अमेरिका के आधिकारिक जनसंख्या और जनसांख्यिकीय आंकड़ों को संभालने वाले संस्थान अमेरिकी जनगणना ब्यूरो में एक दक्षिणपंथी विचार मंच से जुड़े शोधकर्ताओं की बड़ी संख्या में नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक और अकादमिक हलकों में बहस छिड़ गई है। अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी इंस्टीट्यूट से जुड़े कम से कम सात विश्लेषकों और शोधकर्ताओं को विशेष प्रशासनिक प्रक्रियाओं के जरिए एजेंसी के भीतर तैनात किया गया है। यह संस्थान पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक विजन और नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए जाना जाता है। जनगणना ब्यूरो में देश की संपूर्ण आबादी, उनकी भौगोलिक स्थिति, वित्तीय विवरण और प्रतिनिधित्व से संबंधित बेहद संवेदनशील जानकारी मौजूद रहती है। ऐसे में एक ही वैचारिक झुकाव वाले संगठन से इतने सारे लोगों को ब्यूरो के भीतर अस्थायी नियुक्तियां देना संस्थागत निष्पक्षता के समर्थकों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
विवादास्पद रिपोर्ट और विशेष नीतिगत नियमों का इस्तेमाल
इस पूरे मामले की शुरुआत 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में गैर-नागरिकों द्वारा मतदान किए जाने के दावों पर आधारित एक अनाम रिपोर्ट के जारी होने के बाद हुई। अगस्त महीने में प्रकाशित इस रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि 2020 के चुनाव में हजारों गैर-नागरिकों ने वोट डाले थे। हालांकि, सांख्यिकी और शोध प्रणाली के विशेषज्ञों ने इस रिपोर्ट की कार्यप्रणाली में कई बुनियादी कमियों की ओर इशारा किया, जिससे इसके निष्कर्षों पर प्रश्नचिह्न लग गया। बाद में यह तथ्य सामने आया कि इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले मुख्य लेखकों में से दो शोधकर्ता अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी इंस्टीट्यूट के सदस्य थे। आगे की जांच और प्रशासनिक अभिलेखों की समीक्षा से पता चला कि यह केवल दो व्यक्तियों तक सीमित मामला नहीं था, बल्कि इस संगठन के कई अन्य विश्लेषक भी ब्यूरो में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
इन नियुक्तियों के लिए अमेरिकी संघीय सरकार के इंटरगवर्नमेंटल पर्सनल एक्ट का सहारा लिया गया है। यह विशेष प्रावधान गैर-लाभकारी संगठनों, शोध संस्थाओं और विश्वविद्यालयों से विशेषज्ञता वाले व्यक्तियों को अस्थायी रूप से दो साल तक की अवधि के लिए सरकारी एजेंसियों में सेवा देने की अनुमति देता है। सामान्यतः इस कानून का उपयोग तकनीकी, सांख्यिकीय या वैज्ञानिक आदान-प्रदान के लिए किया जाता है। हालांकि, अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक और अनुसंधान निदेशक जॉन अबौद ने स्पष्ट किया कि किसी एक ही निजी संगठन से इतनी बड़ी संख्या में शोधकर्ताओं को किसी सरकारी सांख्यिकीय एजेंसी में लाया जाना अत्यंत असामान्य घटना है।
प्रशासनिक तंत्र और तैनात विशेषज्ञों की पृष्ठभूमि
जनगणना ब्यूरो में तैनात किए गए अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी इंस्टीट्यूट के सदस्यों में वित्तीय और नियामक विश्लेषण से जुड़े शोधकर्ता मैक्स कोसेक तथा शोध इंजीनियर रायन मोंटगोमरी शामिल हैं। इनके अलावा सुरक्षित चुनाव नीतियों पर काम करने वाले थॉमस लेन को भी इस टीम का हिस्सा बनाया गया है। थॉमस लेन पूर्व में डोनाल्ड ट्रंप के चुनावी अभियान से जुड़े रहे हैं और चुनाव परिणामों को चुनौती देने वाली गतिविधियों के संदर्भ में अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा 2022 की जांच के दौरान तलब किए जा चुके हैं, यद्यपि उन पर कोई औपचारिक आपराधिक आरोप दर्ज नहीं किए गए थे। लेन पर 2020 में एरिज़ोना राज्य में वैकल्पिक निर्वाचक मंडल के दस्तावेज तैयार कराने की गतिविधियों से जुड़े होने और हालिया विधायी प्रस्तावों जैसे 'सेव अमेरिका एक्ट' के शुरुआती मसौदों में योगदान देने के विवरण भी उपलब्ध हैं।
इन शोधकर्ताओं के साथ-साथ उन्नत कम्प्यूटिंग, मशीन लर्निंग और सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर के विशेषज्ञ डेविड पीटरसन और एमआईटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी तथा टेक्सास विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत जैक्सन मेजिया को भी ब्यूरो में डेटा विश्लेषण का काम सौंपा गया है। इसके अतिरिक्त माइकल कोरी नामक एक अन्य व्यक्ति का नाम भी इस समूह के साथ जुड़ा पाया गया है। ये सभी शोधकर्ता एक ही परियोजना के तहत काम कर रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य जनगणना ब्यूरो और अमेरिकी वाणिज्य विभाग के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व द्वारा मांगे गए विशेष आंकड़ों का तदर्थ विश्लेषण करना है।
डेटा सुरक्षा नियमों में बदलाव और राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका
जनगणना ब्यूरो की इस विशेष परियोजना का नेतृत्व आंकड़ों, नीति और विज्ञान मामलों के नवनियुक्त उप निदेशक माइकल लाचिंस्की कर रहे हैं। लाचिंस्की स्वयं एक राजनीतिक रूप से नियुक्त अधिकारी हैं और पूर्व में रूढ़िवादी विचारधारा वाले क्लेयरमोंट इंस्टीट्यूट से जुड़े रहे हैं। इस परियोजना से जुड़े सभी बाहरी शोधकर्ताओं को संवेदनशील जनगणना आंकड़ों तक पहुंचने के लिए आवश्यक 'विशेष शपथबद्ध स्थिति' प्रदान की गई है। इस बीच प्रशासनिक प्रक्रियाओं में हाल ही में किए गए एक नीतिगत बदलाव ने इस आशंका को और गहरा कर दिया है। जुलाई के महीने में ब्यूरो के डेटा स्टीवर्डशिप कार्यकारी नीति चार्टर में संशोधन करके उन प्रतिबंधों को हटा दिया गया था, जो राजनीतिक रूप से नियुक्त अधिकारियों को डेटा प्रबंधन में सीधा हस्तक्षेप करने से रोकते थे।
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर दाना बॉयड, जो जनगणना प्रक्रियाओं और सांख्यिकीय तंत्र का अध्ययन करती हैं, के अनुसार यह घटनाक्रम ब्यूरो की पारंपरिक परिचालन पद्धतियों से पूरी तरह अलग है। उन्होंने कहा कि जनगणना ब्यूरो डेटा एकत्र करने और निष्पक्ष सांख्यिकी जारी करने के लिए है, न कि राजनीतिक रूप से नियुक्त अधिकारियों की मंशा के अनुसार आंकड़े उपलब्ध कराने के लिए। एक अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि किसी विशेष डेटा प्रोजेक्ट में नागरिक सेवकों की अनुपस्थिति और केवल एक विशिष्ट विचारधारा वाले समूह की मौजूदगी संस्थागत पारदर्शी मानकों के विपरीत है।
ऐतिहासिक संदर्भ और चुनावों पर संभावित प्रभाव
अमेरिकी जनगणना के आंकड़ों का उपयोग केवल आबादी की गिनती तक सीमित नहीं है। इन आंकड़ों के आधार पर ही अमेरिकी कांग्रेस के प्रतिनिधि सभा के क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण होता है और अरबों डॉलर के संघीय बजट का आवंटन विभिन्न राज्यों में किया जाता है। यही कारण है कि जनगणना के आंकड़ों में थोड़ा सा बदलाव भी चुनावी राजनीति का संतुलन बदल सकता है। पूर्व में भी जनगणना में गैर-नागरिकों की गणना को हटाने के प्रस्तावों और व्यक्तियों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली 'डिफरेंशियल प्राइवेसी' जैसी सांख्यिकीय विधियों पर राजनीतिक विवाद होते रहे हैं।
यह पहला मौका नहीं है जब जनगणना ब्यूरो में राजनीतिक दबाव को लेकर सवाल उठे हों। साल 2021 में भी तत्कालीन जनगणना निदेशक स्टीवन डिलिंगहैम ने आंतरिक जांच के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, जब कर्मचारियों ने आरोप लगाया था कि उन पर देश के निवासियों की नागरिकता स्थिति से जुड़ी रिपोर्ट तैयार करने के लिए अनुचित राजनीतिक दबाव डाला गया था। अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी इंस्टीट्यूट के कई पूर्व पदाधिकारी वर्तमान में नए अमेरिकी प्रशासन में सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं, जिनमें कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस, शिक्षा सचिव लिंडा मैकमोहन, अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी, आवास मंत्री स्कॉट टर्नर और पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के प्रमुख ली जेल्डिन शामिल हैं। ऐसे में सांख्यिकीय ब्यूरो में हो रहे इन बदलावों को आगामी मध्यवधि चुनावों और 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की पृष्ठभूमि में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


















