भारत में सिविल सेवाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के प्रावधानों का मुख्य उद्देश्य सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाना रहा है। हालांकि, हाल के वर्षों में यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि क्या उन परिवारों की संतानों को भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए जिनके माता-पिता पहले से ही उच्च सरकारी पदों पर कार्यरत हैं। यह बहस तब और तेज हो गई जब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा और क्रीमी लेयर के मानकों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। इस पूरे विवाद के केंद्र में शीर्ष सिविल सेवकों के बच्चों द्वारा उठाए गए आरक्षण लाभ के उदाहरण हैं, जिनमें टीना डाबी, पूजा खेडकर और नेहा ब्याडवाल के मामले सबसे ज्यादा चर्चा में रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और कर्नाटक का मामला
इस साल 22 मई को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आरक्षण के वितरण पर गंभीर सवाल खड़े किए। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर किसी कैंडिडेट के माता-पिता IAS अधिकारी हैं, उनका सामाजिक स्तर ऊंचा है और आय अच्छी है, तो ऐसे बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों दिया जाना चाहिए। अदालत का मानना था कि जब पहले से संपन्न लोग आरक्षण का लाभ उठा लेते हैं, तो समाज के वास्तविक जरूरतमंद और पिछड़े वर्ग उस अधिकार से वंचित रह जाते हैं।
यह मामला कर्नाटक से सामने आया था, जहां एक कैंडिडेट ने OBC श्रेणी के तहत कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड में असिस्टेंट इंजीनियर के पद के लिए आवेदन किया था। आवेदन की जांच के दौरान राज्य की जाति एवं आय सत्यापन समिति ने कैंडिडेट को OBC प्रमाणपत्र देने से साफ इनकार कर दिया। समिति का तर्क था कि कैंडिडेट के माता-पिता सरकारी सेवा में हैं और उनकी कुल पारिवारिक आय क्रीमी लेयर की निर्धारित सीमा से अधिक है। कैंडिडेट ने इस फैसले को पहले कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां से याचिका खारिज होने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
क्रीमी लेयर का संवैधानिक ढांचा और संसद का अधिकार
मौजूदा कानूनी व्यवस्था के तहत OBC श्रेणी में क्रीमी लेयर का नियम लागू है, जिसके तहत एक निश्चित आय और पद से ऊपर के लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाता है। हालांकि, SC और ST वर्ग के लिए ऐसा क्रीमी लेयर प्रावधान फिलहाल लागू नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस विसंगति पर विचार जरूर व्यक्त किया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका स्वयं इस विषय पर कानून नहीं बना सकती। अदालत ने रेखांकित किया कि आरक्षण नीति में बदलाव या नए कानून का निर्माण करना पूरी तरह से देश की संसद का क्षेत्राधिकार है।
केस 1: टीना डाबी और रिया डाबी का मामला
साल 2016 में जब टीना डाबी ने महज 22 साल की उम्र में UPSC सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 1 हासिल की, तो यह एक ऐतिहासिक क्षण था। वह अनुसूचित जाति श्रेणी से आने वाली पहली महिला थीं जिन्होंने इस परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त किया था। हालांकि, उनकी सफलता के साथ ही एक नई बहस भी शुरू हो गई। टीना डाबी की मां हिमाली डाबी भारतीय इंजीनियर सेवा (IES) में अधिकारी थीं, जबकि उनके पिता जसवंत डाबी भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) में महाप्रबंधक रह चुके थे और उन्होंने भारतीय टेलीकॉम सेवा में भी अधिकारी के रूप में कार्य किया था।
आलोचकों ने सवाल उठाया कि एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी की बेटी को आरक्षण की आवश्यकता क्यों पड़ी। यह बहस तब और आगे बढ़ी जब साल 2020 में टीना डाबी की छोटी बहन रिया डाबी ने भी UPSC परीक्षा उत्तीर्ण की और ऑल इंडिया 15वीं रैंक हासिल की। टीना और रिया दोनों ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की थी। एक ही परिवार के दो संपन्न सदस्यों द्वारा कोटा लाभ प्राप्त करने के इस उदाहरण ने SC और ST वर्ग में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग को हवा दी।
केस 2: पुणे की पूजा खेडकर का विवादित मामला
वर्ष 2024 में पुणे की पूजा खेडकर का मामला देश भर में सुर्खियों में आया, जिसे अब तक के सबसे विवादित मामलों में से एक माना जा रहा है। पूजा पर आरोप लगा कि उन्होंने प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए दो अलग-अलग आरक्षण श्रेणियों का अनुचित लाभ उठाया। पूजा के पिता दिलीप खेडकर महाराष्ट्र पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड में एक वरिष्ठ अधिकारी के पद पर कार्यरत थे।
जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पूजा ने पहले OBC नॉन-क्रीमी लेयर श्रेणी के तहत परीक्षा में शामिल होने का प्रयास किया था, लेकिन वहां उनके दस्तावेज फर्जी पाए गए। इसके पश्चात उन्होंने 47 प्रतिशत विजुअली इम्पेयर्ड (दृष्टिबाधित) श्रेणी का लाभ उठाकर UPSC परीक्षा क्लियर की। वरिष्ठ अधिकारी की पुत्री होने के बावजूद गलत कागजात और दोहरे आरक्षण के उपयोग ने पूरी चयन प्रक्रिया और क्रीमी लेयर जांच तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
केस 3: नेहा ब्याडवाल और प्रशासनिक पृष्ठभूमि
आरक्षण विवाद में तीसरा प्रमुख नाम नेहा ब्याडवाल का है, जिन्होंने वर्ष 2023 की UPSC परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 569 हासिल की थी। उस समय नेहा की उम्र 24 साल थी। नेहा के पिता प्रह्लाद ब्याडवाल एक वरिष्ठ इनकम टैक्स ऑफिसर और डिविजनल ऑफिसर के रूप में कार्यरत हैं। इसके अलावा, उनकी बड़ी बहन निशा ब्याडवाल भी भारतीय इंजीनियर सेवा (IES) में एक अधिकारी के रूप में देश की सेवा कर रही हैं।
एक ही परिवार में वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति और फिर भी आरक्षण के माध्यम से सिविल सेवाओं में चयन होने पर सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में व्यापक चर्चा हुई। आलोचकों का तर्क है कि जब किसी परिवार की एक पीढ़ी प्रशासनिक सेवाओं के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह सशक्त हो जाती है, तो अगली पीढ़ी को सामान्य श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए ताकि कोटा का वास्तविक लाभ समाज के निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंच सके।



















