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पश्चिमी राजस्थान के किसानों के लिए राहत, कम बारिश और सूखे में भी होगी बंपर पैदावारराजस्थान
1 सित॰ 2026, 12:06 pm (1 घंटे पहले)· 2

पश्चिमी राजस्थान के किसानों के लिए राहत, कम बारिश और सूखे में भी होगी बंपर पैदावार

कम बारिश और जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे पश्चिमी राजस्थान के किसानों के लिए कृषि विश्वविद्यालय ने नई और कम पानी में पकने वाली फसल किस्में तैयार की हैं।

पश्चिमी राजस्थान में मौसम के लगातार बदलते मिजाज और अनियमित वर्षा के कारण अन्नदाताओं के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है। मानसून का सीजन बीतने के बावजूद तमाम इलाकों में पर्याप्त पानी न मिलने से खेती का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस स्थिति में किसानों की निगाहें लगातार बादलों और आसमान पर टिकी रहती हैं। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में सूखे जैसे हालात कृषि व्यवस्था के लिए बड़ी बाधा बन चुके हैं। इन्हीं तमाम मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए कृषि विश्वविद्यालय की कुलगुरु डॉ. वी.एस. जैतावत ने जानकारी दी है कि मौसम के हिसाब से खेती को ढालने और किसानों को उन्नत विकल्प देने की दिशा में तेजी से प्रयास जारी हैं।

सूखे को मात देने वाली किस्मों पर जोर

कृषि अनुसंधान के मोर्चे पर काम कर रहे विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मुख्य रूप से ऐसी फसलों की पैदावार बढ़ाने में जुटे हैं जो सूखे की मार आसानी से झेल सकें। उन बीजों और पौधों को प्राथमिकता दी जा रही है जो कम दिनों में पककर तैयार हो जाएं और जिनकी सिंचाई के लिए बहुत ज्यादा पानी की जरूरत न पड़े। संस्थान ने इलाके की विभिन्न पारंपरिक फसलों पर गहन रिसर्च के बाद कई ऐसे उपयोगी विकल्प तैयार किए हैं जो पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्र के शुष्क मौसम और कम वर्षा वाले इलाकों में बेहद मददगार साबित हो सकते हैं।

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देर से बारिश होने पर भी नहीं होगी परेशानी

विशेषज्ञों के अनुसार यदि सितंबर महीने के आखिरी दिनों में भी झमाझम बारिश हो जाती है, तब भी बुवाई के लिए किसानों के पास पर्याप्त विकल्प बचे रहेंगे। विश्वविद्यालय के पास तिल, मूंग, ग्वार और बाजरा की ऐसी उन्नत वैराइटी मौजूद हैं जो बेहद कम समय में फसल तैयार कर देती हैं। इन सभी किस्मों को इस तरह से तैयार किया गया है कि इन्हें उगने और पकने के लिए न्यूनतम पानी की आवश्यकता पड़े, जिससे सूखे की स्थिति में भी पैदावार सुरक्षित रह सके।

खेती किसानी को मिलेगी एक नई दिशा

इस इलाके की भौगोलिक बनावट और तेजी से बदलते वेदर पैटर्न को मद्देनजर रखते हुए कृषि अनुसंधान को लगातार नई दिशा दी जा रही है। आने वाले दिनों में पानी की कम खपत वाली, जल्दी तैयार होने वाली और सूखे को सहन करने की क्षमता रखने वाली फसलें यहां के कृषियों के लिए वरदान साबित होंगी। विश्वविद्यालय की यह कोशिश है कि प्रयोगशालाओं में होने वाले वैज्ञानिक प्रयोग सीधे किसानों के खेतों तक पहुंच सकें ताकि वे मौसम की अनिश्चितता से बचकर अपनी आय सुरक्षित रख सकें।

सवाल-जवाब

पश्चिमी राजस्थान में खेती के सामने मुख्य चुनौती क्या है?
लगातार बदलते मौसम, अनियमित बारिश और सूखे जैसी परिस्थितियों के कारण बुवाई का कार्य प्रभावित हो रहा है।
कृषि विश्वविद्यालय की ओर से क्या समाधान निकाला जा रहा है?
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक सूखे को सहन करने वाली और कम पानी में पकने वाली फसल किस्मों को विकसित कर रहे हैं।
सितंबर के अंत तक बारिश होने पर किसान कौन सी फसलें बो सकते हैं?
किसान सितंबर के अंतिम दिनों में भी तिल, मूंग, ग्वार और बाजरा की कम अवधि वाली किस्में बो सकते हैं।
इन नई फसल किस्मों की क्या विशेषता है?
इन फसलों को कम पानी की आवश्यकता होती है और ये बहुत कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं।
इस शोध के बारे में जानकारी किसने दी है?
कृषि विश्वविद्यालय की कुलगुरु डॉ. वी.एस. जैतावत ने इस संबंध में जानकारी साझा की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·35 मिनट पहले

अपराध और कानून-व्यवस्था के दायरे से बाहर यह खबर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोक सुरक्षा से सीधे जुड़ी है। पश्चिमी राजस्थान में जल संकट और सूखे के कारण कृषि संकट अक्सर सामाजिक तनाव, पलायन और भूमि विवादों जैसी आपराधिक समस्याओं को जन्म देता है। कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित कम पानी वाली फसलें और उन्नत बीज न केवल किसानों की आय सुरक्षित करेंगे, बल्कि सूखा जनित अपराधों और ग्रामीण असंतोष पर भी प्रभावी अंकुश लगाने में मददगार साबित होंगे।

Rohan Verma@rohan-verma·34 मिनट पहले

अपराध और भू-असंतुलन की दृष्टि से देखें तो राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे कृषि-प्रधान राज्यों में जल संकट और फसल बर्बादी अक्सर गंभीर ग्रामीण विवादों और पलायन का कारण बनती है। कृषि विश्वविद्यालय के ये वैज्ञानिक विकल्प केवल आर्थिक राहत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह नवाचार किसानों के बीच उपजे उस तनाव को शांत करने में भी अहम भूमिका निभाएगा जो सूखे और आर्थिक तंगी के चलते उपद्रव या गंभीर अपराधों का रूप ले लेता है। समय पर प्रयोगशाला से खेतों तक इन उन्नत बीजों की पहुँच सुनिश्चित करना शासन और प्रशासनिक मशीनरी के लिए भी एक बड़ी राहत साबित होगा।

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