कांग्रेस पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपनी बहुप्रतीक्षित आत्मकथा की आधिकारिक घोषणा कर दी है। 'Belonging: A Journey of Love' शीर्षक वाली यह पुस्तक आगामी 10 नवंबर को पाठकों के सामने आने वाली है। 544 पन्नों के इस व्यापक संस्मरण में सोनिया गांधी ने अपने जीवन के उन संवेदनशील पहलुओं और भावनाओं को उजागर किया है जिन्हें उन्होंने दशकों तक अपनी व्यक्तिगत निजता के दायरे में सहेज कर रखा था। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनके जीवन में आए गहरे व्यक्तिगत दुख और अपनों को खोने की असह्य वेदना ही उन्हें अनिच्छा के बावजूद राजनीति के सार्वजनिक मंच पर लेकर आई। यह पुस्तक पाठकों को भारत के एक बेहद प्रभावशाली राजनीतिक परिवार की आंतरिक मानवीय कहानी और बीते छह दशकों के राष्ट्रीय बदलावों को एक अलग नजरिए से देखने का अवसर प्रदान करेगी।
अपने जीवन के अनुभवों को साझा करने की भावनात्मक चुनौती
आत्मकथा की घोषणा के अवसर पर जारी एक आधिकारिक वक्तव्य में सोनिया गांधी ने स्वीकार किया कि अपने अतीत के बारे में लिखना उनके लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था। उन्होंने कहा कि इसके लिए उन्हें उन पलों और यादों को दोबारा जीना पड़ा जिन्हें उन्होंने हमेशा अपने दिल की गहराइयों में संजोकर रखा था। राजनीति में प्रवेश से पहले वह अपनी और अपने परिवार की निजता की पूरी मुस्तैदी से रक्षा करती थीं। हालांकि, जीवन में आए दुखों के बड़े आघातों ने उनकी जीवन रेखा को हमेशा के लिए बदल दिया।
सोनिया गांधी ने यह भी रेखांकित किया कि गांधी परिवार के बारे में सार्वजनिक रूप से पहले भी बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन बहुत कम विवरण ऐसे रहे हैं जो परिवार के महत्वपूर्ण फैसलों के पीछे छिपी वास्तविक भावनाओं, उनकी कार्यशैली और उनकी मानवीय कमजोरियों की गहराई तक पहुंच सके हों। उनके अनुसार, यह संस्मरण कई मायनों में उनके परिवार की सहज और वास्तविक मानवीयता को समर्पित एक विनम्र प्रयास है। वह चाहती हैं कि यह किताब उनके जीवन में आई अपार खुशियों और गहरी निराशाओं से भरी भावनात्मक यात्रा की प्रामाणिक गवाह बने।
प्रकाशन विवरण, प्रतियां और उपलब्ध संस्करण
सोनिया गांधी के इस ऐतिहासिक संस्मरण को प्रसिद्ध प्रकाशन संस्थान अल्फ्रेड ए. नॉफ द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है। न्यूयॉर्क में मुख्यालय रखने वाले इस प्रकाशक ने घोषणा की है कि पुस्तक को 10 नवंबर को वैश्विक स्तर पर जारी किया जाएगा। यह किताब हार्डकवर और ई-बुक के साथ-साथ ऑडियो संस्करण में भी पाठकों और श्रोताओं के लिए उपलब्ध कराई जाएगी।
प्रकाशन गृह ने पुस्तक की पहली छपाई के लिए 100,000 प्रतियों की घोषणा की है, जो इस आत्मकथा को लेकर पाठकों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच बने भारी कौतुक को दर्शाती है। पुस्तक में सोनिया गांधी के शुरुआती जीवन से लेकर आधुनिक भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण पड़ावों तक का सिलसिलेवार विवरण दर्ज किया गया है।
कैंब्रिज की पहली मुलाकात से भारत के साथ गहरे जुड़ाव तक
इस आत्मकथा का शुरुआती अध्याय वर्ष 1965 के इंग्लैंड के कैंब्रिज शहर से शुरू होता है। वहां 19 साल की छात्रा सोनिया माइनो की मुलाकात राजीव गांधी से हुई थी। दोनों के बीच पहली ही नजर में प्रेम हो गया, जो आगे चलकर विवाह के अटूट बंधन में बदला। इसके बाद सोनिया गांधी भारत आईं और देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बहू बनीं।
पुस्तक में उनके भारतीय जीवन में ढलने के शुरुआती दिनों का बड़ा सजीव वर्णन है। इसमें हिंदी भाषा सीखने के उनके प्रयासों, पहली बार साड़ी पहनने के अनुभवों और पारंपरिक भारतीय व्यंजनों का स्वाद लेने की उनकी यात्रा को शामिल किया गया है। सोनिया गांधी ने उल्लेख किया है कि जब वह राजनीति से दूरी बनाकर अपने अतीत को देखती हैं, तो उन्हें महसूस होता है कि इटली के एक छोटे से कस्बे की सादगी से लेकर भारत जैसे विशाल देश की जटिलताओं के बीच उनके जीवन को जोड़ने वाली मुख्य कड़ी प्रेम और निष्ठा ही रही है।
व्यक्तिगत त्रासदियों का दौर और राजनीति में कदम रखने का दबाव
संस्मरण में गांधी परिवार पर टूटे त्रासदियों के सिलसिले का भी पूरा उल्लेख है। राजीव गांधी के छोटे भाई संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में असमय मृत्यु के बाद, वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही आवास पर हत्या कर दी गई। इस दुखद घटना के बाद राजीव गांधी ने देश के प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। लेकिन इसके महज सात साल बाद, 1991 में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की भी एक भीषण आत्मघाती हमले में हत्या कर दी गई।
सोनिया गांधी ने लिखा है कि राजीव गांधी के निधन के बाद उन पर सक्रिय राजनीति में शामिल होने का भारी दबाव था। उन्होंने कई वर्षों तक इस दबाव का मुकाबला किया और खुद को तथा अपने बच्चों को राजनीति से दूर रखा। लेकिन अंततः परिस्थितियों और पार्टी के प्रति जिम्मेदारी के अहसास के कारण उन्हें सक्रिय राजनीति के मैदान में कदम रखना पड़ा।
2004 का फैसला और छह दशकों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
आत्मकथा में उस ऐतिहासिक मोड़ का भी विस्तार से जिक्र है जब वर्ष 2004 के आम चुनावों में कांग्रेस नीत गठबंधन को बड़ी जीत मिली थी। सर्वसम्मति से नेता चुने जाने के बावजूद सोनिया गांधी ने देश का प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। इस फैसले के पीछे की सोच और भावनाओं को पुस्तक में पहली बार उनके अपने शब्दों में रखा गया है।
सोनिया गांधी के अनुसार, उनकी यह जीवन यात्रा पाठकों को पिछले छह दशकों में भारत के भीतर आए सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलावों को समझने का एक अनूठा और सीधा नजरिया देती है। उन्होंने भारत को एक ऐसा बेहद खूबसूरत देश बताया है, जिसे वह पूरे दिल से अपना मानती हैं और जिसकी माटी से उनका अटूट नाता बन चुका है।





















