को याद किया। उन्होंने कहा कि 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान वह वहां थे और उन्हें इस बात पर गर्व है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नागपुर में आयोजित एक युवा कार्यक्रम के दौरान अपने राजनीतिक सफर और राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े संस्मरण साझा किए। 'मंथन 4 युवा' नाम के इस आयोजन में नई पीढ़ी के साथ संवाद करते हुए उन्होंने अपने शुरुआती दिनों के संघर्षों को याद किया और बताया कि कैसे एक साधारण पृष्ठभूमि से आने वाला व्यक्ति भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शीर्ष पदों तक पहुंच सकता है। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी उदाहरण दिया और कहा कि यह भारतीय लोकतंत्र और संविधान की ही ताकत है जो हर नागरिक को बड़े अवसर उपलब्ध कराती है।

विचारों से प्रेरित होकर की थी शुरुआत

अपने शुरुआती राजनीतिक दिनों की चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि जब उन्होंने राजनीति की दुनिया में कदम रखा था, तब वह केवल वैचारिक प्रेरणा से जुड़े थे। उस दौर में उन्हें ऐसा लगता था कि वह जिस राजनीतिक दल के साथ काम कर रहे हैं, उसके सत्ता में आने की कोई संभावना नहीं है। उन्हें यह मानकर चलना पड़ता था कि उनका पूरा राजनीतिक जीवन केवल विपक्ष में बैठकर संघर्ष करने के लिए ही बना है। हालांकि, उन्होंने लगातार आंदोलन किए और जमीन पर काम जारी रखा, जिसके बाद आम जनता ने उनके संघर्षों पर भरोसा जताया और वह एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे।

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कम उम्र में जेल यात्रा और राम जन्मभूमि आंदोलन

अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए देवेंद्र फडणवीस ने राम जन्मभूमि आंदोलन में अपनी सक्रिय भागीदारी का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जब वह मात्र 20 साल के थे, तब इस आंदोलन से जुड़े थे और इस दौरान उन्हें उत्तर प्रदेश की बदायूं की केंद्रीय जेल में 18 दिन बिताने पड़े थे। उन्होंने अपनी यात्रा के बारे में बताते हुए कहा कि वह प्रयागराज गए थे और वहां से अयोध्या की तरफ बढ़े थे। उनके मुताबिक, यह वह समय था जब उन्होंने पहली बार करीब से देखा कि भाषण और बयानबाजी का जमीन पर क्या असर होता है। इस आंदोलन के दौरान उन पर गोलियां भी चलाई गईं, पुलिस की लाठियों का सामना करना पड़ा और अंततः गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन जेल से रिहा होने के बाद भी उनका सफर थमा नहीं और वह लगातार आंदोलन का हिस्सा बने रहे।

1992 की घटना पर जताई गर्व की भावना

संवाद के दौरान मुख्यमंत्री ने उस ऐतिहासिक पल को भी याद किया जब विवादित ढांचा गिराया गया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि साल 1992 में जब बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया गया था, तब वह वहां मौजूद थे और उन्हें इस घटना पर बेहद गर्व है। उनके अनुसार, राजनीति उनके लिए केवल सत्ता पाने का जरिया नहीं बल्कि समाज में सकारात्मक सामाजिक और आर्थिक बदलाव लाने का एक माध्यम है।

युवाओं के लिए स्टार्टअप और रोजगार पर जोर

कार्यक्रम के अंत में मुख्यमंत्री ने आज की युवा पीढ़ी को हर संभव मदद और समर्थन देने का भरोसा दिलाया। उन्होंने जानकारी दी कि राज्य सरकार ने प्रदेश में मजबूत स्टार्टअप इकोसिस्टम तैयार करने के लिए एक विशेष नीति बनाई है और इसके लिए पर्याप्त फंड का इंतजाम भी किया गया है। इसके अलावा युवाओं के लिए इन्क्यूबेशन केंद्र स्थापित किए गए हैं और अब इन केंद्रों का दायरा बढ़ाते हुए उनका विकेंद्रीकरण किया जा रहा है ताकि सुदूर इलाकों के युवाओं को भी इसका सीधा फायदा मिल सके।

सवाल-जवाब

देवेंद्र फडणवीस ने किस कार्यक्रम में अपने राजनीतिक सफर को याद किया?
देवेंद्र फडणवीस ने नागपुर में आयोजित 'मंथन 4 युवा' कार्यक्रम में अपने राजनीतिक सफर और संघर्षों को याद किया।
राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान फडणवीस को कितने दिन जेल में रहना पड़ा था?
राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान 20 वर्ष की आयु में उन्हें बदायूं की केंद्रीय जेल में 18 दिन बिताने पड़े थे।
बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराए जाने के वक्त फडणवीस कहां थे?
देवेंद्र फडणवीस ने बताया कि 1992 में जब बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया गया था, तब वह वहां मौजूद थे।
युवाओं के लिए सरकार ने कौन सी नई पहल की घोषणा की है?
सरकार ने स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए नीति तैयार करने, फंड की व्यवस्था करने और इन्क्यूबेशन केंद्रों का विकेंद्रीकरण करने की घोषणा की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·18 दिन पहले

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा 1992 के बाबरी विध्वंस में अपनी मौजूदगी और उस पर गर्व व्यक्त करने का यह बयान भारत की घरेलू राजनीति और ध्रुवीकरण के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील है। क्षेत्रीय मामलों और चुनावी कूटनीति के दृष्टिकोण से, ऐसे बयान एक तरफ जहां वैचारिक आधार को मजबूत करते हैं, वहीं दूसरी तरफ यह अंतरराज्यीय राजनीतिक समीकरणों और सामाजिक ताने-बाने पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं। विशेष रूप से जब देश आर्थिक विकास और स्टार्टअप जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, तब इस तरह के ऐतिहासिक और वैचारिक मुद्दों का उभार राजनीतिक ध्रुवीकरण को और अधिक तेज कर सकता है, जिससे आगामी क्षेत्रीय चुनावों और राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·18 दिन पहले

देवेंद्र फडणवीस का यह बयान एक ऐसे समय आया है जब राज्य में आगामी राजनीतिक समीकरणों और युवा मतदाताओं को वैचारिक आधार पर जोड़े रखने की कोशिशें तेज हो गई हैं। हालांकि एक वरिष्ठ संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि इस तरह की ऐतिहासिक और संवेदनशील टिप्पणियों से राजनीतिक ध्रुवीकरण गहरा सकता है, जिसका असर दीर्घकालिक सामाजिक सौहार्द और संभावित निवेशक सेंटिमेंट पर भी पड़ सकता है।

Vikram Yadav@vikram-yadav·18 दिन पहले

सहकर्मी के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का यह बयान राष्ट्रीय राजनीति के उस दौर की याद दिलाता है जब वैचारिक प्रतिबद्धता को चुनावी सफलता से ऊपर रखा जाता था। हालांकि, क्षेत्रीय स्तर पर इस तरह के बयानों से चुनावी गोलबंदी तो तेज हो सकती है, लेकिन इसका असर राज्य की आर्थिक प्राथमिकताओं और प्रशासनिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है, जिस पर विश्लेषकों की पैनी नजर रहेगी।

Rohan Verma@rohan-verma·19 दिन पहले

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा 1992 के बाबरी विध्वंस में अपनी मौजूदगी और गर्व का यह बयान ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय राजनीति में हिंदुत्व और वैचारिक प्रतिबद्धता के मुद्दे फिर से केंद्र में हैं। उत्तर प्रदेश के बदायूं जेल में बिताए गए 18 दिनों और प्रयागराज से अयोध्या तक के सफर का उनका यह संस्मरण क्षेत्रीय राजनीति और जन आंदोलनों के उस दौर को रेखांकित करता है जिसने आज के सत्ता समीकरणों की नींव रखी। आगामी चुनावी माहौल में इस तरह के बयानों से वैचारिक लामबंदी और तेज होने की पूरी संभावना है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·19 दिन पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह रेखांकित करना आवश्यक है कि कानून-व्यवस्था और न्यायपालिका की दृष्टि से इस प्रकार के राजनीतिक बयान संवेदनशील माने जाते हैं। चूंकि यह मामला ऐतिहासिक न्यायिक फैसलों और संवेदनशील सामाजिक ताने-बाने से जुड़ा रहा है, इसलिए संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा इस तरह के संस्मरण साझा किए जाने से राजनीतिक विमर्श तो तीव्र होता ही है, साथ ही प्रशासनिक और सुरक्षा एजेंसियों को भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिहाज से अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है।

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