बिहार की सियासत में रविवार को एक साथ दो ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। एक तरफ जन सुराज के मुखिया प्रशांत किशोर ने पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया, तो दूसरी तरफ कुछ ही घंटों बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सीधे जदयू प्रमुख नीतीश कुमार के आवास जा पहुंचे। दोनों घटनाओं का आपस में कोई सीधा संबंध भले ही न बताया गया हो, लेकिन समय का यह मेल बिहार की राजनीति में नए सिरे से चर्चा छेड़ गया है।
भाजपा के गढ़ में जन सुराज की सेंध की कोशिश
बांकीपुर सीट को लंबे समय से भाजपा का मजबूत किला माना जाता रहा है। यहां पार्टी का संगठनात्मक ढांचा बेहद मजबूत है और यही वजह है कि प्रशांत किशोर का खुद इस सीट से चुनाव लड़ने का फैसला सिर्फ एक विधानसभा सीट जीतने की कोशिश भर नहीं समझा जा रहा। इसे शहरी मध्यम वर्ग, युवा मतदाताओं और परंपरागत दलों से नाखुश वोटरों को अपनी तरफ खींचने की बड़ी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। जन सुराज पिछले काफी समय से खुद को बिहार में तीसरे विकल्प के रूप में पेश करने में जुटा है और बांकीपुर उपचुनाव उसकी अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक अग्निपरीक्षा बनता दिख रहा है।
सम्राट चौधरी की नीतीश से मुलाकात, संयोग या रणनीति?
इसी बीच सम्राट चौधरी का सीधे नीतीश कुमार के घर पहुंचना राजनीतिक हलकों में जिज्ञासा का विषय बन गया। सरकारी तौर पर इसे प्रोटोकॉल के तहत की गई मुलाकात या प्रशासनिक बैठक कहा जा सकता है, लेकिन राजनीति के जानकार इसे इतनी आसानी से खारिज करने को तैयार नहीं हैं। उनका मानना है कि इस मुलाकात में उपचुनाव को लेकर एनडीए की रणनीति, बांकीपुर के लिए उम्मीदवार का चुनाव और प्रशांत किशोर की मौजूदगी से पड़ने वाले संभावित असर पर बातचीत हुई हो सकती है।
रणनीतिकार से नेता बनने की परीक्षा
प्रशांत किशोर की पहचान अब तक एक कुशल चुनावी रणनीतिकार की रही है। उन्होंने वर्षों तक अलग अलग राजनीतिक दलों के लिए जीत की रणनीतियां बनाईं, लेकिन कभी खुद चुनावी मैदान में नहीं उतरे। बांकीपुर से उम्मीदवारी के साथ वे पहली बार परदे के पीछे से निकलकर सीधे मतदाताओं के सामने जा रहे हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि एक सफल रणनीतिकार के तौर पर बनाई गई उनकी छवि, एक नेता के तौर पर वोट में कितनी तब्दील हो पाती है।
भाजपा और जदयू के सामने क्या है असली चुनौती
भाजपा और जदयू के लिए यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट बचाने भर की लड़ाई नहीं रहने वाला। दोनों दलों के सामने यह साबित करने की चुनौती भी होगी कि एनडीए का शहरी और सामाजिक वोट बैंक अब भी उनके साथ पूरी मजबूती से खड़ा है। अगर प्रशांत किशोर इस मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने में कामयाब होते हैं, तो इसका असर सिर्फ बांकीपुर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में बिहार की पूरी राजनीति की दिशा तय कर सकता है। यही वजह है कि यह उपचुनाव अब एक सामान्य उपचुनाव न रहकर बिहार की सियासत के अगले अध्याय की झलक बनता जा रहा है।
नितिन नवीन के राज्यसभा जाने से खाली हुई सीट
प्रशांत किशोर बीते कई सप्ताह से बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में लगातार सक्रिय बने हुए हैं। वे जनसभाएं कर रहे हैं, नुक्कड़ बैठकें आयोजित कर रहे हैं और स्थानीय लोगों से सीधा संवाद बना रहे हैं। यही वजह है कि उनकी उम्मीदवारी को अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि पहले से तय की गई रणनीति का हिस्सा माना जा रहा था। बांकीपुर विधानसभा सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होने के बाद खाली हुई है। लगातार इस सीट से विधायक रहे नितिन नवीन के संसद के ऊपरी सदन में जाने के बाद निर्वाचन आयोग ने यहां उपचुनाव कराने का ऐलान किया।
30 जुलाई को वोटिंग, तस्वीर जल्द होगी साफ
निर्वाचन आयोग के जारी कार्यक्रम के मुताबिक बांकीपुर विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को मतदान होगा। जन सुराज की तरफ से प्रशांत किशोर के मैदान में उतरने के बाद इस मुकाबले के और दिलचस्प होने की उम्मीद जताई जा रही है। अब सबकी निगाहें भाजपा और बाकी विपक्षी दलों की तरफ से उतारे जाने वाले उम्मीदवारों पर टिकी हैं। इन उम्मीदवारों के नामों का ऐलान होते ही बांकीपुर के चुनावी मुकाबले की पूरी तस्वीर साफ हो जाएगी।













