राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित हाथल गांव अपनी अनूठी धार्मिक पहचान और ऐतिहासिक भव्यता के लिए जाना जाता है। रेवदर कस्बे से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर और अनादरा के समीप माउंट आबू की पहाड़ियों की तलहटी में स्थापित यह ब्रह्मा मंदिर वास्तुकला का एक दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत करता है। समूचे देश में पुष्कर के बाद भगवान ब्रह्मा जी के बेहद सीमित मंदिर हैं, जिनमें इस पवित्र स्थल को प्रमुख स्थान प्राप्त है। मंदिर का मुख्य शिखर कमल के फूल के आकार में निर्मित है, जो श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों को भी सहज रूप से आकर्षित करता है।
चौदह सौ वर्ष पुराना गौरवशाली अतीत और ऐतिहासिक साक्ष्य
इस पवित्र स्थल का इतिहास लगभग 1400 साल पुराना है। मंदिर परिसर में संरक्षित एक प्राचीन शिलालेख के अनुसार, इसके मूल स्वरूप की प्राण-प्रतिष्ठा विक्रम संवत 798, यानी करीब 741 ईस्वी में की गई थी। ऐतिहासिक अभिलेखों में इस बात का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि वर्ष 1231 में यहां कई धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए थे और मंदिर परिसर का विस्तार कराया गया था। मध्यकालीन दौर में विदेशी आक्रांताओं के हमलों की मार इस धार्मिक स्थल को भी झेलनी पड़ी, जिससे मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा था। बाद के कालखंड में मंदिर के ऐतिहासिक अवशेषों का गहन अध्ययन करने के लिए जर्मन पुरातत्वविदों समेत दुनिया भर के शोधकर्ताओं ने हाथल गांव का दौरा किया था। सदियों तक समुचित देखरेख न हो पाने के कारण यह प्राचीन ढांचा धीरे-धीरे खंडित अवस्था में पहुंच गया था।
ग्रामीणों का संकल्प और पंद्रह वर्षों का जीर्णोद्धार अभियान
धरोहर के अस्तित्व को बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर एक अनुकरणीय प्रयास शुरू हुआ। स्थानीय भक्त पूरण सिंह के अनुसार, हाथल गांव और आसपास के ग्रामीण अंचलों के युवाओं ने इस प्राचीन विरासत को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया। इसके तहत श्री ब्रह्माजी मंदिर जीर्णोद्धार समिति की स्थापना की गई। जनसहयोग और जनभागीदारी की ताकत से 27 नवंबर 1995 को मंदिर के पुनर्निर्माण की आधारशिला रखी गई। ग्रामीणों, कारीगरों और समिति के निरंतर 15 वर्षों के कड़े परिश्रम के उपरांत 20 मई 2010 को इस मंदिर का नया भव्य स्वरूप पूरी तरह तैयार हुआ और इसे विधिवत दर्शनार्थियों के लिए खोल दिया गया।
कमल जैसी 51 फीट ऊंची संरचना और पंचदेव की स्थापना
वर्तमान मंदिर की सबसे आकर्षक विशेषता इसकी 51 फीट ऊंची कमल के फूल जैसी बनावट है। इस समूची संरचना का निर्माण पारंपरिक वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप किया गया है। मुख्य गर्भगृह में जगतपिता ब्रह्मा जी की भव्य प्रतिमा विराजमान है, जबकि परिसर के छोटे उप-मंदिरों में भगवान विष्णु, भगवान शिव, माता गायत्री और सूर्य देव की पावन मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। इस व्यवस्था के कारण यहां आने वाले भक्तजन एक ही प्रांगण में त्रिदेव और पंचदेव की आराधना कर सकते हैं। मंदिर प्रांगण में हरियाली से परिपूर्ण एक आकर्षक बगीचा विकसित किया गया है। इसके अलावा, बाहर से आने वाले तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए सर्वसुविधायुक्त धर्मशाला का प्रबंध भी मौजूद है। मंदिर में दैनिक पूजा-अर्चना और नियमित हवन के साथ-साथ ध्यान शिविर और विभिन्न जनकल्याणकारी सामाजिक गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं।



















