अजमेर जिले के तीर्थ स्थल पुष्कर में स्थित प्राचीन सुधाबाई क्षेत्र इन दिनों पितृपक्ष के चलते आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है। अपने पूर्वजों की आत्मिक तृप्ति और परिवार के कल्याण की कामना के साथ विभिन्न क्षेत्रों से लोग यहां के प्रसिद्ध गया कुंड पहुंच रहे हैं। भारतीय सनातन परंपरा में पितरों के प्रति सम्मान प्रकट करने, तर्पण देने और पिंडदान करने की जो सदियों पुरानी रीत रही है, उसी का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करने के लिए श्रद्धालु इस पवित्र जलकुंड के तट पर जुट रहे हैं। लोगों का दृढ़ विश्वास है कि ऐसे पावन तीर्थों पर शास्त्रोक्त रीति से किए जाने वाले कर्म पितरों का आशीर्वाद दिलाते हैं और कुल में सुख, समृद्धि तथा शांति का संचार करते हैं।
पौराणिक जुड़ाव और धार्मिक महत्व
तीर्थ के पुजारी ईश्वर लाल पाराशर ने इस स्थल की महत्ता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि सुधाबाई का गया कुंड एक अत्यंत प्राचीन व पौराणिक धरोहर है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचंद्र जी ने भी अपने पिता राजा दशरथ की मोक्ष कामना के लिए पिंडदान किया था। इसी धार्मिक पृष्ठभूमि के चलते यहां आने वाले भक्तगण गया जी के समान फल की प्राप्ति का विश्वास लेकर पहुंचते हैं। गया कुंड के तट पर बैठकर पुरोहितों के सान्निध्य में श्रद्धालु वे सभी विधि-विधान पूरे करते हैं, जो गया जी जैसे प्रमुख पितृ तीर्थों पर किए जाते हैं।
स्नान, दान-पुण्य और तर्पण के अनुष्ठान
पुजारी के अनुसार, पितृपक्ष अथवा श्राद्ध पक्ष के दौरान गंगा जी, गया जी तथा पुष्कर राज जैसे विख्यात तीर्थों पर जाकर पितरों का स्मरण करने और उनके निमित्त सत्कर्म करने की व्यापक परंपरा है। इसी कड़ी में सुधाबाई तीर्थ के गया कुंड पर भी सुबह से शाम तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लोग पवित्र कुंड के जल में आस्था की डुबकी लगाते हैं, सूर्य और पितरों को जल अर्पित कर तर्पण करते हैं तथा अपनी क्षमता के अनुसार तिल, अन्न, वस्त्र व दक्षिणा का दान करते हैं। ऐसी मान्यता प्रचलित है कि इस तीर्थ में श्रद्धा भाव से स्नान और अर्चना करने पर मनुष्य को कई तरह के कायिक और मानसिक संतापों से राहत मिलती है।
चौथ और मंगलवार को मेले का आयोजन
सुधाबाई केवल श्राद्ध पक्ष तक सीमित आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि स्थानीय समाज और क्षेत्रीय भक्तों के लिए भी इसका विशेष महत्व है। शुक्ल पक्ष के दौरान पड़ने वाली चौथ और मंगलवार के दिन यहां मेले का स्वरूप देखने को मिलता है, जिसमें आसपास के गांवों और कस्बों से भारी भीड़ दर्शनार्थ उमड़ती है। वर्तमान पितृपक्ष के चलते यहां दैनिक आधार पर पिंडदान की गतिविधियां संचालित हो रही हैं। पंडित ईश्वर लाल पाराशर ने जनसामान्य और श्रद्धालुओं से आग्रह किया है कि वे इस पावन तीर्थ पर आकर दर्शन करें और अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जताते हुए अपनी सामर्थ्य के मुताबिक दान, तर्पण व पिंडदान के कार्य संपन्न करें।





















