राजस्थान के करौली स्थित राजकीय महाविद्यालय परिसर में शनिवार सुबह एनसीसी के विद्यार्थियों का जबर्दस्त आक्रोश देखने को मिला। पूरा विवाद तब भड़का जब एनसीसी में अंतिम रूप से चयनित हो चुके 40 कैडेट्स को एकाएक सूची से बेदखल कर दिया गया। ये वे युवा हैं जिन्होंने करीब एक माह पूर्व आयोजित सभी कठिन चरणों को उत्तीर्ण कर अंतिम सूची में जगह पाई थी। कॉलेज में अपना औपचारिक नामांकन पूरा करने के बाद इन युवाओं ने 10 दिनों का कड़ा ड्रिल अभ्यास भी पूरा किया था। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 15 अगस्त को आयोजित औपचारिक परेड में पूरे गर्व से कदमताल करने वाले इन नौजवानों को अब पता चला है कि वे इस संगठन का हिस्सा ही नहीं हैं।
कॉलेज के मुख्य द्वार पर तालाबंदी और दो घंटे तक प्रदर्शन
इस अप्रत्याशित फैसले से क्षुब्ध होकर युवाओं ने शनिवार तड़के कॉलेज प्रशासन के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। परिसर के मुख्य प्रवेश द्वार को बंद करके उस पर भारी ताला लगा दिया गया और जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी गई। प्रवेश मार्ग अवरुद्ध होने के चलते कॉलेज के प्राध्यापकों, कर्मचारियों और अन्य सामान्य विद्यार्थियों को भीतर जाने के लिए तकरीबन दो घंटे तक बाहर खड़े रहकर भारी असुविधा झेलनी पड़ी। आंदोलनरत कैडेट्स का तर्क था कि शुरुआत में 80 रिक्तियों की घोषणा की गई थी। इन 80 स्थानों पर स्थान पाने के लिए उन्होंने कई महीनों तक पसीना बहाया था। दौड़, शारीरिक दक्षता, लिखित मूल्यांकन, चिकित्सीय परीक्षण और व्यक्तिगत साक्षात्कार के अत्यंत कड़े मापदंड पूरे करके ही मेरिट सूची में 80 नाम तय हुए थे, जिसे अब रातों-रात काटकर आधा कर दिया गया है।
छात्रों के भविष्य और सपनों पर गहरा आघात
संस्थान से हटाए गए प्रभावित छात्र महेंद्र सिंह सेंगर ने व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा, "अंतिम चयन के बाद सीटों को अस्सी से घटाकर चालीस करना सरासर अन्याय है।" उन्होंने बताया कि महीनों तक जी-तोड़ पसीना बहाने के बाद राष्ट्रीय पर्व की परेड में गौरव के साथ भाग लिया था, लेकिन अब इस तरह का फैसला उनके भविष्य और मातृभूमि की सेवा की आकांक्षाओं पर पानी फेर रहा है। इसी प्रकार के दर्द से जूझ रहे छात्र मोहित सिंह ने बताया कि उन्होंने तो उच्च शिक्षा के लिए करौली के इस कॉलेज का चयन ही मात्र इसलिए किया था ताकि वे एनसीसी प्रशिक्षण हासिल कर सकें। उनका कहना है कि इस गैरजिम्मेदाराना फैसले के कारण उनका करियर अनिश्चितता के भंवर में फंस चुका है।
एनसीसी के लिए छोड़ा था गृह क्षेत्र का सरकारी कॉलेज
प्रशासनिक लापरवाही का सबसे बड़ा उदाहरण छात्र सारांश तिवारी के मामले में दिखता है। मूल रूप से हिंडौन सिटी के रहने वाले सारांश ने अपने गृह क्षेत्र के राजकीय महाविद्यालय का विकल्प केवल इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि करौली कॉलेज में एनसीसी की सुविधा उपलब्ध थी। सारांश ने अपनी व्यथा बताते हुए स्पष्ट किया कि चयन के तमाम कठिन चरण पास करके औपचारिक सूची में अपना नाम दर्ज कराने के बाद अब उन्हें बाहर कर दिया गया है। छात्र न्याय की गुहार लगाने के लिए विभिन्न दफ्तरों के फेरे काटते रहे, पर जब किसी भी जिम्मेदार पद से कोई समाधान नहीं मिला, तब विवश होकर उन्हें आंदोलन की राह चुननी पड़ी।
कोटा बटालियन से आया था रिक्तियां घटाने का आदेश
बढ़ते विवाद के बीच राजकीय महाविद्यालय के कार्यवाहक प्राचार्य रफीक अहमद ने पूरी पृष्ठभूमि सामने रखी। उन्होंने बताया कि संस्थान में 20 जुलाई 2026 को एनसीसी चयन अभियान का आयोजन किया गया था, जिसमें निर्धारित 80 स्थानों के लिए सफल अभ्यर्थियों की अधिकृत सूची जारी की गई थी। इसके बाद 23 अगस्त को 14वीं राज्य बटालियन, कोटा से एक आधिकारिक पत्र प्राप्त हुआ। उस पत्र में उच्च स्तर से निर्देश देते हुए स्वीकृत सीटों को 80 से घटाकर 40 करने का आदेश जारी किया गया था। कार्यवाहक प्राचार्य के अनुसार, मुख्यालय से मिले इस फरमान की पालना में ही मेरिट क्रम के आधार पर नीचे के 40 विद्यार्थियों को प्रक्रिया से अलग करना पड़ा।
सीटें बहाल कराने के लिए प्रशासनिक पत्राचार जारी
कार्यवाहक प्राचार्य रफीक अहमद ने यह भी स्वीकारा कि पूरे चयन और नामांकन की औपचारिकताएं पूर्ण हो जाने के बाद इस प्रकार कैडेट्स को हटाना अत्यंत चिंताजनक कदम है। युवाओं की निराशा और उनके गिरते मनोबल को ध्यान में रखते हुए महाविद्यालय स्तर पर प्रयास तेज कर दिए गए हैं। एनसीसी अधिकारी (एएनओ) महेंद्र मीणा ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि 14वीं राज्य बटालियन के कमान अधिकारी के साथ निरंतर लिखित पत्राचार किया जा रहा है। मामले की संवेदनशीलता से ग्रुप कमांडर और कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय को भी अवगत कराया गया है, जिससे कि 80 सीटों का पुराना ढांचा पुनः लागू किया जा सके और युवाओं का प्रशिक्षण बिना किसी बाधा के जारी रहे।



















