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जाति जनगणना पर मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखा पत्र, मौजूदा प्रश्नावली को रद्द करने की उठाई मांगराजनीति
25 अग॰ 2026, 2:28 pm (17 दिन पहले)· 1

जाति जनगणना पर मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखा पत्र, मौजूदा प्रश्नावली को रद्द करने की उठाई मांग

कांग्रेस नेताओं मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जाति जनगणना के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने खुली प्रश्नावली को खारिज करते हुए प्रमाणित सूची के आधार पर नई प्रक्रिया शुरू करने की मांग की है।

नई दिल्ली में राजनीतिक गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आ रही है जहाँ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक संयुक्त पत्र भेजा है। इस पत्र के माध्यम से दोनों शीर्ष नेताओं ने देश में प्रस्तावित जाति आधारित जनगणना की मौजूदा प्रक्रिया पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि जिस तरह से अभी आंकड़े जुटाने की रूपरेखा तैयार की गई है, वह जमीनी स्तर पर सही परिणाम नहीं दे पाएगी। इसलिए उन्होंने तत्काल प्रभाव से मौजूदा प्रश्नावली को रद्द करने और एक प्रमाणित जाति सूची के आधार पर नई प्रश्नावली तैयार किए जाने की पुरजोर मांग की है।

सोशल मीडिया पर साझा किए गए विचार

इस पूरे मामले को लेकर मल्लिकार्जुन खरगे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी बात विस्तार से रखी है। उन्होंने अपने पोस्ट में स्पष्ट शब्दों में कहा कि ओपन-एंडेड यानी खुले-समाप्त सवालों के माध्यम से किसी भी स्थिति में जातियों की सही और सटीक गिनती होना संभव नहीं है। यदि लोग अपनी मर्जी से अलग-अलग नाम और उपजातियां लिखवाएंगे, तो आंकड़े पूरी तरह बिखर जाएंगे। इसका सबसे बड़ा और नुकसानदायक असर देश के ओबीसी, अति पिछड़े और तमाम वंचित समुदायों पर पड़ेगा। खरगे ने आगे जोर देकर कहा कि उनकी मांग बिल्कुल साफ है कि पुरानी प्रश्नावली को पूरी तरह खारिज किया जाए और राजनीतिक दलों, विषय विशेषज्ञों तथा आम जनता के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही नया प्रारूप तय किया जाए।

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पत्र में सामाजिक न्याय और आंकड़ों की महत्ता पर जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे गए इस औपचारिक पत्र में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने विस्तार से समझाया है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियां बिना सटीक और विश्वसनीय आंकड़ों के कभी भी पूरी नहीं हो सकतीं। किसी भी समुदाय की सही संख्या और उसकी वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सही आकलन तभी किया जा सकता है जब गिनती का तरीका पूरी तरह वैज्ञानिक और त्रुटिहीन हो। नेताओं का आरोप है कि सरकार ने जनगणना के दौरान जाति की जानकारी दर्ज करने के लिए जो खुला-समाप्त प्रश्न वाला विकल्प चुना है, वह बेहद भ्रामक प्रकृति का है क्योंकि इसमें हर व्यक्ति अपनी पसंद या स्थानीय उच्चारण के अनुसार अपनी जाति का नाम दर्ज करवा देगा।

आंकड़ों के बिखरने और उपजातियों के प्रभाव की आशंका

कांग्रेस नेताओं ने अपनी आपत्तियों को रेखांकित करते हुए पत्र में लिखा है कि भारत में एक ही जाति को अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नामों, उपजातियों और स्थानीय भाषाओं से जाना जाता है। ऐसी स्थिति में यदि एक ही सामाजिक समूह के लोग जनगणना के वक्त अलग-अलग प्रविष्टियां करवाएंगे, तो एक ही जाति हजारों अलग-अलग टुकड़ों में बंट जाएगी। देश भर से लाखों जातियों के नाम सामने आ जाएंगे जिससे इस पूरी कवायद से मिलने वाला डेटा पूरी तरह अनुपयोगी हो जाएगा। जब किसी खास समुदाय की वास्तविक आबादी ही सामने नहीं आएगी, तो उसकी भलाई के लिए बनने वाली नीतियां भी प्रभावित होंगी। इसके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में मिलने वाले अवसर, रोजगार के अवसर, सरकारी योजनाएं और सामाजिक न्याय से जुड़े तमाम नीतिगत फैसले गलत आंकड़ों के कारण नुकसान उठाएंगे।

ओबीसी आबादी और ड्रॉप-डाउन सूची का समाधान

पत्र में इस बात की भी तीखी आलोचना की गई है कि इस पूरी प्रक्रिया से यह भी साफ नहीं हो पाएगा कि देश में कुल ओबीसी आबादी कितनी है, क्योंकि इस प्रश्नावली में पिछड़ा वर्ग शब्द तक को शामिल नहीं किया गया है। इसके समाधान के रूप में नेताओं ने सुझाव दिया है कि पहले से मौजूद व्यवस्था का उपयोग किया जाए। जिस तरह अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की गणना के दौरान ड्रॉप-डाउन सूची का इस्तेमाल किया जाता है, वैसा ही प्रबंध अन्य जातियों के लिए भी किया जाना चाहिए। यह प्रमाणित सूची सरकार के पास पहले से उपलब्ध सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग सूची और भारतीय मानवशास्त्र सर्वेक्षण के आधार पर बेहद आसानी से तैयार की जा सकती है।

बिहार और तेलंगाना के उदाहरणों का हवाला

कांग्रेस के दोनों दिग्गज नेताओं ने अपने इस पत्र के साथ बिहार और तेलंगाना में हुए जाति आधारित सर्वेक्षणों का भी विशेष रूप से उल्लेख किया है। उनका तर्क है कि उन दोनों राज्यों के सर्वेक्षणों में भी पहले से तैयार और प्रमाणित की गई जाति सूचियों का ही व्यावहारिक तरीका अपनाया गया था और संदर्भ के रूप में उन सूचियों को पत्र के साथ संलग्न भी किया गया है। अंत में उन्होंने दो टूक कहा कि वर्तमान तरीके से की जा रही इस जाति जनगणना को वे स्वीकार नहीं करते हैं और सरकार को चाहिए कि वह जनता के बीच जाकर पूरी पारदर्शिता के साथ नई प्रश्नावली तैयार करे ताकि हर वर्ग की सही संख्या देश के सामने आ सके।

सवाल-जवाब

मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र क्यों लिखा है?
उन्होंने जाति जनगणना की मौजूदा प्रश्नावली और उसके खुला-समाप्त स्वरूप पर गंभीर चिंता जताते हुए इसे रद्द करने की मांग की है।
खुली प्रश्नावली से क्या नुकसान होने की आशंका जताई गई है?
नेताओं का कहना है कि एक ही जाति के अलग-अलग नाम दर्ज होने से आंकड़े बिखर जाएंगे और पिछड़ों तथा वंचितों को नुकसान होगा।
कांग्रेस नेताओं ने जाति जनगणना के लिए क्या व्यावहारिक समाधान सुझाया है?
उन्होंने तेलंगाना और बिहार की तरह पहले से प्रमाणित जातियों की एक ड्रॉप-डाउन सूची या पूर्व-तैयार सूची का उपयोग करने का सुझाव दिया है।
इस पत्र में किन राज्यों के जाति सर्वेक्षणों का हवाला दिया गया है?
इस पत्र में तेलंगाना और बिहार राज्यों में पहले कराए गए जाति सर्वेक्षणों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·17 दिन पहले

जाति जनगणना की प्रक्रिया में ओपन-एंडेड प्रश्नावली का उपयोग डेटा की प्रामाणिकता और प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए एक गंभीर तकनीकी चुनौती बन सकता है। जब तक प्रविष्टियों के लिए एक प्रमाणित और मानकीकृत सूची का उपयोग नहीं किया जाता, तब तक आंकड़ों के बिखरने की आशंका बनी रहेगी, जिससे भविष्य में सामाजिक न्याय और कल्याणकारी नीतियों के निर्धारण पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·17 दिन पहले

करण मल्होत्रा द्वारा उठाए गए तकनीकी पहलू को आगे बढ़ाते हुए, यदि इस डेटा को डिजिटल एसेट्स या नीति-निर्माण के बड़े डेटाबेस से जोड़ा जाए, तो मानकीकरण की यह कमी वित्तीय और प्रशासनिक प्रणालियों में भारी विसंगति पैदा कर सकती है। यदि डेटाबेस के स्तर पर ही प्रविष्टियां असंगत होंगी, तो एल्गोरिदम और डेटा एनालिटिक्स पर आधारित भविष्य के आर्थिक और सामाजिक विकास मॉडल भी भ्रामक परिणाम देंगे, जिससे संसाधनों के आवंटन पर दीर्घकालिक नकारात्मक असर पड़ेगा।

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