राजनाथ सिंह ने स्वामी विवेकानंद के साल 1893 के ऐतिहासिक शिकागो भाषण को भारतीय सभ्यता का निर्णायक मोड़ बतायाद ऑफिस की याद सताने पर जरूर देखें ये 6 बेहतरीन ऑफिस कॉमेडी फिल्में, मिलेगा भरपूर मनोरंजनगंगा के बढ़ते जलस्तर से भोजपुर के घांघर में गहराया चारे का संकट, भुखमरी की कगार पर पहुंचे मवेशीअफगानिस्तान टी20 सीरीज से पहले टीम इंडिया की बढ़ी परेशानी, नेट प्रैक्टिस के दौरान चोटिल हुए ईशान किशननई दिल्ली में रूसी राष्ट्रपति का बिना प्रोटोकॉल वाला इशारा, अजित डोभाल से पुतिन की मुलाकात के क्या हैं कूटनीतिक मायने?कर्क साप्ताहिक राशिफल 13-19 सितंबर के लिए: मंगल के गोचर से करियर और आर्थिक जीवन में बदलाव, जानें अपना भाग्यभाई किंग हेराल्ड के अंतिम संस्कार के दो दिन बाद नॉर्वे की राजकुमारी ऐस्ट्रिड का निधन121 दिनों तक देवगुरु बृहस्पति की वक्री चाल: 6 राशियों के करियर और धन लाभ में आएगा बड़ा मोड़पायलटों के लिए ड्रग टेस्ट अनिवार्य, एयर इंडिया घटना के बाद DGCA का आदेशगूगल फोटोज की इन 10 सीक्रेट सेटिंग्स से बचाएं स्टोरेज और सुरक्षित रखें अपनी प्राइवेसी
झारखंड में खनिज अधिकारों को लेकर गरमाई सियासत, राधाकृष्ण किशोर ने बाबूलाल मरांडी को लिखा पत्रराजनीति
25 अग॰ 2026, 12:12 am (18 दिन पहले)· 3

झारखंड में खनिज अधिकारों को लेकर गरमाई सियासत, राधाकृष्ण किशोर ने बाबूलाल मरांडी को लिखा पत्र

झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने केंद्र के MMDR कानून संशोधन पर चिंता जताते हुए नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी को पत्र लिखा है। इससे राज्य को करीब 14,000 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान की आशंका है।

रांची में खनिज संपदा और आर्थिक अधिकारों के मुद्दों पर राजनीति गर्मा गई है। झारखंड सरकार के वित्त, योजना एवं विकास मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने राज्य के हकों की सुरक्षा के लिए नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी को एक पत्र प्रेषित किया है। इस खत के जरिए उन्होंने केंद्र सरकार की ओर से खान खनिज विकास विनियमन यानी MMDR कानून में लाए जा रहे संशोधनों को लेकर गहरी आपत्ति और चिंता प्रकट की है।

राजस्व को भारी चूना लगने का अनुमान

पत्र में इस बात का विशेष तौर पर जिक्र किया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार झारखंड सरकार ने विधानसभा के माध्यम से एक विधेयक पारित करवाया था, जिसके तहत खनन क्षेत्रों पर सेस लगाने का प्रावधान किया गया था। इस व्यवस्था के जरिए वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान लगभग 14,000 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाए जाने का अनुमान लगाया गया था। मंत्री का मानना है कि केंद्र द्वारा MMDR कानून में धारा-9D जोड़े जाने के कारण झारखंड इस विशाल राजस्व से पूरी तरह महरूम हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, अलग-अलग कोयला कंपनियों की तरफ राज्य के पास बकाया चल रही 1,36,042 करोड़ रुपये की राशि की वसूली पर भी बुरा प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई है।

ये भी पढ़ें

विस्थापन का दर्द और जनता की समस्याएं

मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने प्रदेश के आदिवासी समाज और जमीनी हालातों का हवाला देते हुए लिखा है कि खनन गतिविधियों से होने वाला सारा आर्थिक फायदा केंद्र सरकार के हिस्से में जाता है, जबकि झारखंड के आम नागरिकों को विस्थापन का दर्द, अपनी ही जमीन से बेदखल होने की मजबूरी, गंभीर पर्यावरण प्रदूषण, टूटी-फूटी जर्जर सड़कें और स्वास्थ्य संबंधी विकट समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उन्होंने बाबूलाल मरांडी से अनुरोध किया कि वे राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री और आदिवासी समुदाय के एक जागरूक प्रतिनिधि होने के नाते इन समस्याओं और यहां के लोगों के दर्द को अच्छी तरह महसूस कर सकते हैं।

दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर राज्य हित सर्वोपरि

इस पत्र में इस बात पर भी खास जोर डाला गया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रतिद्वंदिता और मतभेद होना स्वाभाविक है, परंतु किसी भी दल या विचारधारा के हितों से ऊपर उठकर हमेशा राज्य का हित ही सर्वोपरि होना चाहिए। वित्त मंत्री ने अपने संदेश में स्पष्ट तौर पर कहा कि सरकारें आती और जाती रहती हैं, लेकिन राज्य हमेशा रहने वाला एक स्थायी तत्व है।

केंद्र के समक्ष मजबूती से पक्ष रखेगी सरकार

मंत्री ने भरोसा जताया है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में राज्य सरकार इस गंभीर विषय को पूरी ताकत के साथ केंद्र सरकार के समक्ष उठाएगी और जरूरत पड़ने पर विभिन्न संवैधानिक मंचों का भी सहारा लिया जाएगा। अंत में उन्होंने नेता प्रतिपक्ष से अपील की है कि राजनीतिक वफादारी से ऊपर उठकर प्रदेश के प्रति निष्ठा का परिचय दें। उन्होंने आग्रह किया कि वे अपने प्रभाव और प्रदेश भाजपा के माध्यम से केंद्र के सामने झारखंड के इन महत्वपूर्ण वित्तीय और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए जोरदार पैरवी करें।

सवाल-जवाब

राधाकृष्ण किशोर कौन हैं?
राधाकृष्ण किशोर झारखंड सरकार के वित्त, योजना एवं विकास मंत्री हैं।
उन्होंने पत्र किसे लिखा है?
उन्होंने यह पत्र राज्य के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी को लिखा है।
कितने राजस्व के नुकसान का अनुमान है?
एमएमडीआर कानून में संशोधन के कारण झारखंड को वित्तीय वर्ष 2026-27 में लगभग 14,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होने का अनुमान है।
कोयला कंपनियों पर कितनी बकाया राशि है?
विभिन्न कोयला कंपनियों के पास झारखंड की 1,36,042 करोड़ रुपये की बकाया राशि फंसी हुई है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sandeep Yadav@sandeep-yadav·17 दिन पहले

झारखंड के खनिज अधिकारों और १४,००० करोड़ रुपये के संभावित राजस्व नुकसान का यह राजनीतिक विवाद सीधे तौर पर राज्य के बुनियादी ढांचे और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करेगा। यदि केंद्र सरकार द्वारा एमएमडीआर कानून में संशोधन लागू होते हैं, तो न केवल राज्य की वित्तीय स्थिति पर असर पड़ेगा, बल्कि लंबित बकाये की वसूली और विस्थापितों के पुनर्वास पर भी बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर राजनीतिक दल इस आर्थिक मोर्चे पर केंद्र के सामने किस प्रकार एकजुट होकर अपनी बात रखते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·17 दिन पहले

झारखंड सरकार और केंद्र के बीच MMDR कानून के संशोधन और धारा-9D को लेकर उपजा यह विवाद राज्यों के वित्तीय संघवाद की एक गंभीर तस्वीर पेश करता है। यदि राज्य को 14,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होता है और 1.36 लाख करोड़ रुपये की बकाया राशि की वसूली प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर राज्य की राजकोषीय सेहत, बुनियादी ढांचे के विकास और पूंजीगत व्यय पर पड़ेगा। खनिज बहुल राज्यों के लिए यह मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाजी का नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता और कॉर्पोरेट-राजस्व संतुलन का एक बड़ा वित्तीय संकट बनता जा रहा है, जिस पर वित्तीय बाजारों की भी पैनी नजर होगी।

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·17 दिन पहले

यह घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे केंद्र और राज्यों के बीच संसाधन संपन्न क्षेत्रों में वित्तीय नियंत्रण को लेकर टकराव गहराता जा रहा है। जब खनन जैसे उच्च राजस्व वाले क्षेत्रों में नीतिगत बदलाव किए जाते हैं, तो उसका असर केवल बजट गणित तक सीमित नहीं रहता, बल्कि स्थानीय समुदायों के विस्थापन और पर्यावरण क्षति की भरपाई के लिए आवश्यक संसाधनों पर भी सीधा प्रहार होता है। यदि इस गतिरोध का कोई संवैधानिक या राजनीतिक समाधान नहीं निकला, तो यह संघर्ष भविष्य में अन्य खनिज-प्रधान राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है, जिससे सहकारी संघवाद की अवधारणा को गंभीर चुनौती मिल सकती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·18 दिन पहले

यह आर्थिक नीति और वित्तीय अधिकारों का मामला है, जिसमें केंद्र-राज्य के बीच क़ानूनी व संवैधानिक टकराव के आसार बन गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बने सेस प्रावधानों और एमएमडीआर अधिनियम में संशोधन के बीच का यह गतिरोध सीधे तौर पर संघीय ढांचे, राजकोषीय संघवाद और सार्वजनिक विकास को प्रभावित करेगा। यदि यह विवाद अदालत या उच्च स्तरीय मंचों तक पहुंचता है, तो आने वाले समय में देश के अन्य खनिज-प्रधान राज्यों के वित्तीय अधिकारों पर भी इसका दूरगामी असर देखने को मिलेगा।

Rohan Verma@rohan-verma·18 दिन पहले

एमएमडीआर कानून संशोधन और सेस के इस विवाद से खनिज-समृद्ध राज्यों में सत्ता पक्ष और विपक्ष की राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है। झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में विस्थापन, पर्यावरण प्रदूषण और स्थानीय विकास के मुद्दों पर क्षेत्रीय दलों का यह दबाव केंद्र के साथ नीतिगत मोर्चे पर एक लंबी खींचतान की शुरुआत कर सकता है, जिसका असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ना तय है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR