बनारस की सांस्कृतिक धरती पर पले-बढ़े आशीष सिंह की कला यात्रा यह साबित करती है कि यदि समर्पण सच्चा हो तो विरोध भी रास्ते की रुकावट नहीं बन सकता। बचपन में जब बच्चे खिलौनों की दुनिया में खोए रहते थे, तब आशीष के कानों में मंदिरों के कीर्तन और घुंघरुओं की झंकार गूंजती थी। पूजा-अर्चना और भजनों के बीच उनका मन अनायास ही थिरकने लगता था, लेकिन परिवार के भीतर इस शौक को सहजता से स्वीकार नहीं किया गया। विशेष रूप से उनके दादाजी लड़के के नाचने के सख्त खिलाफ थे। इसके चलते आशीष को अक्सर डांट, फटकार, तानों और यहां तक कि पिटाई का भी सामना करना पड़ा। इस गहरे पारिवारिक तनाव के बावजूद नृत्य के प्रति उनकी निष्ठा कभी डगमगाई नहीं।
कठिन विरोध के उस शुरुआती दौर में उनकी मां और दादी उनके लिए संबल बनीं। परिजनों की नाराजगी से बचते हुए आशीष ने शुरुआत में लोकगीतों की धुनों पर थिरकना सीखा। जैसे-जैसे समय बीतता गया, लोक कलाओं से शुरू हुआ यह सफर शास्त्रीय अनुशासन की ओर मुड़ गया। आज वही बालक देश के कोने-कोने के अलावा चीन के अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक मंचों पर भारतीय शास्त्रीय कला की छाप छोड़ चुका है। पिछले लगभग 10 वर्षों से वे वृंदावन धाम में रहकर कथक की गहन साधना में लीन हैं और पारंपरिक शास्त्रीय धरोहर को सहेजने का कार्य कर रहे हैं।
कबीरचौरा से जुड़ी यादें और नृत्य का पहला स्पर्श
आशीष सिंह का जन्म काशी के प्रसिद्ध सांस्कृतिक मोहल्ले कबीरचौरा में हुआ था। अपनी शुरुआती कलात्मक प्रेरणा के बारे में बताते हुए वे बचपन के एक खास पारिवारिक मिलन का स्मरण करते हैं। लंबे अंतराल के बाद जब वे अपने माता-पिता से मिले, तो घर में उत्सव का वातावरण था और उसी खुशी में एक संगीत संध्या रखी गई थी। उस आयोजन में कथक नृत्यांगना सरला नारायण सिंह उपस्थित थीं, जिन्होंने बालक आशीष को अपनी गोद में लेकर होली नृत्य की भावपूर्ण प्रस्तुति दी थी।
आशीष मानते हैं कि इसी पल ने उनके अवचेतन में नृत्य का बीज बो दिया था। इसके बाद मोहल्ले और आसपास के देवालयों में जब भी भजन-कीर्तन गूंजते, वे खुद को रोक नहीं पाते थे और ताल पर झूमने लगते थे। यद्यपि दादाजी की नाराजगी के चलते घर का माहौल कई बार तनावपूर्ण हो जाता था, लेकिन मां और दादी के मूक समर्थन ने उनके भीतर के कलाकार को मुरझाने नहीं दिया। लोक परंपराओं से ताल मिलाते-मिलाते वे पूरी तरह कथक के रंग में रंगते चले गए।
पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज की परंपरा से मिली विधिवत तालीम
जब कला ही जीवन का ध्येय बन गई, तो आशीष ने शास्त्रीय नृत्य की बाकायदा औपचारिक शिक्षा शुरू की। उन्होंने बनारस में पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज की शिष्या संगीता सिन्हा के सानिध्य में कथक के बुनियादी व्याकरण, लयकारी और भाव-भंगिमाओं की बारीक तालीम हासिल की। इसके उपरांत उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के मंच कला संकाय में प्रवेश लिया, जहां से उन्होंने कथक विषय में स्नातक और स्नातकोत्तर दोनों डिग्रियां सफलतापूर्वक पूरी कीं।
आशीष कथक को केवल देह की गति या मनोरंजन का साधन नहीं मानते। उनके दृष्टिकोण में यह विधा वर्षों के कठोर तप, अनुशासन, शारीरिक संतुलन और आत्मसमर्पण की एक आध्यात्मिक यात्रा है। वे स्पष्ट करते हैं कि कथक की गौरवशाली यात्रा सदियों पुरानी है, जो प्राचीन काल में देवालयों की भक्ति परंपरा से आरंभ हुई थी। समय बीतने के साथ यह कला राजदरबारों में पहुंची जहां इसमें परिष्कार और जटिल लयकारी का विस्तार हुआ, और वर्तमान में यह समकालीन प्रेक्षागृहों तक पहुंच चुकी है।
विदेशी मंचों से लेकर 2500 से अधिक शिष्यों को प्रशिक्षण
शास्त्रीय शिक्षा संपन्न करने के बाद आशीष सिंह ने भारत के कई प्रमुख सांस्कृतिक केंद्रों में अपनी कला का प्रदर्शन किया। वे इलाहाबाद, मुंबई, पुणे, कोलकाता और लखनऊ जैसे बड़े शहरों के प्रतिष्ठित ऑडिटोरियम में कथक प्रस्तुत कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें चीन में भी मंच पर अपनी भारतीय कला का जौहर दिखाने का सुअवसर मिला, जहां विदेशी दर्शकों ने कथक की लय और भाव अभिव्यक्ति को खूब सराहा।
अपनी कलात्मक पहचान स्थापित करने के बाद आशीष ने इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का दायित्व उठाया है। वे अब तक लगभग 2500 शिक्षार्थियों को कथक का गहन प्रशिक्षण दे चुके हैं। उनका दृढ़ मत है कि शास्त्रीय नृत्य की विरासत केवल महानगरों और बड़े सभागारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। देश के सुदूर क्षेत्रों, कस्बों और गांवों में रहने वाले युवाओं को भी इस सांस्कृतिक धरोहर से परिचित होने और इसे सीखने का समान अवसर मिलना चाहिए।
नैनीताल में निशुल्क कार्यशाला और राधारमण के प्रति समर्पण
इसी उद्देश्य को लेकर आशीष सिंह उत्तराखंड के पहाड़ी अंचल नैनीताल पहुंचे हैं। वहां तल्लीताल स्थित वृंदावन स्कूल परिसर में 25 से 29 सितंबर तक एक विशेष निशुल्क कथक कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। इस पांच दिवसीय शिविर के माध्यम से वे पर्वतीय क्षेत्र के बच्चों और किशोरों को शास्त्रीय ताल, हस्तक और भावों का प्रारंभिक प्रशिक्षण दे रहे हैं। उनका संकल्प है कि अटक से कटक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारतीय नृत्य परंपरा का प्रसार हो, ताकि युवा पीढ़ी अपनी मूल जड़ों से जुड़ी रहे।
बचपन में अपनों की डांट और प्रताड़ना सहने वाले आशीष की प्राथमिकताएं अब बदल चुकी हैं। कभी प्रसिद्ध मंचों की चकाचौंध उनके सफर का हिस्सा हुआ करती थी, परंतु अब उनका पूरा ध्यान विशुद्ध साधना पर केंद्रित है। वृंदावन में रहकर वे अपने इष्टदेव श्री राधारमण को अपनी कला से रिझाना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानते हैं। उनके लिए कला अब यश पाने का माध्यम नहीं, बल्कि भक्ति और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति सौंपने का एक पवित्र माध्यम बन चुकी है।




















