देश की आर्थिक सेहत और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को लेकर राजनीतिक और नीतिगत गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल ही में वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के एक पैनल ने भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की 7.8 प्रतिशत की दर्ज वृद्धि दर, जीडीपी की गणना के तरीकों में बदलाव और मतदाता सूचियों की पारदर्शिता जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अपनी विस्तृत राय रखी। इस दौरान पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के उन दावों पर भी गहन मंथन हुआ जिसमें उन्होंने चालू तिमाही की वास्तविक विकास दर को महज 2.6 प्रतिशत बताया है और मुद्रास्फीति को समायोजित करने के बाद इसे शून्य के बराबर करार दिया है।
जीडीपी का बेस ईयर और आंकड़ों का गणित
अर्थव्यवस्था के आंकड़ों को लेकर उठे सवालों पर विचार-विमर्श करते हुए विशेषज्ञों ने जीडीपी गणना के लिए आधार वर्ष (बेस ईयर) में किए गए बदलाव के तकनीकी पहलुओं को समझाया। पहले देश की जीडीपी की गणना 2011-12 के आधार वर्ष पर की जाती थी, जिसे संशोधित करके अब 2022-23 का बेस ईयर बनाया गया है। आर्थिक नियमों के अनुसार, जब भी आधार वर्ष बदला जाता है, तो पिछले सालों के ऐतिहासिक आंकड़ों को भी नए मापदंडों के अनुसार संशोधित किया जाता है।
विश्लेषकों का कहना है कि जब पिछले साल का तुलनात्मक आधार कम होता है, तो मौजूदा साल में मिलने वाला मामूली उछाल भी सांख्यिकीय रूप से काफी बड़ा दिखाई देता है, जिसे बेस इफेक्ट कहा जाता है। हालांकि, आंकड़ों में जानबूझकर हेरफेर किए जाने के आरोपों को खारिज करते हुए पैनल ने स्पष्ट किया कि जीडीपी सीरीज बदलने का निर्णय फरवरी 2026 में ही ले लिया गया था। यह एक पूर्व-निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया थी, इसलिए इसे हाल की राजनीतिक या आर्थिक परिस्थितियों से जोड़कर देखना सही नहीं है।
सुभाष चंद्र गर्ग का प्रशासनिक अनुभव और मतभेद
चर्चा के दौरान पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के लंबे प्रशासनिक करियर और उनके आर्थिक दावों के औचित्य पर भी सवाल उठाए गए। सुभाष चंद्र गर्ग राजस्थान कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी रहे हैं और उन्होंने राजस्थान राज्य में लगभग तीन दशकों तक अपनी सेवाएं दी हैं। केंद्र सरकार में कृषि मंत्रालय सहित कई महत्वपूर्ण विभागों में काम करने के बाद उन्होंने विश्व बैंक में कार्यकारी निदेशक के रूप में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था। बाद में उन्होंने वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग की कमान संभाली।
विशेषज्ञों ने तत्कालीन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और सुभाष चंद्र गर्ग के बीच रहे नीतिगत मतभेदों का भी उल्लेख किया। पैनल ने उनकी प्रशासनिक क्षमताओं और वित्तीय अनुभव का सम्मान करते हुए भी उनके द्वारा प्रस्तुत जीडीपी के घटते आंकड़ों पर सवाल खड़े किए। विशेषज्ञों का मानना है कि अर्थव्यवस्था का सही आकलन केवल एक सूचकांक से नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए ऑटोमोबाइल बिक्री और जीएसटी (GST) संग्रह जैसे अन्य प्रमुख संकेतकों पर भी गौर किया जाना आवश्यक है।
महाराष्ट्र SIR और वोट चोरी का राजनीतिक विवाद
आर्थिक चर्चा के अलावा, मतदाता सूचियों की शुद्धता और कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा लगाए गए वोट चोरी के आरोपों पर भी तीखी बहस हुई। महाराष्ट्र में चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान लगभग दो करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने या असत्यापित पाए जाने का आंकड़ा सामने आया था। विश्लेषकों ने स्पष्ट किया कि इन दो करोड़ प्रविष्टियों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जो स्थायी रूप से दूसरे शहरों में बस चुके हैं, जिनकी मृत्यु हो चुकी है, जिनके नाम दोहरी जगह दर्ज थे, या जिनका भौतिक सत्यापन नहीं हो पाया।
पैनल ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग द्वारा जारी ड्राफ्ट रिपोर्ट अंतिम मतदाता सूची नहीं होती है। यह केवल एक शुरुआती खाका है ताकि आम जनता और राजनीतिक दल अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकें। जिन पात्र नागरिकों के नाम गलती से छूट गए हैं, वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपने नाम दोबारा जुड़वा सकते हैं। हर प्रशासनिक विसंगति को चुनावी धांधली का नाम देना उचित नहीं है, क्योंकि व्यवस्थागत कमियों को सुधारने के लिए कानून में स्पष्ट तंत्र मौजूद है।
नागरिक दायित्व और राहुल गांधी का नैरेटिव
वरिष्ठ विश्लेषकों ने इस बात पर विशेष बल दिया कि मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना केवल चुनाव आयोग का काम नहीं है। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं और खुद आम नागरिकों को भी इसमें अपनी सक्रिय भागीदारी निभानी चाहिए। प्रत्येक नागरिक की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह चुनाव से पहले मतदाता सूची में अपने नाम की पुष्टि करे ताकि वह अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग कर सके।
चर्चा के अंतिम चरण में राहुल गांधी की राजनीतिक कार्यशैली और कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे पर भी विचार व्यक्त किए गए। विश्लेषकों के अनुसार, राहुल गांधी समय-समय पर ईवीएम (EVM), मतदाता सूची और अन्य मुद्दों को उठाकर एक नया राजनीतिक नैरेटिव बनाने का प्रयास करते रहते हैं। यद्यपि इन मुद्दों से व्यक्तिगत रूप से राहुल गांधी को लेकर मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर चर्चाएं बढ़ जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कई राज्यों में कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा कमजोर हुआ है। राजनीति में मुद्दे तेजी से बदलते हैं और आने वाले समय में देखना होगा कि विपक्षी दल किन विषयों पर सरकार को घेरने की रणनीति बनाते हैं।




















