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गुजरात के दिग्गज आदिवासी नेता मोहनसिंह राठवा नहीं रहे, 82 साल की उम्र में ली अंतिम सांसराजनीति
47 मिनट पहले· 2

गुजरात के दिग्गज आदिवासी नेता मोहनसिंह राठवा नहीं रहे, 82 साल की उम्र में ली अंतिम सांस

गुजरात के वरिष्ठ आदिवासी नेता और 10 बार विधायक रहे मोहनसिंह राठवा का 82 साल की उम्र में उनके पैतृक गांव उमरवा में निधन हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर गहरा दुख जताते हुए गुजरात विधानसभा में साथ बिताए पुराने दिनों को याद किया।

अर्जुन मेहताअर्जुन मेहताराजनीतिक संवाददाता 4 मिनट पढ़ें AI के लिए
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गुजरात के वरिष्ठ आदिवासी नेता और 10 बार विधायक रह चुके मोहनसिंह राठवा का रविवार को निधन हो गया। वह 82 साल के थे और उन्होंने अपने पैतृक गांव उमरवा में आखिरी सांस ली। परिवार ने ही उनके निधन की जानकारी दी। पिछले करीब चार साल से उनकी सेहत लगातार खराब चल रही थी, यही वजह थी कि उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी। राठवा की गिनती गुजरात के उन गिने चुने नेताओं में होती थी जिन्होंने दशकों तक आदिवासी इलाकों की सियासत में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी। खबर सामने आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा दुख जताया और उनके साथ गुजरात विधानसभा में बिताए पुराने दिनों को याद किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने जताया शोक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर मोहनसिंह राठवा को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने लिखा, गुजरात सरकार के पूर्व मंत्री मोहन सिंह राठवा के निधन की खबर से मुझे बहुत दुख हुआ। मुझे गुजरात विधानसभा में उनके साथ सालों तक काम करने का मौका मिला। आदिवासी समुदाय के हर तरह के विकास, जनसेवा और लोगों की भलाई के लिए उनका समर्पण और योगदान हमेशा याद रखा जाएगा। मैं प्रार्थना करता हूं कि भगवान दिवंगत आत्मा को शांति दें और उनके दुखी परिवार वालों को यह दुख सहने की ताकत दें। ओम शांति। पीएम मोदी के इस संदेश से साफ झलकता है कि उनका और राठवा का रिश्ता महज सियासी नहीं, बल्कि बरसों पुराने साथ पर टिका था।

बेटे राजेंद्रसिंह ने लिखी भावुक पोस्ट

मोहनसिंह के बेटे राजेंद्रसिंह राठवा ने भी सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपने पिता को याद करते हुए एक भावुक पोस्ट डाली। उन्होंने लिखा, मोहनसिंह राठवा केवल एक नेता ही नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले मजबूत नेता थे। जमीन से जुड़े इस नेता ने लंबे समय से अस्वस्थता के कारण सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी और बीमारी से जूझते हुए आज उन्होंने अंतिम सांस ली। जनसेवा को जीवन का ध्येय बनाने वाले मेरे पूज्य पिता के निधन से हमारे परिवार को अपूरणीय क्षति हुई है। सामाजिक सेवा, जनकल्याण और मानवीय मूल्यों के लिए उन्होंने जीवनभर जो कार्य किए, वे हमेशा हमें प्रेरित करते रहेंगे। ओम शांति। इस पोस्ट से अंदाजा लगाया जा सकता है कि राठवा का परिवार और समर्थक इस नुकसान से कितने आहत हैं।

सरपंच से विधानसभा तक का सफर

मोहनसिंह राठवा की सियासी पारी की शुरुआत साल 1965 में हुई, जब वह पहली बार सरपंच चुने गए। इसके सात साल बाद, 1972 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर पावी जेतपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद के वर्षों में वह कुछ समय के लिए जनता पार्टी और फिर जनता दल से भी जुड़े रहे और दोनों ही दलों के टिकट पर विधायक चुने गए। साल 1998 में उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता। अपने विधानसभा क्षेत्र में सिंचाई के पानी की पुरानी समस्या को सुलझाने के लिए उन्हें खासतौर पर याद किया जाता है। सुखी सिंचाई योजना का श्रेय भी बड़े पैमाने पर उन्हीं को दिया जाता है, जिसने इलाके के किसानों की जिंदगी आसान बनाई।

10 बार विधायक, सिर्फ एक चुनाव हारे

राठवा गुजरात के सबसे वरिष्ठ और सबसे लोकप्रिय आदिवासी नेताओं में शुमार थे। अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित छोटा उदयपुर और पावी जेतपुर विधानसभा सीटों से वह कुल मिलाकर 10 बार विधायक चुने गए, जो अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड है। साल 1990 से 1995 के बीच वह कांग्रेस सरकार में मंत्री भी रहे। अपने पूरे राजनीतिक करियर में वह सिर्फ एक बार, यानी 2002 में विधानसभा चुनाव हारे, जब गोधरा दंगों की पृष्ठभूमि में हुए इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार ने उन्हें शिकस्त दी थी। इसके बाद हुए चुनावों में उन्होंने वापसी तो की, लेकिन हर बार उनकी जीत का अंतर घटता चला गया। साल 2012 में उन्होंने भाजपा के गुलाबसिंह राठवा को करीब 2,500 वोटों से हराया, जबकि 2017 के चुनाव में भाजपा के ही अर्जुन राठवा को महज करीब 1,000 वोटों के मामूली अंतर से पराजित किया।

2022 में बेटे के साथ थामा भाजपा का दामन

साल 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मोहनसिंह राठवा ने अपने बेटे राजेंद्रसिंह राठवा के साथ भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था। यह उनके करीब छह दशक लंबे सियासी सफर का एक बड़ा मोड़ माना गया। पार्टी बदलने के बावजूद आदिवासी इलाकों में उनकी पकड़ पर कोई खास असर नहीं पड़ा, और परिवार की सियासी विरासत बरकरार रही। इसी साल राजेंद्रसिंह राठवा छोटा उदयपुर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए, जिससे पिता की सियासी विरासत बेटे के हाथों आगे बढ़ती दिखी।

अन्य नेताओं ने भी दी श्रद्धांजलि

राज्य के वन मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने मोहनसिंह राठवा के निधन पर शोक जताते हुए कहा, जनसेवा, जनकल्याण और आदिवासी समाज के उत्थान के लिए समर्पित उनका जीवन हमेशा प्रेरणा देता रहेगा। गुजरात विधानसभा में उनके साथ काम करने का अवसर मिलना मेरे लिए सदैव स्मरणीय रहेगा। वहीं गुजरात भाजपा अध्यक्ष जगदीश विश्वकर्मा ने कहा कि जनसेवा के प्रति मोहनसिंह राठवा की अटूट निष्ठा, आदिवासी समाज के उत्थान के लिए उनके प्रयास और जनकल्याण में उनका अमूल्य योगदान हमेशा याद रखा जाएगा। नेताओं की इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि राठवा का प्रभाव सिर्फ उनकी पार्टी या इलाके तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे गुजरात की सियासत में उनकी अलग पहचान थी।

इसका आप पर असर

यह खबर सीधे तौर पर आम आदमी की जेब या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित नहीं करती, लेकिन गुजरात की आदिवासी राजनीति के लिहाज से इसके मायने अहम हैं।

  • भारत में: यह घटना देश भर में आदिवासी समुदायों के लंबे संघर्ष और उनके नेताओं के राजनीतिक योगदान की याद दिलाती है, जो सामाजिक जागरूकता के लिहाज से मायने रखता है।
  • गुजरात में: छोटा उदयपुर और पावी जेतपुर जैसी आदिवासी बहुल सीटों पर मोहनसिंह राठवा जैसे दिग्गज नेता की कमी महसूस होगी, हालांकि उनके बेटे राजेंद्रसिंह राठवा पहले से ही छोटा उदयपुर से विधायक हैं, जिससे इलाके में उनकी राजनीतिक विरासत आगे बढ़ती रहेगी।

प्रेरणा और सीख

मोहनसिंह राठवा का जीवन दिखाता है कि जमीन से जुड़े रहकर और लगातार जनता की सेवा करके कैसे एक लंबा और असरदार सार्वजनिक जीवन बनाया जा सकता है।

  • गांव के स्तर से शुरुआत: उन्होंने अपना सफर 1965 में सरपंच के तौर पर शुरू किया और धीरे धीरे विधानसभा तक का सफर तय किया, जो दिखाता है कि बड़ी राजनीतिक पारी के लिए जमीनी स्तर से जुड़ाव जरूरी है।
  • असली मुद्दों पर फोकस: सिंचाई के पानी जैसी बुनियादी समस्या को सुलझाकर और सुखी सिंचाई योजना के जरिए उन्होंने दिखाया कि जनसेवा का मतलब सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि लोगों की असली दिक्कतें दूर करना है।
  • हार के बाद वापसी: 2002 में मिली इकलौती हार के बाद भी उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी और अगला चुनाव जीतकर वापसी की, जो दिखाता है कि एक झटके को करियर का अंत नहीं मानना चाहिए।
  • लंबे समय तक भरोसा बनाए रखना: 10 बार विधायक चुने जाना यह साबित करता है कि लगातार जनता से जुड़ाव बनाए रखकर ही दशकों तक भरोसा कायम रखा जा सकता है।

सवाल-जवाब

मोहनसिंह राठवा का निधन कब और कहां हुआ?
उनका निधन रविवार को उनके पैतृक गांव उमरवा में हुआ, वह 82 साल के थे।
मोहनसिंह राठवा कुल कितनी बार विधायक रहे?
वह छोटा उदयपुर और पावी जेतपुर विधानसभा सीटों से कुल 10 बार विधायक चुने गए।
उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कब मंत्री पद संभाला?
वह साल 1990 से 1995 के बीच कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे।
उन्होंने अपने पूरे करियर में कितनी बार चुनाव हारा?
वह सिर्फ एक बार, 2002 में गोधरा दंगों की पृष्ठभूमि में हुए चुनाव में हारे।
वह भारतीय जनता पार्टी में कब शामिल हुए?
वह 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने बेटे राजेंद्रसिंह राठवा के साथ भाजपा में शामिल हुए।
उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या कहा?
पीएम मोदी ने कहा कि उन्हें गुजरात विधानसभा में राठवा के साथ काम करने का मौका मिला और आदिवासी समुदाय के लिए उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।
उनका बेटा राजेंद्रसिंह राठवा फिलहाल क्या भूमिका में हैं?
राजेंद्रसिंह राठवा साल 2022 से छोटा उदयपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं।
मोहनसिंह राठवा किस योजना के लिए खासतौर पर जाने जाते हैं?
उन्हें अपने क्षेत्र में सिंचाई की समस्या सुलझाने और सुखी सिंचाई योजना के लिए खासतौर पर याद किया जाता है।
अर्जुन मेहता
लेखक के बारे मेंअर्जुन मेहताराजनीतिक संवाददाता दिल्ली
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अर्जुन मेहता एक राजनीतिक संवाददाता हैं जो सरकारी नीतियों, चुनावों, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और ब्रेकिंग राजनीतिक ख़बरों को कवर करते हैं। वे अहम राजनीतिक घटनाक्रमों पर समय पर अपडेट और विश्लेषण देते हैं।

अर्जुन मेहता एक राजनीतिक संवाददाता हैं जो राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सरकारी नीति, चुनाव, कूटनीति और विधायी घटनाक्रमों में विशेषज्ञता रखते हैं। वे ब्रेकिंग राजनीतिक ख़बरों, नीतिगत फ़ैसलों, चुनावी अभियानों और जनचर्चा व शासन को आकार देने वाली भू-राजनीतिक घटनाओं पर रिपोर्ट करते हैं। सटीकता, निष्पक्षता और गहन रिपोर्टिंग पर ज़ोर देते हुए अर्जुन जटिल राजनीतिक मुद्दों और समाज पर उनके असर का स्पष्ट विश्लेषण देते हैं। उनकी कवरेज में संसदीय मामले, राजनीतिक दल, नेतृत्व परिवर्तन, लोक नीति और वैश्विक कूटनीतिक संबंध शामिल हैं।

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