बिहार की राजधानी पटना में शनिवार को एक ऐसी घटना घटी जिसने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। जनता दल (यूनाइटेड) के पुराने दिग्गज और केंद्रीय मंत्री रह चुके आरसीपी सिंह अचानक 7 सर्कुलर रोड पहुंच गए, जो कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नया सरकारी आवास है। आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार की यह मुलाकात किसी साधारण शिष्टाचार भेंट से कहीं अधिक मानी जा रही है, क्योंकि एक समय था जब आरसीपी सिंह को नीतीश कुमार का सबसे विश्वसनीय 'हनुमान' कहा जाता था। पार्टी से निष्कासन और फिर लंबे समय तक चली कड़वाहट के बाद हुई इस मुलाकात को अब आरसीपी सिंह की जेडीयू में वापसी के बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
प्रशासनिक और राजनीतिक जोड़ी का इतिहास
बिहार की राजनीति को करीब से जानने वाले लोग इस बात से वाकिफ हैं कि आरसीपी सिंह केवल एक पार्टी नेता नहीं थे, बल्कि वे नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद सहयोगी थे। एक आईएएस अधिकारी के रूप में पहचान रखने वाले आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार का साथ दशकों पुराना है। जब आरसीपी सिंह ने प्रशासनिक सेवा से किनारा किया, तो उन्होंने जेडीयू के सांगठनिक ढांचे को खड़ा करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उम्मीदवार तय करने से लेकर संगठन के विस्तार तक और दिल्ली के सत्ता गलियारों में समन्वय बैठाने में आरसीपी सिंह की भूमिका निर्णायक होती थी। उस दौर में उन्हें अक्सर नीतीश कुमार की 'राजनीतिक आंख और कान' कहा जाता था।
सत्ता और संगठन में सर्वोच्च प्रभाव
समय के साथ आरसीपी सिंह का राजनीतिक प्रभाव बढ़ता गया और नीतीश कुमार ने उन्हें पार्टी में सर्वोच्च सम्मान दिया। एक समय ऐसा आया जब वे जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज हुए। तब पार्टी के भीतर नीतीश कुमार के बाद आरसीपी सिंह का ही कद सबसे ऊंचा माना जाता था। सरकार से संबंधित फैसलों से लेकर संगठन के बड़े निर्णयों तक, उनकी सहमति अनिवार्य होती थी। लेकिन, राजनीति में समीकरण बदलते देर नहीं लगती। जब आरसीपी सिंह ने केंद्र में मंत्री पद संभाला, तो नेतृत्व के साथ उनकी दूरियां बढ़ने लगीं।
विवाद की शुरुआत और अलगाव
जुलाई 2021 में जब आरसीपी सिंह ने नरेंद्र मोदी सरकार में जेडीयू कोटे से अकेले मंत्री पद की शपथ ली, तो मनमुटाव की खबरें सामने आने लगीं। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह चर्चा चलने लगी कि आरसीपी सिंह का झुकाव जेडीयू की तुलना में भारतीय जनता पार्टी की तरफ अधिक हो रहा है। इसके साथ ही राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के बढ़ते कद ने भी इस खाई को और गहरा कर दिया। कहा जाता है कि नीतीश कुमार इस घटनाक्रम से खुश नहीं थे।
तल्खी से इस्तीफे का सफर
नीतीश कुमार के साथ बढ़ती दूरियों का असर आरसीपी सिंह के राजनीतिक करियर पर भी पड़ा। जेडीयू ने उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा, जिसके कारण उन्हें अपना केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ना पड़ा। इसी दौरान उनके ऊपर भ्रष्टाचार और संपत्ति छिपाने जैसे संगीन आरोप लगे, जिसके बाद 2022 में उन्होंने कड़वाहट के साथ जेडीयू से इस्तीफा दे दिया। बाद में उन्होंने कुछ समय के लिए भाजपा का दामन थामा और उसके बाद जनसुराज से जुड़ गए। हालांकि, अब की परिस्थितियों में यह मुलाकात पुराने रिश्तों की बर्फ पिघलने का संकेत दे रही है।
बदलते सियासी समीकरणों का असर
बिहार की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में पूरी तरह बदल चुकी है। वर्तमान में एनडीए सरकार के भीतर सत्ता का संतुलन काफी हद तक भाजपा के हाथों में आ गया है। जेडीयू भी अब भविष्य की राजनीति और अगली पीढ़ी के नेतृत्व की ओर देख रही है। चर्चाएं ऐसी भी हैं कि आने वाले समय में जेडीयू की कमान निशांत कुमार संभाल सकते हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि जेडीयू अपने पुराने और अनुभवी नेताओं को वापस लाकर अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है, जिसमें आरसीपी सिंह का नाम सबसे प्रमुख है।
सोशल मीडिया पर 'नेता' वाला संबोधन
मुलाकात के बाद आरसीपी सिंह ने अपने एक्स हैंडल पर एक तस्वीर साझा की, जिसने सभी का ध्यान खींचा है। उन्होंने लिखा, 'आज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं राज्य सभा सांसद, हमारे नेता आदरणीय नीतीश बाबू से भेंट हुई। उनसे बातचीत हुई, मुलाकात बहुत आत्मीय रही।' आरसीपी सिंह द्वारा नीतीश कुमार को 'हमारे नेता' कहकर संबोधित करना बहुत मायने रखता है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि वे नीतीश कुमार के नेतृत्व को मानते हैं।
वापसी की संभावना और भविष्य
आरसीपी सिंह की प्रशासनिक पकड़ और सांगठनिक अनुभव जेडीयू के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। विशेष रूप से कुर्मी-कोइरी यानी 'लव-कुश' समीकरण को साधने में वे एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि वे स्वयं उसी कुर्मी जाति से आते हैं जिससे नीतीश कुमार का ताल्लुक है। सूत्रों का कहना है कि आरसीपी सिंह की पार्टी में वापसी के लिए रास्ता लगभग साफ हो चुका है और इस हालिया बैठक में उसी पर चर्चा हुई है। यह मुलाकात महज शिष्टाचार नहीं, बल्कि नई शुरुआत की नींव मानी जा रही है।













