उत्तर प्रदेश के कृषि क्षेत्रों में धान की फसल को बौनेपन की बीमारी से बचाने के लिए किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। शाहजहांपुर सहित राज्य के कई जनपदों में धान के पौधे अपनी स्वाभाविक लंबाई तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। खेतों में जगह-जगह पौधे छोटे, गहरे हरे और झाड़ीनुमा नजर आ रहे हैं। यदि समय पर इस स्थिति पर ध्यान न दिया जाए, तो बालियों का विकास रुक जाता है और किसानों की कुल उपज में भारी गिरावट आ सकती है। कृषि विशेषज्ञों और अनुभवी किसानों के अनुसार, सही समय पर कीटनाशकों का छिड़काव और पोषक तत्वों की पूर्ति करके फसल को पूरी तरह नष्ट होने से बचाया जा सकता है।
लक्षण और खेत में पहचान के तरीके
प्रभावित खेतों में बौने पौधों को दूर से ही पहचाना जा सकता है। सामान्य पौधों की तुलना में ये पौधे आकार में काफी छोटे रह जाते हैं और इनका विकास एक जगह थम जाता है। इनकी पत्तियां सामान्य से अधिक मोटी, गहरे हरे रंग की और कुछ स्थानों पर मुड़ी हुई दिखाई देती हैं। पौधों का तना सख्त हो जाता है और जड़ों की वृद्धि लगभग बंद हो जाती है, जिससे मिट्टी से नए कल्ले नहीं निकलते। सबसे गंभीर बात यह है कि इन पौधों में या तो बालियां बनती ही नहीं हैं, और यदि बालियां निकलती भी हैं तो वे पूरी तरह दाने रहित और खाली रह जाती हैं।
बौनेपन के पीछे मुख्य कारण और वायरस का फैलाव
धान में पौधों का कद छोटा रहने का सबसे प्रमुख जैविक कारण साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस और मिट्टी में जिंक की कमी है। यह विषाणु स्वतंत्र रूप से नहीं फैलता, बल्कि इसे रसचूसक कीट एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचाते हैं। वाइट बैक्ड प्लांट हॉपर तथा भूरा फुदका जैसे कीट जब किसी संक्रमित पौधे का रस चूसने के बाद स्वस्थ पौधे पर बैठते हैं, तो वायरस स्वस्थ पौधे में भी प्रवेश कर जाता है। इसके अलावा, खेत में लगातार पानी भरा रहना, जड़ों का सही ढंग से विकसित न होना और यूरिया की अत्यधिक मात्रा का असंतुलित उपयोग भी पौधों के तने को सख्त बनाकर उनकी वृद्धि रोक देता है।
त्वरित नियंत्रण के रासायनिक और पोषण संबंधी उपाय
खेत में बौनेपन के लक्षण दिखते ही किसानों को घबराकर अंधाधुंध यूरिया डालने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे समस्या और अधिक बढ़ सकती है। इसके स्थान पर सबसे पहले रसचूसक फुदका कीटों के खात्मे के उपाय करने चाहिए। प्रगतिशील किसान रनजोद सिंह के अनुसार, कीट नियंत्रण के लिए ट्राइफ्लुमेज़ोपाइरिम, पाइमेट्रोज़िन या इमिडाक्लोप्रिड जैसी अनुशंसित दवाओं का निर्धारित मात्रा में छिड़काव करना चाहिए। यदि पौधों में पोषक तत्वों की कमी के कारण यह समस्या आ रही है, तो प्रति एकड़ 0.5% जिंक सल्फेट और 1% यूरिया का घोल तैयार करके पत्तियों पर छिड़काव करें। साथ ही, खेत में लगातार पानी जमा न रहने दें और बारी-बारी से पानी सुखाकर ही दोबारा सिंचाई करें।
दीर्घकालिक सुरक्षा और भविष्य का फसल प्रबंधन
धान की फसल को इस प्रकार की बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए बुआई के शुरुआती चरण से ही प्रबंधन आवश्यक है। किसानों को हमेशा प्रमाणित और रोग-प्रतिरोधी बीजों का चयन करना चाहिए। रोपाई से पूर्व बीजोपचार करना बेहद जरूरी है ताकि शुरुआती दिनों में ही कीटों और वायरस के हमले को रोका जा सके। खेत की मेड़ों पर उगने वाले खरपतवारों की नियमित सफाई करें, क्योंकि यह वायरस अक्सर खरपतवारों पर आश्रय लेता है। इसके अलावा, नाइट्रोजन उर्वरकों का अनियंत्रित उपयोग रोकने के लिए पोटाश और जैविक खाद का संतुलित प्रयोग करें, जिससे पौधों की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे।



















