राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से पश्चिम बंगाल में एक हजार नए स्कूल स्थापित करने के फैसले ने सियासी गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। शिवसेना (उद्धव गुट) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने इस घोषणा पर कड़ी आपत्ति जताई है। राउत ने संघ के इस कदम की आलोचना करते हुए इसके प्रशासनिक पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं और इसे लेकर कई तीखी टिप्पणियां की हैं। उनके इस बयान ने महाराष्ट्र से लेकर पश्चिम बंगाल तक राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है।
शिक्षक व्यवस्था को लेकर मोहन भागवत के दौरों पर तंज
संजय राउत ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत के हालिया विदेश दौरों को भी इस पूरी योजना से जोड़ दिया। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा कि जब संघ बंगाल में इतने बड़े पैमाने पर शैक्षणिक संस्थान खोलेगा, तो वहां पढ़ाने वाले शिक्षकों की व्यवस्था कहां से की जाएगी। राउत ने चुटकी लेते हुए सवाल किया कि क्या मोहन भागवत इसीलिए अमेरिका और इंग्लैंड के दौरे पर गए थे ताकि वहां से शिक्षकों का चयन करके लाया जा सके। उनका कहना था कि शिक्षण संस्थानों का संचालन करना और जनता को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराना किसी संगठन का नहीं, बल्कि चुनी हुई सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
केंद्र और राज्य की शिक्षा प्रणालियों पर उठाए सवाल
अपने आक्रामक रुख को जारी रखते हुए संजय राउत ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के साथ-साथ पश्चिम बंगाल की व्यवस्था पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आज के समय में देश की केंद्रीय और राज्य सरकारें अपनी-अपनी शिक्षा प्रणालियों को ठीक ढंग से चलाने में पूरी तरह विफल साबित हो रही हैं। सरकारी स्कूलों की हालत दयनीय है और नीतियां पूरी तरह दिशाहीन हो चुकी हैं। राउत का तर्क था कि चूंकि सरकारी शिक्षा का ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है, इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस खालीपन का फायदा उठाकर बंगाल में अपनी विचारधारा और पाठ्यक्रम को लागू करने की कोशिश कर रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा और इसके सियासी मायने
संजय राउत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संघ को शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय में हस्तक्षेप करने से पहले इसकी पूरी गहराई से अध्ययन करना चाहिए। किसी खास विचारधारा का प्रचार करना एक अलग विषय है, लेकिन स्कूली शिक्षा का प्रबंधन करना विशुद्ध रूप से एक प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्य है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राउत का यह बयान महज एक प्रशासनिक सवाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी हुई है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच वैचारिक संघर्ष लंबे समय से जारी है।
यदि संघ अपने नेटवर्क और स्कूलों का विस्तार बंगाल के दूरदराज के इलाकों में करता है, तो इससे जमीनी स्तर पर उसकी पकड़ और अधिक मजबूत होगी। इंडिया गठबंधन के एक प्रमुख घटक दल के रूप में शिवसेना (उद्धव गुट) इस संभावित विस्तार को रोकना चाहती है। पार्टी लगातार यह साबित करने का प्रयास कर रही है कि भाजपा और संघ की नीतियां राजनीतिक लाभ से प्रेरित हैं। दूसरी ओर, संघ के समर्थकों और भाजपा का हमेशा से यह पक्ष रहा है कि सरस्वती शिशु मंदिर और विद्या भारती जैसे संस्थान देश भर में कम खर्च पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ-साथ संस्कार देने का सराहनीय कार्य कर रहे हैं। संघ का मानना है कि पिछड़े क्षेत्रों के बच्चों तक बुनियादी शिक्षा पहुंचाना उनका सामाजिक कर्तव्य है।





















