बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक माने जाने वाले विजय दशमी के पर्व पर राजस्थान के भीलवाड़ा से सांप्रदायिक सौहार्द की एक बेहद प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। यहां का दशहरा महोत्सव केवल धार्मिक उल्लास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की साझा संस्कृति और गंगा-जमुनी तहजीब का एक जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। शहर में पिछले चार दशकों से अधिक समय से दो अलग-अलग समुदायों के परिवार मिलकर रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के पुतले तैयार करने में जुटे हुए हैं। इन परिवारों का यह जुड़ाव महज व्यावसायिक साझेदारी नहीं है, बल्कि आपसी विश्वास और अटूट स्नेह का एक ऐसा प्रतीक है जो समय के साथ और अधिक मजबूत होता गया है।
चार दशकों से अधिक पुरानी अटूट साझेदारी
इस अनूठी परंपरा के बारे में विस्तार से बताते हुए राजेश कुमार गांछा कहते हैं कि उनके पिता ग्यारसीलाल जी गांछा और उनके अजीज मित्र सुलेमान जी शोरगर ने संयुक्त रूप से इन पुतलों का निर्माण कार्य शुरू किया था। वे दोनों केवल व्यावसायिक रूप से जुड़े नहीं थे, बल्कि उनके बीच गहरी मित्रता थी जो जीवनभर कायम रही। हालांकि अब वे दोनों इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा शुरू की गई भाईचारे की इस विरासत को उनकी संतानें पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ा रही हैं। वर्तमान में राजेश कुमार गांछा और सुलेमान जी के सुपुत्र समद भाई शोरगर मिलकर इस काम को संभाल रहे हैं और दोनों परिवारों का यह सहयोग पिछले करीब 50 वर्षों से लगातार जारी है।
चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है आपसी सहयोग की यह विरासत
समय बीतने के साथ ही इस साझा परंपरा की जड़ें और गहरी होती चली गई हैं और अब यह सिलसिला आगे बढ़कर चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुका है। पुतला निर्माण कार्य से जुड़े लोगों का कहना है कि उन्हें इस काम के दौरान कभी किसी प्रकार की बाधा या मतभेद का सामना नहीं करना पड़ा। दोनों ही परिवार हर साल आपसी समन्वय और सौहार्द के साथ मिलकर काम करते हैं, जिससे समाज में प्रेम और सहयोग का एक सकारात्मक संदेश जाता है। खास बात यह है कि इस पुश्तैनी काम में अब घर की नई पीढ़ी के युवा भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं और अपने बुजुर्गों की इस विरासत को सहेजने में पूरा योगदान दे रहे हैं।
शहर के विभिन्न चौराहों और इलाकों में भेजे जाते हैं विशाल पुतले
भीलवाड़ा शहर के प्रमुख तेजाजी चौक पर हर साल विशेष आकर्षण का केंद्र रहने वाला 51 फीट ऊंचा रावण का पुतला तैयार किया जाता है, जिसके साथ ही 35-35 फीट ऊंचे कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले भी बनाए जाते हैं जिनका दशहरे के दिन दहन किया जाता है। इसके अलावा भीलवाड़ा शहर के मजदूर कॉलोनी, लेबर कॉलोनी, सांगानेर, सालेरा और पुर जैसे तमाम अन्य इलाकों से भी पुतलों की भारी मांग रहती है, जिन्हें समय पर तैयार करके वहां भेजा जाता है। इन सभी चिन्हित स्थानों पर दो-दो पुतलों के सेट के साथ-साथ पारंपरिक रूप से अन्य जानवरों के पुतले भी बनाकर भेजे जाते हैं, जिन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय लोग जुटते हैं।






















