राजस्थान का भरतपुर जिला अपनी अनूठी ग्रामीण संस्कृति और प्राकृतिक धरोहर के लिए पहचाना जाता है। इस जिले के डांग इलाके में बरसात के महीने शुरू होते ही प्राकृतिक वनस्पतियों का तेजी से विकास होता है, जिनमें से एक खास चारा स्थानीय स्तर पर लूम के नाम से पुकारा जाता है। यह वनस्पति पूरी तरह प्राकृतिक रूप से पनपती है और इसके पत्ते काफी कोमल और हरे होते हैं, जो मवेशियों के स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत लाभकारी साबित होते हैं।
प्रकृति की देन है यह हरा चारा
डांग क्षेत्र में जैसे ही मानसून की बारिश होती है, ग्रामीण इलाकों की जमीन पर यह पौष्टिक चारा अपने आप उगने लगता है। किसानों को इसके उत्पादन के लिए किसी भी तरह की बुवाई या अतिरिक्त मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ती है। मौसम की पहली फुहारों के साथ ही खेतों और खुले इलाकों में यह बहुमूल्य चारा तैयार हो जाता है, जिसे ग्रामीण आसानी से काटकर अपने घरों तक ले आते हैं।
पशु आहार में कैसे होता है इस्तेमाल
स्थानीय किसानों और पशुपालकों के अनुसार लूम को मवेशियों को खिलाने के कई तरीके अपनाए जाते हैं। इसे सीधे तौर पर ताजा ही खिलाया जा सकता है या फिर अन्य सूखे चारे और पारंपरिक पशु आहार के साथ मिलाकर संतुलित खुराक के रूप में दिया जाता है। इस प्राकृतिक चारे की कटाई और ढुलाई का काम भी काफी सरल होता है, जिसके चलते ग्रामीण परिवारों को बरसात के दिनों में चारे की किल्लत का सामना नहीं करना पड़ता।
दूध की पैदावार पर सकारात्मक असर
पशुओं के दैनिक आहार में लूम को शामिल करने से उनके शरीर को जरूरी पोषक तत्व आसानी से मिल जाते हैं। इससे मवेशियों की शारीरिक सेहत दुरुस्त रहती है और विशेष तौर पर दूध देने वाले पशुओं की उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार देखा जाता है। हालांकि दुग्ध उत्पादन की मात्रा पूरी तरह से पशु की नस्ल, उसकी आयु, स्वास्थ्य स्थिति और समग्र देखभाल पर भी निर्भर करती है, लेकिन इस प्राकृतिक चारे की उपलब्धता से पशुपालकों को बड़ी राहत मिलती है।



















