राजस्थान के बीकानेर राज्य के इतिहास में शासक राव लूणकरण का नाम एक अत्यंत पराक्रमी योद्धा, संवेदनशील प्रशासक और दानवीर के रूप में दर्ज है। अपने अद्वितीय दान धर्म और प्रजा कल्याण की भावना के कारण उन्हें इतिहास में 'कलयुग का कर्ण' की उपाधि दी गई। राव बीका के निधन के पश्चात उनके दूसरे पुत्र राव लूणकरण ने बीकानेर की सत्ता संभाली थी। उन्होंने अपने शासनकाल के दौरान न केवल राज्य की सीमाओं की सुरक्षा को मजबूत बनाया, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जल प्रबंधन और धार्मिक स्थलों के संवर्धन में भी अभूतपूर्व योगदान दिया।
प्रकृति संवर्धन और जल प्रबंधन के ऐतिहासिक प्रयास
राव लूणकरण प्रकृति प्रेमी शासक थे। उन्होंने जाल के वृक्ष को बीकानेर राज्य के राज्य वृक्ष के रूप में मान्यता दी और संपूर्ण राज्य में वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया। उनके निर्देशों पर गांवों, सार्वजनिक स्थानों और मंदिरों के आसपास बड़े पैमाने पर पेड़ लगवाए गए, जिससे क्षेत्र में हरियाली का विस्तार हुआ। इसके साथ ही, बीकानेर क्षेत्र में मीठे पानी की भारी किल्लत को ध्यान में रखते हुए उन्होंने दूरदर्शिता का परिचय दिया। जल संकट को स्थायी रूप से हल करने के उद्देश्य से उन्होंने अपने नाम पर लूणकरणसर कस्बे की स्थापना की और वहां एक प्रसिद्ध झील का निर्माण कराया, जो आज भी उनके उत्कृष्ट जल प्रबंधन का उदाहरण है।
असीम दानशीलता और कला-साहित्य का संरक्षण
दान देने के मामले में राव लूणकरण का कोई मुकाबला नहीं था। इतिहासकार जानकीदत्त श्रीमाली के विवरण के अनुसार, जैसलमेर पर विजय प्राप्त करने के बाद राव लूणकरण ने अपने चारण कवि को एक लाख 'पसाव' का दान देकर पुरस्कृत किया था। उनकी इस उदारता का प्रभाव उनके परिवार पर भी स्पष्ट दिखा, जहां उनके पुत्र कर्मसी ने सिरोही के आशा चारण को एक करोड़ का दान दिया। राज्य का राजकोष हमेशा जरूरतमंदों और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए खुला रहता था। चित्तौड़ के महाराणा रायमल की पुत्री तथा महाराणा सांगा की बहन आनंदकुमारी के साथ विवाह के अवसर पर भी राव लूणकरण ने बहुमूल्य उपहारों की बौछार कर अपनी उदारता साबित की थी। उनके इसी स्वर्णिम शासन से प्रभावित होकर तत्कालीन राज्य कवि ने बीकानेर की तुलना समृद्ध और शांत कश्मीर से की थी।
सैन्य कौशल, सीमा सुरक्षा और ढोसी युद्ध में बलिदान
राव लूणकरण केवल एक उदार राजा ही नहीं थे, बल्कि एक कुशल सैन्य रणनीतिकार भी थे। संस्थापक राव बीका के निधन के बाद जब पड़ोसी शक्तियों ने बीकानेर राज्य में हस्तक्षेप करने और अशांति फैलाने की कोशिश की, तब राव लूणकरण ने कठोर सैन्य कदम उठाकर उपद्रवियों का दमन किया। फतेहपुर के शासक घराने के अंदरूनी विवादों के कारण उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को भी उन्होंने अपनी सैन्य क्षमता से निष्प्रभावी कर दिया। अपने राज्य की रक्षा करते हुए वर्ष 1526 में नारनौल क्षेत्र के ढोसी युद्ध में वे वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी दानशीलता, पराक्रम और जनकल्याणकारी नीतियां आज भी इतिहास में अमर हैं।





















