राजस्थान के करौली जिले में सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन वास्तुकला का एक ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जिसके विषय में बहुत कम लोगों को जानकारी है। जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भांकरी गांव के केंद्र में महर्षि वेदव्यास का लगभग 500 साल पुराना मंदिर आज भी अपनी ऐतिहासिक पहचान और धार्मिक परंपराओं को संजोए हुए है। स्थानीय ग्रामीण इस पावन स्थल को 'बड़ा मंदिर' कहकर पुकारते हैं।
गांव के व्यास परिवारों द्वारा लगभग पांच सदी पहले निर्मित इस मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों का ऐसा विश्वास है कि यह राजस्थान में महर्षि वेदव्यास का एकमात्र मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने ही वेदों का संकलन कर उन्हें सामान्य जनमानस के लिए बोधगम्य और सरल बनाया था। महाभारत, श्रीमद्भागवत महापुराण समेत कई महान ग्रंथों की रचना और संपादन से उनका नाम गहराई से जुड़ा हुआ है। यही मुख्य वजह है कि भांकरी के इस धार्मिक स्थल पर महर्षि वेदव्यास के दर्शन करने और वेदों के मंत्रोच्चार का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है।
स्थानीय निवासी जनार्दन उपाध्याय के अनुसार, इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना करीब 500 वर्ष पूर्व गांव के व्यास परिवारों ने सामूहिक रूप से करवाई थी। मंदिर के गर्भ गृह में महर्षि वेदव्यास की लगभग 3 फीट ऊंची अष्टधातु की भव्य प्रतिमा स्थापित है। इसके अतिरिक्त, संकट मोचन हनुमान की मूर्ति भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का मुख्य केंद्र बनी हुई है। इन दोनों पावन देव प्रतिमाओं के दर्शन के लिए न केवल स्थानीय नागरिक बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से भी भारी संख्या में भक्तजन पहुंचते हैं।
भांकरी के इस प्राचीन धाम में आसपास के गांवों के साथ-साथ राजधानी जयपुर, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, अलवर समेत कई दूरवर्ती इलाकों से भी लोग दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर के पुजारी राधेश्याम शर्मा का कहना है कि यहां महर्षि वेदव्यास की पूजा-अर्चना और दर्शन को लेकर भक्तों के मन में अनन्य श्रद्धा है। ऐसी गहरी मान्यता है कि इस पवित्र मंदिर परिसर में वेदों का उच्चारण करने से सभी प्रकार के संकटों का निवारण होता है और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
इस प्राचीन मंदिर की सबसे विशिष्ट खासियत इसकी अनूठी और प्राचीन निर्माण शैली है। पूरी इमारत बिना किसी आधुनिक सहारे के 16 मजबूत खंभों के ऊपर टिकी हुई है। इसके निर्माण कार्य में लाल पत्थरों के बड़े और भारी-भरकम टुकड़ों का उपयोग किया गया है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, लगभग 7 से 8 इंच मोटाई वाले इन पत्थरों को बिना किसी चूने और बजरी के इस्तेमाल के आपस में सटीक तरीके से जोड़कर इस मंदिर को खड़ा किया गया था। सदियों पुराना होने के बावजूद यह प्राचीन वास्तुकला आज भी देखने वालों के लिए कौतुक और आकर्षण का विषय बनी हुई है।
मंदिर में सामान्य दिनों के अलावा प्रत्येक पूर्णिमा तिथि और विभिन्न प्रमुख पर्वों के अवसर पर विशेष धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-अर्चना संपन्न होती है। पुजारी के अनुसार, महर्षि वेदव्यास को मुख्य रूप से खीर-पूरी, हलवा, लड्डू और पंचमेवा का नैवेद्य अर्पित किया जाता है। मंदिर में नियमित रूप से सुबह और शाम के समय पारंपरिक तरीके से झालर बजाकर आरती की जाती है। अनुष्ठान के दौरान गूंजने वाले वैदिक मंत्रोच्चार से संपूर्ण मंदिर परिसर में प्रातः काल से लेकर रात्रि तक पूरी तरह भक्तिमय वातावरण बना रहता है।
लगभग पांच सौ वर्षों का लंबा कालखंड बीत जाने के बाद भी इस मंदिर की संरचना का इतनी मजबूत अवस्था में बने रहना आज भी लोगों को आश्चर्यचकित करता है। प्राचीन और उन्नत तकनीक के माध्यम से निर्मित यह पावन स्थल समय के थपेड़ों को झेलते हुए भी अपनी मूल वास्तुकला को सुरक्षित रखे हुए है। मंदिर में उपयोग किए गए मजबूत पत्थर और इसकी विशिष्ट निर्माण कला उस दौर की इंजीनियरिंग और कला कौशल की जीवंत मिसाल पेश करते हैं।
















