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संसद में बहस की चुनौती पर घिरे राहुल गांधी, अमित शाह के 3 बजे वाले फॉर्मूले को विपक्ष ने नकाराराजनीति
13 अग॰ 2026, 12:07 am (30 दिन पहले)· 3

संसद में बहस की चुनौती पर घिरे राहुल गांधी, अमित शाह के 3 बजे वाले फॉर्मूले को विपक्ष ने नकारा

संसद में जारी 20 दिनों के गतिरोध के बीच गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को लोकसभा में चर्चा की सीधी चुनौती दी है, जिसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने खारिज करते हुए अपनी शर्तें रखी हैं।

संसद का सत्र पिछले 20 दिनों से लगातार जारी हंगामे और गतिरोध की भेंट चढ़ रहा है। विपक्ष द्वारा लगातार प्रश्न काल और विधायी कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करने के बीच गृह मंत्री अमित शाह ने सदन के भीतर सीधी चर्चा की पेशकश की। हालांकि, जंतर मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन और पेपर लीक मामलों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे राहुल गांधी और इंडी गठबंधन के नेताओं ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के बजाय नई शर्तें रख दी हैं।

लोकसभा में चर्चा के लिए समय सीमा और अमित शाह का फॉर्मूला

गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के विरोध का जवाब देते हुए एक स्पष्ट संसदीय प्रक्रिया का प्रस्ताव सामने रखा। उन्होंने कहा कि विपक्ष दोपहर 2 बजे तक लोकसभा स्पीकर को लिखित आवेदन सौंपे ताकि दोपहर 3 बजे से पूरे मामले पर औपचारिक बहस शुरू कराई जा सके। गृह मंत्री ने यह प्रतिबद्धता भी जताई कि वे विपक्षी सांसदों की हर बात और सवाल को ध्यानपूर्वक सुनेंगे तथा अगले दिन सरकार की ओर से विस्तृत जवाब देंगे। इसके बावजूद, विपक्षी दलों की ओर से स्पीकर को कोई औपचारिक पत्र नहीं सौंपा गया।

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विपक्ष की शर्तें और संसदीय नियमों पर छिड़ी बहस

चर्चा के तय फॉर्मूले को स्वीकार करने के बजाय कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तर्क दिया कि गृह मंत्री को बहस का समय और एजेंडा तय करने का अधिकार नहीं है। राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि उन्हें सरकार के व्याख्यान सुनने में कोई रुचि नहीं है और अमित शाह को केवल विपक्ष द्वारा पूछे गए सीमित प्रश्नों का ही उत्तर देना चाहिए। इस पर गृह मंत्री ने पलटवार करते हुए कहा कि संसद नियमों और ऑन रिकॉर्ड सवालों से चलती है, न कि मीडिया के माध्यम से लगाई गई व्यक्तिगत शर्तों पर।

संसदीय कार्य मंत्री का हस्तक्षेप और एंटी पेपर लीक बिल का पत्र

अपराह्न 3 बजे जब लोकसभा की कार्यवाही पुन: प्रारंभ हुई, तो विपक्षी सांसदों ने दोबारा नारेबाजी और हंगामा शुरू कर दिया। इस दौरान संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सदन में खड़े होकर विपक्षी दलों से तुरंत हंगामा बंद करने और बहस शुरू करने की अपील की। उधर, सरकार की तरफ से अमित शाह ने लोकसभा स्पीकर को एक पत्र लिखकर चर्चा शुरू कराने का आधिकारिक अनुरोध किया। पत्र में उल्लेख किया गया कि एंटी पेपर लीक विषय पर विपक्ष ने अपने विचार प्रस्तुत नहीं किए हैं, फिर भी सरकार इस महत्वपूर्ण विषय पर विस्तृत बहस के लिए पूरी तरह तैयार है।

झारखंड के छात्र आंदोलन और 12 वर्षों के राजनीतिक ट्रैक रिकॉर्ड पर निशाना

संसदीय गतिरोध के साथ-साथ झारखंड में छात्रों का आंदोलन जारी है, जिससे विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। जहां एक ओर राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की छवि को नुकसान पहुंचने का दावा कर रहे हैं, वहीं झारखंड के घटनाक्रम से उनकी स्वयं की छवि पर असर पड़ता दिख रहा है। वर्ष 2014 और 2016 के बाद से लगातार चुनावी असफलताओं के बावजूद विपक्ष द्वारा एक ही प्रकार के राजनीतिक दांव आजमाए जा रहे हैं। संसद में विदेशी फंडिंग से जुड़े नए विधेयक के आगमन ने इस पूरे प्रकरण में एक नया मोड़ ला दिया है।

सवाल-जवाब

गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में क्या प्रस्ताव दिया था?
अमित शाह ने प्रस्ताव दिया था कि विपक्ष दोपहर 2 बजे तक स्पीकर को पत्र दे दे, ताकि 3 बजे से संसद में बहस शुरू हो सके और वे अगले दिन सब सवालों का जवाब दे सकें।
राहुल गांधी ने अमित शाह के प्रस्ताव को क्यों अस्वीकार किया?
राहुल गांधी का कहना था कि अमित शाह बहस का समय और नियम तय नहीं कर सकते, और वे केवल विपक्ष द्वारा तय की गई शर्तों पर ही जवाब सुनना चाहते हैं।
संसद में कितने दिनों से गतिरोध चल रहा है?
लोकसभा और संसद में पिछले 20 दिनों से लगातार हंगामा और गतिरोध जारी है।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू का क्या रुख था?
किरेन रिजिजू ने विपक्षी सांसदों से तुरंत हंगामा बंद कर सरकार के साथ चर्चा में भाग लेने की अपील की।
गृह मंत्री ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखे पत्र में क्या कहा?
उन्होंने लिखा कि विपक्ष द्वारा विचार न रखने के बावजूद सरकार एंटी पेपर लीक मुद्दे पर फिर से चर्चा कराने के लिए तैयार है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ravikash Gupta@ravikash·29 दिन पहले

संसद में यह गतिरोध केवल विधायी कामकाज को ही नहीं रोक रहा, बल्कि बाजार और निवेशकों की नजर में देश की नीतिगत स्थिरता और सुधारों की गति पर भी नकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल रहा है। जब राजनैतिक गतिरोध के कारण महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक विधेयकों पर चर्चा टलती है, तो कॉरपोरेट जगत और वित्तीय बाजारों में नीतिगत अनिश्चितता का संदेश जाता है। यदि दोनों पक्ष संवाद की परिपक्वता नहीं दिखाते, तो आगामी आर्थिक सुधारों की टाइमलाइन प्रभावित हो सकती है।

Rohan Verma@rohan-verma·29 दिन पहले

संसद में पिछले 20 दिनों से चल रहा गतिरोध और अमित शाह के 3 बजे वाले फॉर्मूले पर राहुल गांधी की आपत्तियां यह दर्शाती हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर विधायी संवाद से अधिक राजनीतिक श्रेय की होड़ हावी है। एंटी पेपर लीक और जंतर-मंतर के छात्र प्रदर्शन जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सदन के भीतर नियमों के तहत चर्चा करने के बजाय व्यक्तिगत शर्तों का अड़ना लोकतांत्रिक प्रणालियों को कमजोर करता है। यदि यह गतिरोध आगे भी ऐसा ही रहा, तो आम जनता से जुड़े बुनियादी विधायी कार्य और नीतिगत सुधार पूरी तरह ठप हो सकते हैं, जिससे आगामी राजनीतिक और चुनावी समीकरणों पर गहरा असर पड़ना तय है।

Ravikash Gupta@ravikash·29 दिन पहले

संसदीय गतिरोध का यह लंबा दौर केवल राजनीतिक खींचतान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था और कॉरपोरेट सेंटीमेंट पर पड़ रहा है। जब देश के सबसे बड़े सदन में नीतिगत मामलों और विधायी सुधारों पर इस तरह अनिश्चितता बनी रहती है, तो वित्तीय बाज़ारों में अनिश्चितता का संदेश जाता है। स्टार्टअप्स, रोजगार और डिजिटल एसेट्स से जुड़े अहम विधेयकों के अटकने से निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है। यदि संसद में इस प्रकार का गतिरोध जारी रहा, तो दीर्घकालिक आर्थिक एजेंडे और देश की वित्तीय स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है, जिससे निवेशकों को भी सतर्क रुख अपनाना पड़ सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·29 दिन पहले

संसदीय गतिरोध और जंतर मंतर के विरोध प्रदर्शनों के बीच जिस प्रकार बहस की शर्तों पर आम सहमति नहीं बन पा रही है, वह विधायी प्रक्रिया और कार्यकारी उत्तरदायित्व के बीच के टकराव को दर्शाता है। यदि यह गतिरोध ऐसे ही बना रहा, तो एंटी पेपर लीक बिल जैसे महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दों पर कानून निर्माण की प्रक्रिया और अधिक बाधित होगी, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा और न्याय व्यवस्था से जुड़े मामलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·29 दिन पहले

संसद के भीतर नियमों और शर्तों की यह खींचतान सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के उन युवाओं और छात्रों पर पड़ रहा है जो पेपर लीक और रोजगार जैसे गंभीर संकटों से जूझ रहे हैं। जब सदन में रचनात्मक संवाद के बजाय अहंकार और शर्तों की दीवारें खड़ी हो जाती हैं, तब जनहित के महत्वपूर्ण विधायी कार्य ठप पड़ जाते हैं। यदि इस गतिरोध को संवाद के जरिए जल्द खत्म नहीं किया गया, तो आने वाले समय में चुनावी और सामाजिक मोर्चे पर इसके परिणाम और अधिक तीखे हो सकते हैं।

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