सुल्तानपुर लोकसभा सीट का दिलचस्प इतिहास: जब गोविंद वल्लभ पंत के बेटे को मिली थी हार और एक स्थानीय नेता ने रचा था इतिहासराजनीति
3 घंटे पहले· 0

सुल्तानपुर लोकसभा सीट का दिलचस्प इतिहास: जब गोविंद वल्लभ पंत के बेटे को मिली थी हार और एक स्थानीय नेता ने रचा था इतिहास

उत्तर प्रदेश की सुल्तानपुर लोकसभा सीट ने शुरुआती दशकों में ज्यादातर बाहरी नेताओं को संसद भेजा, मगर 1961 के उपचुनाव में जनता ने स्थानीयता को तरजीह दी और पंडित गोविंद वल्लभ पंत के पुत्र केसी पंत को हराकर बाबू गणपत सहाय को जिताया।

उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला अपने चुनावी इतिहास के लिहाज से एक अनोखी कहानी समेटे हुए है। यहां की लोकसभा सीट पर लंबे समय तक ज्यादातर ऐसे चेहरे काबिज रहे, जिनका जन्म इस जिले में हुआ ही नहीं था। यानी संसद तक पहुंचने वाले नेता अक्सर बाहर से आए और स्थानीय जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना।

शुरुआती सांसद और बाहरी चेहरों का दौर

देश में जब पहली बार 1951-52 में आम चुनाव हुए, तो सुल्तानपुर के पहले सांसद बने मोहम्मद अहमद काजमी, जो पेशे से अधिवक्ता थे और मूल रूप से इलाहाबाद के रहने वाले थे। इसके बाद 1957 के चुनाव में पंडित मदन मोहन मालवीय के पुत्र गोविंद मालवीय ने यहां से किस्मत आजमाई और सांसद चुने गए। हालांकि उनका कार्यकाल पूरा नहीं हो सका, क्योंकि सांसद रहते हुए ही गोविंद मालवीय का निधन हो गया।

1961 का वह उपचुनाव जिसने इतिहास बदला

गोविंद मालवीय के निधन के बाद 1961 में सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव कराना पड़ा। कांग्रेस ने इस बार बड़ा दांव खेलते हुए पंडित गोविंद वल्लभ पंत के पुत्र केसी पंत यानी कृष्ण चंद्र पंत को मैदान में उतारा। लेकिन इस बार सुल्तानपुर के मतदाताओं का मिजाज बदला हुआ था। जनता ने बाहरी और स्थानीय उम्मीदवार के सवाल को तवज्जो दी और स्थानीयता के आधार पर अपना फैसला सुनाया। नतीजा यह रहा कि केसी पंत को हार का सामना करना पड़ा और सांसद की कुर्सी बाबू गणपत सहाय के हिस्से आई। यह पहला अवसर था जब सुल्तानपुर से जीतकर संसद पहुंचने वाला नेता खुद इसी जिले का था।

यह मुकाबला बेहद कांटे का रहा। आंकड़ों की बात करें तो बाबू गणपत सहाय को 37,785 वोट मिले, जबकि कृष्ण चंद्र पंत को 36,656 मत हासिल हुए। यानी जीत-हार का फासला बहुत ज्यादा नहीं था, फिर भी स्थानीय भावना भारी पड़ी।

कांग्रेस नेतृत्व के लिए बड़ा सबक

वरिष्ठ पत्रकार राज खन्ना के मुताबिक, कृष्ण चंद्र पंत का सुल्तानपुर पहुंचना कांग्रेस नेतृत्व के लिए एक अहम सीख बनकर सामने आया। पंत का इस सीट से चुनावी रिश्ता तो जुड़ा, मगर इसके बाद वे शायद ही कभी दोबारा सुल्तानपुर की धरती पर लौटे। 1961 के इस उपचुनाव में स्थानीय बनाम बाहरी उम्मीदवार का मुद्दा खूब चर्चा में रहा और इसी ने चुनाव की दिशा तय कर दी।

जब कांग्रेस के सारे दांव फेल हो गए

सुल्तानपुर जिले के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह TrendKia को बताते हैं कि कृष्ण चंद्र पंत का यहां से चुनाव लड़ना उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय था। दरअसल इस चुनाव में कांग्रेस ने केसी पंत को जिताने के लिए हर मुमकिन कोशिश की थी। उस दौर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता थे और पार्टी उम्मीदवार पंत को जिताने की बड़ी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी। सरकार और संगठन, दोनों ही स्तरों पर कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी गई। नाराज कांग्रेसियों को मनाने से लेकर मतदाताओं को रिझाने तक के तमाम प्रयास किए गए, लेकिन ये सारी कोशिशें नाकाम साबित हुईं और कृष्ण चंद्र पंत को 1961 के उपचुनाव में हार का स्वाद चखना पड़ा।

सवाल-जवाब

1961 के सुल्तानपुर उपचुनाव में किसने जीत दर्ज की थी?
इस उपचुनाव में स्थानीय नेता बाबू गणपत सहाय ने जीत हासिल की और कांग्रेस के कृष्ण चंद्र पंत (केसी पंत) को हराया।
केसी पंत कौन थे और उनका हारना क्यों चर्चा में रहा?
केसी पंत यानी कृष्ण चंद्र पंत, पंडित गोविंद वल्लभ पंत के पुत्र थे। बड़ा नाम होने के बावजूद जनता ने स्थानीयता को तरजीह देते हुए उन्हें हरा दिया।
1961 के उपचुनाव में दोनों उम्मीदवारों को कितने वोट मिले थे?
बाबू गणपत सहाय को 37,785 वोट और कृष्ण चंद्र पंत को 36,656 वोट मिले थे।
सुल्तानपुर के पहले सांसद कौन थे?
1951-52 के पहले आम चुनाव में सुल्तानपुर के पहले सांसद इलाहाबाद निवासी अधिवक्ता मोहम्मद अहमद काजमी बने थे।
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