पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी सियासत में इन दिनों भारी हलचल मची हुई है, जहां संगठनात्मक ढांचे में बड़े उलटफेर की बिसात बिछाई जा चुकी है। राज्य में लगातार जारी गुटबाजी और नेताओं के बीच की तनातनी को समाप्त करने के मकसद से पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व ने सचिन पायलट को अहम दायित्व सौंपा था। अपनी जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने धरातल पर जाकर विभिन्न खेमों की नब्ज टटोली और पूरे सियासी समीकरण का ब्योरा पार्टी आलाकमान के सामने रख दिया है। इस विस्तृत रिपोर्ट के दिल्ली पहुंचते ही सूबे की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर चर्चाओं का बाजार पूरी तरह गर्म हो चुका है।
राज्य में अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच जारी तनातनी किसी से छिपी नहीं रही है। दोनों ही प्रमुख नेता अक्सर अलग-अलग सुर अलापते दिखाई देते रहे, जिससे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस की स्थिति लगातार गहराती गई। पार्टी के भीतर इस बिखराव को रोकने के लिए पूर्व में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को भी कमान सौंपी गई थी, मगर गुटों के आपसी मतभेद थमने का नाम नहीं ले रहे थे। ऐसे नाजुक दौर में सचिन पायलट को यह उलझन सुलझाने का जिम्मा मिला, जिन्होंने सभी पक्षों से संवाद स्थापित कर एक निर्णायक रिपोर्ट तैयार की है।
राजा वड़िंग पर उठते सवाल और फेरबदल की जमीन
प्रदेश संगठन की बागडोर संभाल रहे अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के कामकाज के तौर-तरीकों को लेकर पार्टी के भीतर काफी समय से असंतोष पनप रहा था। एक तरफ उनका अपना समर्थक वर्ग सक्रिय था, तो दूसरी तरफ चन्नी के प्रभाव वाले नेता संगठन के भीतर अपनी उपेक्षा महसूस कर रहे थे। दोनों खेमों की यह खींचतान सार्वजनिक मंचों पर भी कई दफा खुलकर सामने आ चुकी थी। सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने भी प्रदेश नेतृत्व की कार्यशैली पर खुले तौर पर ऐतराज जताया था, जिससे विवाद और गहरा गया था।
नेताओं के बीच की यह दूरी कई बड़े कार्यक्रमों में भी साफ नजर आई। हालांकि चंडीगढ़ में सचिन पायलट की मौजूदगी के दौरान हुए एक धरने में चन्नी शामिल हुए थे, जिससे लगा था कि शायद सुलह का रास्ता निकल आया है। मगर इसके तुरंत बाद जब वड़िंग की अगुवाई में एक अन्य विरोध प्रदर्शन हुआ, तो चन्नी ने वहां से पूरी तरह दूरी बना ली। इस तरह की घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि दोनों दिग्गजों के बीच की खाई पाटना आसान नहीं है और संगठन को पटरी पर लाने के लिए कड़े कदम उठाने की दरकार है।
जातीय और क्षेत्रीय समीकरण साधने की चुनौती
पायलट की रिपोर्ट के बाद अब प्रदेश अध्यक्ष के पद पर नए चेहरे को बैठाने की कवायद शुरू हो चुकी है। इस रेस में कई प्रमुख नेताओं के नाम सियासी गलियारों में तैर रहे हैं। पूर्व कैबिनेट मंत्री विजय इंदर सिंगला का नाम मजबूती के साथ चर्चा में है। इसके साथ ही जालंधर कैंट से विधायक परगट सिंह और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप बाजवा के नामों पर भी मंथन किया जा रहा है। आलाकमान के सामने सबसे बड़ी पहेली सामाजिक संतुलन को बनाए रखने की है।
अगर पार्टी सूबे के परंपरागत जट्ट सिख समीकरण को प्राथमिकता देती है, तो प्रताप बाजवा या परगट सिंह को आगे किया जा सकता है। वहीं यदि हिंदू मतदाताओं को आकर्षित करने और व्यापक सामाजिक संतुलन साधने की रणनीति अपनाई जाती है, तो विजय इंदर सिंगला के नाम पर मुहर लग सकती है। नेतृत्व को ऐसा फैसला लेना होगा जिससे किसी भी गुट में दोबारा असंतोष की ज्वाला न भड़के।
राजस्थान के संघर्ष से निकलकर राष्ट्रीय मंच पर बढ़ता कद
सचिन पायलट की इस संगठनात्मक भूमिका को उनके पुराने सियासी सफर के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। राजस्थान में लंबे अरसे तक अशोक गहलोत के साथ उनके राजनीतिक मतभेद चर्चा में रहे थे। वर्ष 2020 के राजनीतिक संकट के दौरान जब पायलट समर्थक विधायकों ने अलग रुख अपनाया था, तब गहलोत ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत रखी थी। इसके बाद 2022 में भी नेतृत्व को लेकर खींचतान जारी रही थी।
लेकिन अब तस्वीर काफी हद तक बदल चुकी है। जिस नेता को कभी अपने ही गृह राज्य में संघर्ष का सामना करना पड़ा था, वही अब दूसरे महत्वपूर्ण राज्य में गुटबाजी के पेंच सुलझाने वाले संकटमोचक के तौर पर उभर रहे हैं। पायलट ने पंजाब में जिला स्तर के पदाधिकारियों, युवा विंग के साथियों और वरिष्ठ नेताओं से सीधा संवाद कर संगठन की कमजोरियों को परखा। इस पूरी प्रक्रिया ने राष्ट्रीय स्तर पर उनके राजनीतिक कद को और अधिक मजबूती प्रदान की है।
2027 के चुनावी रण की दिशा तय करने की कोशिश
कांग्रेस पार्टी का पूरा ध्यान अब वर्ष 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों पर टिका हुआ है। विपक्षी दल अभी से चुनावी तैयारियों को धार देने में जुट गए हैं, ऐसे में कांग्रेस अपने घर के झगड़ों में ज्यादा वक्त गंवाने का जोखिम नहीं उठा सकती। पार्टी की प्राथमिकता एक ऐसा अध्यक्ष चुनने की है जो चन्नी, वड़िंग और अन्य सभी धड़ों को एक मंच पर ला सके।
सचिन पायलट द्वारा सौंपी गई विस्तृत समीक्षा को इसी चुनावी रोडमैप की पहली सीढ़ी माना जा रहा है। यदि पार्टी समय रहते अपने संगठनात्मक ढांचे को दुरुस्त कर लेती है और आपसी कलह पर लगाम लगाने में सफल रहती है, तो 2027 के समर में वह पूरी ताकत के साथ उतर सकेगी। आने वाले दिनों में दिल्ली में होने वाली उच्चस्तरीय बैठकें यह तय करेंगी कि पंजाब में पार्टी का नया चेहरा कौन होगा।



















