दीपावली का पावन पर्व जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे बूंदी जिले का सुप्रसिद्ध पॉटरी विलेज ठिकरदा दीपोत्सव की तैयारियों में पूरी तरह से व्यस्त हो गया है। पूरे शहर में जहाँ आधुनिक सजावट और बाजारों में रंग-बिरंगी चाइनीज लाइटों की चमक दिखाई दे रही है, वहीं इस चकाचौंध से दूर ठिकरदा गाँव में मिट्टी को सहेजकर एक नया आकार दिया जा रहा है। यहाँ तैयार होने वाले मिट्टी के दीये न सिर्फ हमारी सदियों पुरानी संस्कृति को बचाए हुए हैं, बल्कि स्थानीय कुम्हार परिवारों के संघर्ष और बेहतर मुनाफे की उम्मीद का भी बड़ा जरिया बने हुए हैं।
दिन-रात चाक पर मेहनत करते हैं परिवार
ठिकरदा पॉटरी विलेज में लगभग 25 से 30 परिवार रहते हैं जो इस त्योहारी सीजन में भारी उम्मीदों के साथ लगातार पसीना बहा रहे हैं। सुबह सूरज निकलने से पहले ही जागने के बाद से लेकर देर रात तक पूरा परिवार मिट्टी के कामों में जुटा रहता है। घर के पुरुष चाक की मदद से मिट्टी के दीये और मटके तैयार करने का काम संभालते हैं, जबकि घर की बुजुर्ग महिलाएँ और अन्य सदस्य इन बर्तनों को सुंदर बनाने के लिए पारंपरिक नक्काशी और मांडणा उकेरने का काम करती हैं। हीरालाल प्रजापत जो कि एक बुजुर्ग कारीगर हैं, बताते हैं कि उनके परिवार की कई पीढ़ियाँ इसी चाक के सहारे गुजर चुकी हैं और वे बारिश का मौसम खत्म होते ही पूरे साल के इंतजार के बाद इस काम में जुट जाते हैं।
करवा चौथ से लेकर दीपोत्सव तक रहती है भारी माँग
कारीगरों के मुताबिक इस सीजन के दौरान बाजार में मिट्टी से बनी वस्तुओं और दीयों की बंपर माँग देखने को मिलती है। इस व्यस्त समय में चाक पर पारंपरिक दीये, मटकियाँ, पूजा के लिए कलश, करवा चौथ के विशेष करवे और कई तरह के सजावटी गुलदस्ते बनाए जाते हैं। हनुमान प्रजापत और भगवान प्रजापत जैसे स्थानीय कारीगरों का कहना है कि काम का दबाव इतना ज्यादा होता है कि सभी सदस्यों को बिना रुके कई घंटों तक लगातार मेहनत करनी पड़ती है। इसके अलावा, सुगना बाई बताती हैं कि महिलाएँ बर्तनों को धूप में सुखाने से लेकर उन पर रंग-रोगन करने और सुंदर मांडणा सजाने की जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाती हैं।
लोकल फॉर वोकल अभियान को मिल रहा बढ़ावा
प्राचीन समय से हर आँगन और घर को रोशन करने वाले ये मिट्टी के दीपक आज के समय में लोकल फॉर वोकल अभियान को भी जमीनी स्तर पर मजबूती दे रहे हैं। कुम्हार समाज अपनी कड़ी मेहनत के जरिए इस पुरानी सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर आगे बढ़ा रहा है। इस दीपोत्सव जब लोग अपने घरों को महँगी और आधुनिक लाइटों से सजाएँ, तो उन्हें अपने घर के किसी एक कोने में कुम्हारों के हाथों से बने मिट्टी के दीयों को जरूर रखना चाहिए। इस एक छोटे से दीये की लौ में केवल बाती नहीं जलती, बल्कि एक मेहनतकश परिवार की पूरे साल की उम्मीदें और खुशियाँ जुड़ी होती हैं।
























