काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के चारों ओर प्रस्तावित इको सेंसेटिव जोन (ESZ) का दायरा घटाने के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ असम कांग्रेस ने राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है। पार्टी आगामी 29 अगस्त को पूरे राज्य में एक वृहद पदयात्रा निकालने जा रही है, जिसमें राज्य भर से कार्यकर्ताओं और नेताओं को एकजुट करने की तैयारी की गई है।
जिला इकाइयों को निर्देश और संगठन की तैयारी
असम प्रदेश कांग्रेस के संगठन महासचिव रमन्ना बरुआ ने इस संबंध में सभी जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्षों को एक आधिकारिक सर्कुलर जारी किया है। इस निर्देश के तहत जिला स्तर पर व्यापक तैयारी करने, नेताओं को लामबंद करने और आम लोगों को पदयात्रा से जोड़ने के आदेश दिए गए हैं। पार्टी का मानना है कि यह विरोध प्रदर्शन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल काजीरंगा और उसके आसपास के प्राकृतिक संतुलन को बचाने के लिए बेहद जरूरी है।
इको सेंसेटिव जोन किसी भी संरक्षित वन क्षेत्र के आसपास का वह सुरक्षा घेरा होता है, जहां व्यावसायिक गतिविधियों पर सख्त नियंत्रण, नियमन या पूर्ण प्रतिबंध लागू होता है। काजीरंगा जैसी जैव विविधता से समृद्ध जगह के लिए यह बफर जोन पर्यावरण सुरक्षा की प्राथमिक ढाल माना जाता है।
जैव विविधता पर खतरा और पर्यावरणविदों की चिंताएं
राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के समक्ष प्रस्ताव रखने की योजना बनाई है, जिसके तहत काजीरंगा के आसपास तय मानक 10 किलोमीटर के बफर जोन को घटाकर 1 से 3 किलोमीटर करने की सिफारिश की जाएगी। इस कदम के सामने आते ही विपक्षी दलों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कड़ा ऐतराज जताया है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि बफर जोन का दायरा छोटा होने से काजीरंगा तथा कर्बी आंगलोंग की पहाड़ियों से सटे क्षेत्रों में खनन और व्यावसायिक पर्यटन गतिविधियों का रास्ता साफ हो जाएगा। यह पूरा इलाका हाथियों के आवागमन के लिए एक मुख्य कॉरिडोर का काम करता है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सीमाएं छोटी होने से मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ेंगी और काजीरंगा की समृद्ध जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचेगा।
राज्य सरकार का रुख और मुख्यमंत्री की सफाई
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सरकार के इस प्रस्ताव का बचाव किया है। उनका तर्क है कि मौजूदा बफर जोन की सीमाओं के भीतर रहने वाले स्थानीय ग्रामीणों के अधिकारों और उनकी आजीविका की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है। सरकार का मानना है कि इस बदलाव से स्थानीय लोगों को अपनी जमीन और रोजगार से जुड़े मामलों में सहूलियत मिलेगी।



















