पंजाब विधानसभा के बाहर मंगलवार को बेहद नाटकीय राजनीतिक टकराव देखने को मिला, जहाँ सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के विधायक सीधे तौर पर आपस में भिड़ गए। सदन की कार्यवाही में प्रवेश न मिलने से गुस्साए कांग्रेस विधायकों ने विधानसभा परिसर में जोरदार प्रदर्शन किया और अपना कड़ा असंतोष दर्ज कराने के लिए आम आदमी पार्टी के चुनाव चिह्न झाड़ू को आग के हवाले कर दिया। इस प्रतीकात्मक विरोध के बाद दोनों पक्षों के बीच शुरू हुई तकरार कुछ ही पलों में हाथापाई और धक्का-मुक्की में बदल गई, जिसने राज्य की संसदीय राजनीति के माहौल को पूरी तरह गरमा दिया।
पोडियम पर कब्जे को लेकर बढ़ा तनाव और हुई धक्का-मुक्की
झाड़ू जलाने के बाद विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा प्रेस को संबोधित करने के लिए मीडिया गैलरी की ओर बढ़े। इससे पहले कि वे कुछ कह पाते, आम आदमी पार्टी के विधायक कुलदीप सिंह धालीवाल ने आगे बढ़कर पोडियम पर अपनी जगह बना ली और अपना भाषण शुरू कर दिया। इस कदम से कांग्रेस खेमा भड़क गया। प्रताप सिंह बाजवा के साथ मौजूद पार्टी के अन्य विधायक तुरंत पोडियम के सामने आ डटे और जोर-जोर से नारेबाजी करने लगे। देखते ही देखते नेताओं के बीच तीखी बहस छिड़ गई, जिसने कुछ ही मिनटों में तीखे टकराव और धक्का-मुक्की का रूप ले लिया।
महिला विधायकों से बदसलूकी के आरोप और खैरा-मानुके में तीखी नोकझोंक
इस पूरे हंगामे के बाद आप विधायक कुलदीप सिंह धालीवाल ने विपक्षी दल पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया कि कांग्रेस नेताओं ने सत्ताधारी दल की महिला विधायकों के साथ बदसलूकी की और उन्हें धक्के दिए। धालीवाल ने स्पष्ट किया कि वे इस अमर्यादित व्यवहार की आधिकारिक शिकायत विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष रखेंगे। इसके तुरंत बाद सदन के बाहर माहौल और तनावपूर्ण हो गया जब कांग्रेस नेता सुखपाल सिंह खैरा ने मीडिया माइक संभाला। आप के विधायकों ने उनके खिलाफ भी नारेबाजी शुरू कर दी। इसी गहमागहमी के बीच आप विधायक सर्वजीत कौर मानुके ने सुखपाल सिंह खैरा के हाथ से कागज छीनने का प्रयास किया। खैरा ने टकराव से बचते हुए सत्ताधारी दल पर आरोप लगाया कि वह महिला नेताओं को ढाल बनाकर ओछी राजनीति कर रहा है। इसके जवाब में सर्वजीत कौर मानुके ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि वे महिला हैं लेकिन किसी से डरती नहीं हैं और यदि उन्होंने अपना मुंह खोला तो खैरा के लिए उसका जवाब देना भारी पड़ जाएगा।
स्पीकर के कामकाज पर प्रताप सिंह बाजवा के तीखे सवाल
पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका पर सीधा हमला बोला। बाजवा ने आरोप लगाया कि विधानसभा के स्पीकर पूरी तरह से एक तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि निर्वाचित कांग्रेस विधायकों को विधानसभा के मुख्य सदन में जाने से रोकना पूरी तरह से गैरकानूनी और असंवैधानिक कृत्य है। विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का सीधा हनन बताते हुए पूरे घटनाक्रम को जनविरोधी करार दिया।
मुख्यमंत्री भगवंत मान का कांग्रेस की गुटबाजी पर कटाक्ष
दूसरी तरफ राज्य के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कांग्रेस की अंदरूनी एकजुटता पर गहरा तंज कसा। पंजाब में राहुल गांधी की प्रस्तावित रैली की तैयारियों को लेकर कांग्रेस नेताओं की लगातार बैठकें चल रही हैं। हाल ही में एक वीडियो सामने आया था, जिसमें कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता एक ही गाड़ी में सवार होकर बैठक स्थल पर पहुंचे थे। उस वाहन को पंजाब कांग्रेस प्रभारी सचिन पायलट चला रहे थे, उनके बगल वाली सीट पर केसी वेणुगोपाल बैठे थे, जबकि पिछली सीट पर प्रताप सिंह बाजवा, चरणजीत सिंह चन्नी, अमरिंदर सिंह राजा वडिंग और परगट सिंह बैठे नजर आए थे। इसी वाकये पर चुटकी लेते हुए भगवंत मान ने टिप्पणी की कि पंजाब में कांग्रेस की स्थिति ठीक वैसी ही है जैसी उस कार में बैठे पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष परगट सिंह की थी। उन्होंने कहा कि जब परगट सिंह को अपनी ही पार्टी की गाड़ी में ढंग से बैठने की जगह नहीं मिल पा रही, तो पंजाब की जनता उन्हें भला क्या तवज्जो देगी।
शराब की बोतल और घंटी लेकर विधानसभा पहुंचे रवनीत बिट्टू
जहाँ एक ओर मुख्यमंत्री भगवंत मान कांग्रेस पर सियासी तीर चला रहे थे, वहीं दूसरी ओर बीजेपी नेता रवनीत बिट्टू ने सीधे मुख्यमंत्री को अपने निशाने पर ले लिया। रवनीत बिट्टू विधानसभा परिसर में शराब की एक बोतल लेकर पहुंचे, जिस पर एक घंटी बंधी हुई थी। वे परिसर में लगातार उस घंटी को बजाते रहे और दावा किया कि शराब की बोतल को देखकर मुख्यमंत्री भगवंत मान का दिल डोलने लगता है। रवनीत बिट्टू ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि इसी शराब की बोतल से जुड़े मामले के कारण मुख्यमंत्री को दिल्ली एयरपोर्ट पर तीन घंटे तक रोके रखा गया था और उन पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी ठोका गया था।
मानसा में नशे की ओवरडोज से युवक की मौत और सड़क पर प्रदर्शन
राज्य में मचे इस सियासी घमासान के बीच पंजाब में नशे का संकट एक बार फिर विकराल रूप में सामने आया, जब मानसा जिले के भम्मे कलां गांव निवासी 35 वर्षीय दलजीत की मौत हो गई। शुरुआती जानकारी के अनुसार, दलजीत की जान नशे की ओवरडोज के चलते गई। इस घटना से आक्रोशित ग्रामीणों ने युवक के शव को सिरसा-मानसा मार्ग पर रखकर सड़क जाम कर दी और जोरदार विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इलाके में तनाव पहले से ही गहराया हुआ था, क्योंकि मानसा में नशे के गैरकानूनी कारोबार का खुलकर विरोध करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा की लगभग 15 दिन पहले गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। झोटा के परिजनों ने घटना के बाद से अब तक उनका अंतिम संस्कार नहीं किया है और उनका पार्थिव शरीर मानसा में रखकर लगातार इंसाफ की मांग को लेकर प्रदर्शन जारी है।
शव को शहर ले जाने की कोशिश, पुलिस की सख्ती और नेताओं की शिरकत
दलजीत की मौत के बाद उनके परिजनों और ग्रामीणों ने मृतक के शव को मानसा शहर ले जाने का फैसला किया। इस दौरान कांग्रेस, बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के कई नेता भी पीड़ित परिवार के समर्थन में सड़क पर उतर आए। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए पुलिस और प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को तुरंत मौके पर भेजा गया ताकि वे परिवार और ग्रामीणों को समझा-बुझाकर शांत करा सकें। कई दौर की प्रशासनिक बातचीत के बावजूद परिजन अपनी मांगों पर अड़े रहे और हटने को तैयार नहीं हुए। इसके बाद पुलिस ने कड़ा रुख अपनाते हुए कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया, मृतक दलजीत के शव को जबरन अपने कब्जे में लिया और पोस्टमॉर्टम के लिए अस्पताल भेज दिया। पुलिस और प्रशासन की इस एकतरफा कार्रवाई के चलते पूरे मानसा इलाके में स्थानीय लोगों के भीतर गहरा रोष फैल गया है।
भगवंत मान सरकार के लिए गहराती राजनीतिक चुनौती
पंजाब में विपक्षी दल, विशेषकर बीजेपी, नशे की अनियंत्रित समस्या को राज्य सरकार के खिलाफ सबसे प्रमुख राजनीतिक हथियार बना रहे हैं। लगातार हो रही मौतों, परिवारों के अनवरत धरनों और पुलिस की सख्त कार्यशैली के चलते यह मुद्दा मुख्यमंत्री भगवंत मान के लिए एक गंभीर प्रशासनिक व राजनीतिक संकट बनता जा रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री आमतौर पर अपने चिरपरिचित हाजिरजवाबी और चुटीले अंदाज से राजनीतिक विरोधियों पर पलटवार करते रहे हैं, लेकिन धरातल पर नशे से उजड़ते परिवारों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर उठ रहे गंभीर सवालों का ठोस समाधान तलाशना उनके प्रशासन के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो रहा है।



















