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राहुल गांधी ने मनुस्मृति पर उठाए सवाल, जानिए क्या कहती है प्राचीन ग्रंथ की नीतिराजनीति
23 अग॰ 2026, 9:39 am (1 घंटे पहले)· 2

राहुल गांधी ने मनुस्मृति पर उठाए सवाल, जानिए क्या कहती है प्राचीन ग्रंथ की नीति

राहुल गांधी ने अपने अभियान के दौरान मनुस्मृति में महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। आइए जानते हैं कि इस प्राचीन ग्रंथ में स्त्री जीवन, उसके सम्मान और नियंत्रण को लेकर आखिर क्या नियम तय किए गए थे।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी पिछले कुछ समय से छात्रों और युवाओं के बीच लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के तहत अलग-अलग विश्वविद्यालयों और परिसरों का दौरा किया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बाद उन्होंने पुणे में युवाओं को संबोधित करते हुए महिलाओं को देश की सबसे बड़ी ताकत और अहम संपत्ति बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं का मूल्यांकन केवल पुरुषों के साथ उनके पारिवारिक रिश्तों के दायरे में नहीं किया जाना चाहिए और न ही उन्हें सिर्फ पारंपरिक घरेलू भूमिकाओं तक सीमित रखना उचित है। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने प्राचीन ग्रंथ मनुस्मृति का हवाला दिया और उस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

मनुस्मृति के श्लोक और महिलाओं की स्वतंत्रता

पुणे में बोलते हुए राहुल गांधी ने मनुस्मृति का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर बहुत सख्त और आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं। उन्होंने एक सीधा श्लोक कोट करते हुए कहा कि बचपन में महिला पिता के अधीन होती है, जवानी में पति के और पति की मृत्यु के बाद वह बेटों के संरक्षण में रहती है, यानी उसे कभी भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होना चाहिए। उन्होंने इन शब्दों को शर्मनाक बताते हुए इनकी कड़ी आलोचना की। इस पूरे विवाद के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर मनुस्मृति क्या है और इसमें महिलाओं के अधिकारों और स्वतंत्रता को लेकर वास्तविक रूप से क्या प्रावधान किए गए हैं।

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क्या है मनुस्मृति और उसकी संरचना

मनुस्मृति को मानव धर्मशास्त्र या राजा मनु का संविधान भी कहा जाता है। इसमें मानव आचरण, सामाजिक कानूनों, कर्तव्यों और अपराधों के लिए तय सजाओं का विस्तृत विवरण मिलता है। इस ग्रंथ में कुल 12 अध्याय और 2684 श्लोक मौजूद हैं, हालांकि कुछ संस्करणों में इनकी संख्या 2964 तक बताई जाती है। इस प्राचीन ग्रंथ के अंशों का उल्लेख उपनिषदों, रामायण और महाभारत जैसे प्रमुख ग्रंथों में भी देखने को मिलता है। मूल रूप से संस्कृत में रची गई इस रचना का बाद में कई अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद किया गया।

नौवें अध्याय में महिलाओं के लिए कड़े नियम

ऐतिहासिक रूप से मनुस्मृति में महिलाओं की स्थिति को शूद्रों के समकक्ष रखा गया है और विभिन्न वर्णों की महिलाओं को स्वतंत्र अधिकारों से वंचित बताया गया है। उन्हें हमेशा परिवार और पुरुषों पर निर्भर रहना सिखाया गया है। ग्रंथ के नौवें अध्याय में स्त्रियों के आचरण को लेकर कई कड़े निर्देश दिए गए हैं। श्लोक नौ दशमलव दो के अनुसार महिलाओं को दिन-रात परिवार के पुरुषों के नियंत्रण में रहना चाहिए। नौ दशमलव तीन में उसी प्रसिद्ध व्यवस्था का उल्लेख है कि स्त्री कभी स्वतंत्र नहीं हो सकती। इसके अलावा नौ दशमलव पांच में उन्हें बुरी प्रवृत्तियों से बचाने की बात कही गई है ताकि वे परिवारों पर संकट न लाएं। नौ दशमलव छह कमजोर पतियों को भी पत्नियों की सुरक्षा का निर्देश देता है, जबकि नौ दशमलव पैंतालीस विवाह के बाद अलगाव की संभावना को खारिज करता है। वहीं नौ दशमलव चार सौ सोलह के मुताबिक पत्नी, पुत्र और दास को कोई निजी संपत्ति नहीं दी जाती, और वे जो भी कमाते हैं वह उनके स्वामी का होता है।

तीसरे अध्याय में स्त्री सम्मान के निर्देश

हालांकि मनुस्मृति में कई प्रतिबंधात्मक और नियंत्रणकारी नियम मौजूद हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि इसमें केवल नकारात्मक बातें ही दर्ज हैं। इसके विपरीत, ग्रंथ के तीसरे अध्याय में महिलाओं के आदर, पूजन और सत्कार को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। श्लोक तीन दशमलव पचपन में कहा गया है कि पिता, भाई, पति और देवर को महिलाओं का सम्मान करना चाहिए और उन्हें आभूषणों से सुसज्जित रखना चाहिए, जिसका सकारात्मक परिणाम मिलता है। इसके अगले श्लोक में यह मान्यता व्यक्त की गई है कि जिस कुल में महिलाओं का सत्कार होता है, वहां देवता प्रसन्न रहते हैं और जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां सारे धार्मिक अनुष्ठान निष्फल हो जाते हैं। श्लोक तीन दशमलव संतावन के अनुसार जिस घर में स्त्रियां दुखी रहती हैं, वह परिवार शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहां वे प्रसन्न रहती हैं, वह हमेशा उन्नति करता है।

नियंत्रण और चिंता के बीच का संबंध

इस पूरे वैचारिक संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस पार्टी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर ‘CONTROL’ यानी नियंत्रण थीम के तहत राहुल गांधी के विचार साझा किए। इसमें महिलाओं से यह सवाल पूछा गया कि क्या उन्हें भी ऐसा महसूस होता है कि समाज उन पर नियंत्रण रखने की कोशिश करता है। राहुल गांधी ने नियंत्रण के चार प्रमुख तरीके बताए जिनमें हिंसा, अनादर, समय और नियंत्रण शामिल हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इस प्रकार के नियंत्रण को अक्सर समाज में महिलाओं की सुरक्षा और भलाई की चिंता के रूप में पेश किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह दमन कई बार यह कहकर छिपाया जाता है कि उन्हें महिलाओं की बहुत चिंता है, इसलिए उन्हें नियंत्रित करना जरूरी है।

सवाल-जवाब

राहुल गांधी ने किस अभियान के तहत पुणे में छात्रों को संबोधित किया?
राहुल गांधी 'छात्रों की गूंज' नाम से चलाए जा रहे कैंपेन के तहत पुणे में युवाओं और छात्रों को संबोधित कर रहे थे।
मनुस्मृति को और किस नाम से जाना जाता है?
मनुस्मृति को मानव धर्मशास्त्र या राजा मनु का संविधान भी कहा जाता है।
मनुस्मृति में कुल कितने अध्याय और श्लोक हैं?
मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय और 2684 श्लोक हैं, हालांकि कुछ संस्करणों में 2964 श्लोक भी मिलते हैं।
मनुस्मृति के किस अध्याय में महिलाओं के प्रति आचरण और नियमों का जिक्र है?
मनुस्मृति के 9वें अध्याय में महिलाओं के प्रति आचरण और नियंत्रण से जुड़े कई नियम बताए गए हैं।
मनुस्मृति के किस अध्याय में महिलाओं के सम्मान की बात कही गई है?
मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में महिलाओं के आदर, सत्कार और उन्हें पूजने की बात कही गई है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·24 मिनट पहले

राहुल गांधी द्वारा पुणे में मनुस्मृति का यह संदर्भ ऐसे समय सामने आया है जब उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में युवा और छात्र संवाद केंद्र में हैं। इस तरह के वैचारिक और ऐतिहासिक विषयों पर बयानबाजी से चुनावी राजनीति में सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक प्रतीकों की बहस और तेज होने की पूरी संभावना है। क्षेत्रीय राजनीति पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·24 मिनट पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह ध्यान देना आवश्यक है कि जब भी प्राचीन धार्मिक ग्रंथों या ऐतिहासिक संहिताओं के प्रावधानों को राजनीतिक मंचों पर उठाया जाता है, तो इससे वैचारिक ध्रुवीकरण के साथ-साथ कानूनी और सामाजिक व्यवस्था पर तीखी बहस छिड़ जाती है। ऐसे बयानों से शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक परिसरों में सुरक्षा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर नए सिरे से कानूनी व वैचारिक संघर्ष देखने को मिल सकता है, जो आने वाले दिनों में न्याय व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से संवेदनशील साबित हो सकता है।

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