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पश्चिम बंगाल की सियासत में सयानी घोष का नया दांव, इंस्टाग्राम पोस्ट से विरोधियों को दिया कड़ा संदेशराजनीति
10 अग॰ 2026, 10:18 pm (32 दिन पहले)· 3

पश्चिम बंगाल की सियासत में सयानी घोष का नया दांव, इंस्टाग्राम पोस्ट से विरोधियों को दिया कड़ा संदेश

टीएमसी का साथ छोड़कर नेशनल सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल होने वाली सयानी घोष ने इंस्टाग्राम पर एक खास पोस्ट शेयर की है। एनडीए के समर्थन और ममता बनर्जी के खेमे से बगावत के बाद से उन्हें लगातार विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी बेबाक शैली के लिए पहचानी जाने वाली जाधवपुर से सांसद और अभिनेत्री सयानी घोष ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक खास पोस्ट साझा की है। इंस्टाग्राम पर सामने आई इस तस्वीर में उनके तेवर और अंदाज ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने अपनी इस पोस्ट के कैप्शन में अंग्रेजी की एक लोकप्रिय पंक्ति लिखी, जिसका राजनीतिक हलकों में अलग ही मतलब निकाला जा रहा है। यह महज एक आम सोशल मीडिया अपडेट नहीं है, बल्कि यह राज्य की मौजूदा सुलगती राजनीति के बीच उनके सख्त रुख और लापरवाह रवैये को खुलकर बयां करती है। तस्वीर में उन्होंने एक पारंपरिक काली साड़ी पहन रखी है, साथ ही गले में भारी चोकर हार और माथे पर लाल बिंदी सजाई हुई है। उनका यह लुक ऐसे वक्त में सामने आया है जब वे ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी को अलविदा कहकर नेशनल सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई का दाम थामने के बाद से लगातार आलोचनाओं और तीखे राजनीतिक हमलों के दौर से गुजर रही हैं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा सियासी भूचाल और बगावत

कुछ समय पहले पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में एक जबरदस्त भूचाल आया था जब तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने पार्टी से बगावत करके अपनी राहें जुदा कर लीं और एक नए राजनीतिक दल नेशनल सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया का गठन किया। इस पूरे घटनाक्रम में सयानी घोष इस बागी गुट के सबसे प्रमुख और चर्चित चेहरों में से एक बनकर उभरीं। जानकारों के मुताबिक दलबदल विरोधी कानून के शिकंजे से बचने के लिए सांसदों की यह दो-तिहाई संख्या बेहद जरूरी थी ताकि उनकी सदस्यता पर आंच न आए। इस नए दल के गठन के तुरंत बाद ही एनसीपीआई ने बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र की सत्ता पर काबिज राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को अपना समर्थन देने का खुला ऐलान कर दिया, जिससे बंगाल की राजनीति में पारा काफी हाई हो गया है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नाश्ता और सियासी समीकरण

हाल ही में राजधानी दिल्ली में एनडीए के तमाम घटक दलों और एनसीपीआई के नवनिर्वाचित सांसदों के लिए एक उच्चस्तरीय बैठक और विशेष ब्रेकफास्ट का आयोजन किया गया था, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शिरकत की। इस बैठक की जब तस्वीरें बाहर आईं तो उनमें सबसे ज्यादा जिस बात ने लोगों का ध्यान खींचा, वह थीं सयानी घोष। तस्वीरों में वे पहली पंक्ति में बैठी हुई नजर आईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एनडीए की इस महत्वपूर्ण बैठक में उनकी यह मौजूदगी और केंद्र सरकार के खेमे में जाकर समर्थन जताने के बाद से ही टीएमसी के समर्थक और उनके अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र के जमीनी कार्यकर्ता उन पर लगातार हमलावर हैं और तीखी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

कोलकाता से लेकर दिल्ली तक विरोध प्रदर्शनों का दौर

ममता बनर्जी का साथ छोड़कर एनडीए खेमे में शामिल होने के बाद से सयानी घोष को केवल ऑनलाइन माध्यमों पर ही नहीं बल्कि वास्तविक मैदान पर भी भारी गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। उनके अपने संसदीय क्षेत्र जाधवपुर के अंतर्गत आने वाले गड़फा इलाके में स्थित तृणमूल कार्यालय के बाहर हाल ही में ममता समर्थकों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया और उनके खिलाफ जमकर नारेबाजी की। इलाके के स्थानीय नेताओं का सीधा आरोप है कि पार्टी बदलकर एनडीए का हाथ थामने के बाद अब उन्हें और उनके समर्थकों को टीएमसी के किसी भी दफ्तर का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करने दिया जाएगा, जिससे वहां तनाव की स्थिति बनी हुई है।

इस तीखे राजनीतिक विरोध, सोशल मीडिया पर चल रही ट्रॉलिंग और जमीनी स्तर पर हो रही घेराबंदी के बीच सयानी घोष का यह नया पोस्ट कई मायने रखता है और इसके गहरे सियासी संदेश हैं। उनके इस कदम को राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं।

  • राजनीतिक विरोधियों को सीधा संदेश: उनके द्वारा इस्तेमाल की गई उस चर्चित पंक्ति का साफ अर्थ यह है कि उन्हें ट्रोल्स, राजनीतिक विरोधियों और अपने फैसलों पर उठाए जा रहे तमाम सवालों से कोई खास फर्क नहीं पड़ता है।
  • अडिग आत्मविश्वास का प्रदर्शन: तस्वीरों के माध्यम से वे अपने आलोचकों को यह बताना चाहती हैं कि टीएमसी छोड़कर एनडीए का हिस्सा बनने के अपने फैसले पर वे पूरी तरह से कायम हैं और किसी भी तरह की आलोचना उनके हौसले को नहीं डिगा सकती।
  • पारंपरिक लुक के साथ बेबाक तेवर: बिंदी और बंगाली साड़ी वाले पारंपरिक अंदाज को ग्लैमर और बेपरवाह रवैये के साथ पेश करके उन्होंने अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और तेवरों को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है।

सवाल-जवाब

सयानी घोष ने हाल ही में किस राजनीतिक दल को छोड़ा है?
सयानी घोष ने तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी को छोड़ दिया है।
सयानी घोष ने टीएमसी छोड़कर किस नई पार्टी का गठन किया है?
उन्होंने अन्य बागी सांसदों के साथ मिलकर नेशनल सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई का गठन किया है।
एनसीपीआई ने किस गठबंधन को अपना समर्थन दिया है?
एनसीपीआई ने केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को समर्थन देने का ऐलान किया है।
सयानी घोष किस निर्वाचन क्षेत्र से सांसद हैं?
सयानी घोष पश्चिम बंगाल के जाधवपुर से सांसद हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 3

Rohan Verma@rohan-verma·31 दिन पहले

सयानी घोष का टीएमसी से बगावत कर एनसीपीआई के जरिए एनडीए खेमे में जाना पश्चिम बंगाल की राजनीति में दलबदल विरोधी कानून और क्षेत्रीय क्षत्रपों के प्रभुत्व को चुनौती देने का एक बड़ा उदाहरण है। दो-तिहाई सांसदों के साथ यह बगावत भले ही संसद सदस्यता बचाने में कामयाब रही हो, लेकिन ममता बनर्जी के गढ़ में जमीनी स्तर पर तृणमूल कार्यकर्ताओं का आक्रामक विरोध और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी तस्वीरें आगामी चुनावों में ध्रुवीकरण को और तेज करेंगी। इससे बंगाल की पारंपरिक चुनावी जंग में एक नया और आक्रामक समीकरण उभर रहा है।

Ravikash Gupta@ravikash·31 दिन पहले

सयानी घोष के इस कदम से पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिरता और क्षेत्रीय सत्ता समीकरणों में एक नया मोड़ आ गया है। दलबदल कानून के दायरे में दो-तिहाई बहुमत के साथ इस प्रकार का राजनीतिक अलगाव और केंद्र सरकार के साथ सीधा जुड़ाव आने वाले समय में राज्य के कॉर्पोरेट निवेश, वित्तीय अनुदान और औद्योगिक नीतियों को भी प्रभावित कर सकता है। जब सत्ता का केंद्र बदलता है, तो राज्य की वित्तीय प्राथमिकताओं और विकास योजनाओं पर भी इसका सीधा असर देखने को मिलता है, जो बंगाल के भविष्य के आर्थिक परिदृश्य को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·31 दिन पहले

सयानी घोष के इस राजनीतिक घटनाक्रम और लगातार जारी विरोध प्रदर्शनों का असर सिर्फ चुनावी समीकरणों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सार्वजनिक जीवन में शामिल नेताओं के मानसिक स्वास्थ्य और तनाव प्रबंधन पर भी गंभीर असर पड़ता है। लगातार मिल रही धमकियों, सोशल मीडिया ट्रोलिंग और ज़मीनी स्तर पर हो रहे आक्रामक विरोध के बीच जन प्रतिनिधियों के लिए अपने मनोवैज्ञानिक संतुलन को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। इस उच्च तनाव वाले माहौल का असर न केवल उनके व्यक्तिगत कल्याण पर पड़ता है, बल्कि यह उनकी निर्णय लेने की क्षमता और सार्वजनिक दायित्वों के निर्वहन को भी प्रभावित कर सकता है।

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