राजस्थान के सुप्रसिद्ध और इकलौते पर्वतीय पर्यटन केंद्र माउंट आबू की सांस्कृतिक पहचान को नया रूप देते हुए राज्य सरकार ने इसका नाम आबूराज करने का आदेश जारी किया। इस ऐतिहासिक घोषणा के प्रति अपनी गहरी निष्ठा व्यक्त करने के लिए पाली जिले के एक संत ने अनोखी तपस्या का मार्ग चुना। सोजत स्थित गंगाबेरी गौशाला के संचालक महंत बजरंगदास महाराज ने इस निर्णय का स्वागत करने के लिए 200 किलोमीटर से अधिक दूरी की बेहद दुष्कर दंडवत यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की। पूरे मारवाड़ तथा सिरोही अंचल में संतों और आम श्रद्धालुओं के बीच उनकी इस अटूट धार्मिक लगन की व्यापक स्तर पर सराहना की जा रही है।
पाली के सोजत से शुरू हुआ था डेढ़ महीने का तपस्वी सफर
प्रशासनिक स्तर पर नाम परिवर्तन की आधिकारिक स्वीकृति मिलते ही महंत बजरंगदास महाराज ने अपनी इस अनूठी प्रतिज्ञा का एलान किया था। उन्होंने 3 अगस्त के दिन पाली जिले के सोजत नगर में मौजूद गंगाबेरी गौशाला परिसर से अपनी दंडवत यात्रा का शुभारंभ किया। इस यात्रा की विशेषता यह थी कि संत को हर कदम पर जमीन पर लेटकर साष्टांग प्रणाम करते हुए आगे बढ़ना था। मानसून के मौसम में मूसलाधार बारिश, चिपचिपी कीचड़ और अरावली की पथरीली चढ़ाई जैसी कठिन चुनौतियों के बावजूद संत ने अपना क्रम रुकने नहीं दिया। लगभग डेढ़ महीने तक अनवरत चली इस आत्मिक यात्रा के दौरान उनके समर्पित सेवादार और श्रद्धालु भी हर समय उनके साथ पैदल चलते रहे।
सड़क मार्ग पर विभिन्न गांवों और मंदिरों में उमड़ी भीड़
सोजत से प्रस्थान करने के बाद यह आध्यात्मिक कारवां पाली शहर, सांडेराव और सुमेरपुर के मुख्य मार्गों से आगे बढ़ा। जैसे ही यह जत्था सीमा पार करके सिरोही जिले में दाखिल हुआ, सिरोड़ी गांव के निवासियों ने संत का पुष्प वर्षा और जयकारों के साथ स्वागत किया। अपनी इस लंबी साधना के दौरान संत ने बामनवाड़जी महादेव मंदिर, सिरोड़ी के सोनाधारी महादेव मंदिर, अनादरा और मामाजी बावसी जैसे प्रमुख आस्था केंद्रों पर मत्था टेका और पूजा-अर्चना की। यात्रा मार्ग में पड़ने वाली बस्तियों में स्थानीय नागरिकों, महिलाओं और साधु-संतों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी, जिन्होंने संत के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया।
देलवाड़ा के अग्नेश्वर महादेव मंदिर में विधिवत पूर्णाहुति
पैंतालीस दिनों से अधिक समय तक कठिन शारीरिक श्रम और श्रद्धा का परिचय देते हुए महंत बजरंगदास महाराज आखिरकार आबूराज के देलवाड़ा क्षेत्र पहुंचे। यहां स्थित ऐतिहासिक अग्नेश्वर महादेव मंदिर के प्रांगण में उनकी इस 200 किलोमीटर की दंडवत यात्रा की विधिवत पूर्णाहुति हुई। गंतव्य पर पहुंचने पर महंत निरंजन गिरी महाराज की अगुवाई में स्थानीय संतों और हजारों श्रद्धालुओं ने उनका स्वागत किया। इस सफल समापन के उपलक्ष्य में मंदिर परिसर में एक भव्य भजन संध्या आयोजित की गई, जिसमें देर रात तक भक्तगण भजनों की स्वर लहरियों में लीन रहे।
औपनिवेशिक छाप मिटाकर प्राचीन सांस्कृतिक स्वरूप की बहाली
पर्वतीय नगरी का नाम आबूराज करने का विचार अचानक सामने नहीं आया था, बल्कि इसके पीछे एक लंबा वैचारिक आंदोलन काम कर रहा था। स्थानीय निवासियों और आध्यात्मिक संगठनों का कहना था कि ब्रिटिश हुकूमत ने अपने प्रशासनिक कामकाज की सहूलियत के लिए इस क्षेत्र को माउंट आबू पुकारना शुरू किया था। पौराणिक ग्रंथों और स्थानीय लोक परंपरा में इस पावन भूभाग को सदियों से अर्बुदांचल और आबूराज के रूप में मान्यता प्राप्त रही है। अपनी इस खोई हुई ऐतिहासिक पहचान को पुनर्स्थापित कराने के लिए जून 2025 में 53 सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं ने संतों के नेतृत्व में एक विशाल कलश यात्रा भी निकाली थी। सरकार द्वारा जनआकांक्षाओं का सम्मान करते हुए नया नाम तय किए जाने से पूरे क्षेत्र में हर्ष का माहौल बना हुआ है।




















