राजस्थान की राजधानी जयपुर में चुनावी निष्पक्षता और मतदाता सूचियों को लेकर सियासी टकराव तेज हो गया है। सोमवार को विपक्षी दल के प्रमुख पदाधिकारियों और भारी तादाद में जुटे कार्यकर्ताओं ने चुनाव संचालन तंत्र के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। आंदोलनकारियों का मुख्य आरोप था कि राज्य में मतदाता सूचियों की तैयारी, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की कवायद और स्थानीय निकायों के चुनावों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं की गई हैं। जब प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर मुख्य निर्वाचन कार्यालय की तरफ कूच करने लगे, तब सुरक्षाबलों ने कड़े अवरोधक खड़े कर दिए। आगे बढ़ने की जद्दोजहद में धक्का-मुक्की शुरू हुई, जिसके तुरंत बाद भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाकर्मियों ने पानी की भारी बौछारें छोड़ दीं। इस हंगामे के बाद कई प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया गया।
शहीद स्मारक से शुरू हुआ शक्ति प्रदर्शन
सड़क पर उतरने से पहले पार्टी ने शहीद स्मारक पर एक विशाल जनसभा का आयोजन किया। इस मंच पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली समेत रामकेश मीणा और अमीन कागजी जैसे तमाम वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। नेताओं ने चुनावी तंत्र की पारदर्शिता और आम नागरिकों के लोकतांत्रिक हकों का मसला जोरदार ढंग से उठाया। पार्टी का कहना था कि यह आंदोलन निष्पक्ष चुनाव प्रणाली की बहाली और कथित हेरफेर के विरोध में किया जा रहा है। पूर्व घोषित योजना के तहत सभी नेता सभा समाप्त होने पर चुनाव आयोग के दफ्तर की ओर पैदल बढ़ने की तैयारी में थे।
मंच से संबोधित करते हुए अशोक गहलोत ने परिसीमन और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने चुनाव संचालन को लेकर गहरी चिंता जाहिर की और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज के तौर-तरीकों पर भी टिप्पणी की। बाद में सोशल मीडिया मंच पर साझा किए गए अपने बयान में उन्होंने बताया कि उन्होंने आयोग कार्यालय तक निकाले गए पैदल मार्च में भाग लिया और गिरफ्तारी दी। उनका कहना था कि हिरासत में रहने के दौरान भी उनके साथी लोकतांत्रिक व्यवस्था की हिफाजत के लिए आवाज उठाते रहे।
आंदोलन को ग्रामीण स्तर तक ले जाने की चेतावनी
सभा और प्रदर्शन के दौरान पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट किया कि यह विरोध केवल एक दिन या एक शहर का मामला नहीं है। प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा ने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि पार्टी कार्यकर्ता किसी भी दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं। उन्होंने एलान किया कि राजधानी से छिड़ी यह मुहिम अब रुकने वाली नहीं है और इसे प्रदेश के हर गांव और दूर-दराज की ढाणियों तक पहुंचाया जाएगा। उनका जोर इस बात पर था कि चुनावी शुचिता का मुद्दा सीधे तौर पर ग्रामीण मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ा है।
प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने भी इसी सुर में बात करते हुए कहा कि आने वाले समय में जिलेवार आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी। उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत किए जा रहे बदलावों की शुचिता पर सवाल उठाया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि जिला स्तर पर ऐसे कार्यक्रम आयोजित करके वे आम जनता के बीच इस मुद्दे को एक बड़ी बहस बना सकते हैं। हालांकि आयोग और शासन से जुड़े हलकों का रुख इन आरोपों से पूरी तरह अलग है।
प्रशासन पर पक्षपात के आरोप और तीखे सवाल
नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि प्रशासनिक अमले और सरकारी विभागों का इस्तेमाल चुनावी समीकरणों को बदलने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि जनता के बीच उनके दल का समर्थन आधार मजबूत रहा है और उन्हें अधिक मत हासिल हुए हैं। इसके बावजूद चुनावी मशीनरी का दुरुपयोग करके परिणामों को प्रभावित करने की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने सरकार के कामकाज, मतदाता सूची में बदलावों और संस्थागत दखल को लेकर पांच नुक्ते उठाए।
पार्टी की ओर से नगरीय निकाय चुनावों के दौरान भी सत्ता पक्ष पर बेईमानी और अनुचित लाभ लेने के आरोप लगाए गए। विपक्ष का तर्क है कि जब तक मतदाता सूची पूरी तरह त्रुटिरहित न हो और परिसीमन में पारदर्शिता न बरती जाए, तब तक लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। इसी मांग को लेकर पार्टी लगातार आयोग के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज कराती आ रही है और जवाबदेही तय करने पर जोर दे रही है।
अवरोधकों पर टकराव और वाटर कैनन की कार्रवाई
शहीद स्मारक से जब मार्च आगे बढ़ा, तो रास्ते में पुलिस ने मजबूत बैरिकेड लगाकर रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया। प्रदर्शनकारी जब इन अवरोधों को पार करने की कोशिश करने लगे, तो पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी झड़प हुई। कुछ उत्साही कार्यकर्ता सुरक्षा घेरे के ऊपर चढ़ने लगे, जिससे सड़क पर गतिरोध बन गया। विधि-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस ने वाटर कैनन चालू कर दिया, जिससे तेज धार वाला पानी भीड़ पर फेंका गया।
पानी की बौछारों के बीच अशोक गहलोत, सुखजिंदर सिंह रंधावा, गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली जैसे शीर्ष नेता भी भीग गए और वहां अफरा-तफरी फैल गई। इसके फौरन बाद पुलिस ने इन सभी प्रमुख नेताओं समेत दर्जनों समर्थकों को अपनी गाड़ियों और बसों में बैठाकर हिरासत में ले लिया। इन नेताओं को विद्याधर नगर थाने ले जाया गया, जबकि कुछ अन्य साथियों को हरमाड़ा थाने भेजा गया। थाने के भीतर भी कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी जारी रखी और कुछ समय तक धरने पर बैठे रहे। तकरीबन एक घंटे की प्रशासनिक कार्रवाई के बाद सभी वरिष्ठ नेताओं को रिहा कर दिया गया।
प्रमाण की मांग पर अड़ी सत्ता पक्ष की दलीलें
विपक्ष के इन हमलों के जवाब में सरकार की ओर से कड़ा रुख देखने को मिला। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने प्रदर्शन से ठीक एक दिन पहले सार्वजनिक रूप से कहा था कि जो लोग संवैधानिक संस्थाओं पर अंगुली उठा रहे हैं, उन्हें अपने दावों के समर्थन में पुख्ता दस्तावेज पेश करने चाहिए। मुख्यमंत्री का स्पष्ट मानना था कि बिना ठोस प्रमाण के निर्वाचन संस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करने से जनता के बीच इन संस्थाओं की साख को ठेस पहुंचती है।
सत्ता पक्ष का कहना है कि चुनावी प्रक्रियाओं पर निराधार शंकाएं पैदा करना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं है। उधर, विपक्षी दल इसे जनाधिकारों की लड़ाई करार दे रहा है और पीछे हटने को तैयार नहीं है। इस तरह जयपुर की सड़कों पर शुरू हुआ यह विवाद अब केवल चुनावी तकनीकी खामियों तक सीमित न रहकर एक बड़े राजनीतिक टकराव में तब्दील होता दिख रहा है, जिसमें एक तरफ संस्थाओं की शुचिता का सवाल है तो दूसरी तरफ प्रमाण प्रस्तुत करने की चुनौती।



















