भीलवाड़ा के मेवाड़ क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध कोटड़ी चारभुजा नाथ यानी कोटड़ी श्याम मंदिर परिसर में धनतेरस के पावन अवसर पर अटूट आस्था और भक्ति का विहंगम दृश्य देखने को मिला। यहां पूरे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ एक विशाल सवा 11 फीट चौड़े महादीपक को प्रज्वलित किया गया। इस अनूठे दीपोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस भव्य दीपक को रोशन करने के लिए किसी एक व्यक्ति या संस्था द्वारा नहीं, बल्कि पूरे गांव के लोगों द्वारा अपने-अपने घरों से श्रद्धाभाव के साथ घी जुटाया जाता है, जिसे सभी ग्रामीण मिलकर मंदिर तक पहुंचाते हैं।
इस विशाल महादीपक का निर्माण और कारीगरी
भगवानपुरा के जाने-माने मूर्तिकार गोपाल गाडरी द्वारा इस सवा 11 फीट के महादीपक को तैयार किया गया है। इस भव्य ढांचे को खड़ा करने में लगभग 2100 मिट्टी की ईंटों, एक ट्रॉली पीली मिट्टी और शुद्ध गाय के गोबर का उपयोग किया गया है। गांव की महिलाओं ने इस पूरी संरचना पर मिट्टी और गोबर का लेप लगाकर इसे अंतिम रूप दिया और इस पर बेहद मनमोहक चित्रकारी भी की। मुख्य महादीपक के अलावा 21 और 11 इंच के चार अन्य छोटे दीपक भी विशेष रूप से तैयार किए गए हैं। इन सभी दीपकों में रुई की विशाल बत्तियां लगाई गईं और साधु-संतों की गरिमामयी उपस्थिति में महाज्योत को प्रज्वलित किया गया।
साल 2018 में शुरू हुई परंपरा और अयोध्या से जुड़ाव
कोटड़ी में भव्य दीप प्रज्वलन की इस अनूठी परंपरा की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई थी, जब महज 5 फीट के दीपक के साथ इस आयोजन की नींव रखी गई थी। उत्तर प्रदेश के अयोध्या की प्रसिद्ध दीप प्रज्वलन परंपरा से प्रेरणा लेकर इस आयोजन की शुरुआत की गई थी, जो आज कोटड़ी की प्रमुख धार्मिक पहचान बन चुका है। वक्त के साथ इस आयोजन का दायरा और आकार दोनों लगातार बढ़ते गए और अब यह बढ़कर सवा 11 फीट चौड़े विशाल महादीपक के रूप में पूरे क्षेत्र में अपनी एक अलग ही पहचान बना चुका है।
सामूहिक सहभागिता और अखंड ज्योत का महत्व
यह धार्मिक अनुष्ठान किसी एक व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र का नहीं, बल्कि संपूर्ण गांव की सामूहिक सहभागिता और जन-सहयोग का एक जीवंत प्रतीक है। कोटड़ी के साथ-साथ आसपास के दर्जनों गांवों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर पहुंचते हैं और अपने जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करते हुए इस विशाल दीपक में घी और तेल अर्पित करते हैं। संत-महात्माओं के सानिध्य में जलाई गई यह अखंड ज्योत लगातार प्रज्वलित होते हुए छोटी दिवाली यानी रूप चौदस तक जगमगाती रहती है, जिससे संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
















