राजस्थान के करौली जिले में स्थित प्रसिद्ध कैलादेवी मंदिर से कई दिलचस्प और अनसुने किस्से जुड़े हुए हैं। एक समय ऐसा था जब चंबल के बीहड़ों में कुख्यात डकैतों का खौफ दूर-दूर तक फैला हुआ था और उनके नाम मात्र से ही लोगों की रूह कांप जाती थी। लेकिन इन खूंखार अपराधियों के जीवन का एक ऐसा पहलू भी था, जिसके बारे में आज भी स्थानीय बुजुर्गों और पुजारियों की जुबानी कहानियां सुनने को मिलती हैं। अपनी बंदूकों और हिंसा के लिए पहचाने जाने वाले ये डकैत जब मां कैलादेवी के दरबार में पहुंचते थे, तो उनका रूप पूरी तरह बदल जाता था और वे आम श्रद्धालुओं की तरह बेहद शांत भाव से मां के सामने सिर झुकाते थे।
चंबल के बीहड़ों में अपराध की दुनिया चलाने वाले ये लोग अपनी पहचान छिपाकर मंदिर परिसर में प्रवेश करते थे ताकि किसी को भनक न लगे। स्थानीय मान्यताओं और किंवदंतियों के अनुसार, इन डकैतों की आस्था देवी-देवताओं में बहुत गहरी हुआ करती थी। उन्हें पूरा विश्वास था कि मां के दरबार में हाजिरी लगाने और सच्चे मन से प्रार्थना करने से उनकी हर मनोकामना पूरी होगी। हथियारों के साये में जीने वाले ये लोग मंदिर के प्रांगण में आकर अपनी तमाम क्रूरता को भूल जाते थे और पूरी विनम्रता के साथ मां की आराधना में लीन हो जाते थे।
इन कहानियों में सबसे खास बात यह मानी जाती है कि ये डकैत केवल दर्शन करने ही नहीं आते थे, बल्कि अपनी विजय की कामना के साथ मंदिर में विशेष रूप से घंटा भी अर्पित करते थे। राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंदजती के पुराने संस्मरणों के अनुसार, लगभग चार दशक पहले रूपा डकैत भी उनके सामने इसी मंदिर में मां के दर्शन करने के लिए आया था। जानकारों का यह भी मानना है कि अपराध की दुनिया में रहने वाले ये लोग भी आखिरकार इंसान ही थे और समाज के बाकी लोगों की तरह उनके मन में भी देवी-शक्ति के प्रति अटूट श्रद्धा और भय दोनों मौजूद थे।
कैलादेवी मंदिर ट्रस्ट से जुड़े संतोष मामा भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि बीहड़ के इन अपराधियों के मंदिर आने से जुड़े कई किस्से काफी मशहूर रहे हैं। उनके अनुसार, चंबल के सक्रिय डकैतों के देवी के उपासک होने की बात लंबे समय से चर्चा का विषय रही है और इसी वजह से देश के इस प्रसिद्ध शक्तिपीठ में उनके आने और घंटा चढ़ाने की परंपरा से जुड़ी बातें आज भी बुजुर्गों द्वारा बड़े चाव से सुनाई जाती हैं। इस तरह की घटनाएं इस बात का प्रमाण देती हैं कि बीहड़ के उन दिनों में भी आस्था का प्रभाव कितना गहरा हुआ करता था।
करौली का यह प्रतिष्ठित मंदिर उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण और बड़े आस्था केंद्रों में शुमार किया जाता है, जहां पूरे साल भर देश के कोने-कोने से श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। विशेष तौर पर शारदीय और चैत्र नवरात्र के पवित्र अवसरों पर यहां भारी संख्या में भक्तजन अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। मंदिर की धार्मिक महत्ता जितनी अधिक है, उतनी ही इससे जुड़ी पुरानी जनश्रुतियां और लोक कथाएं भी प्रसिद्ध हैं, जिनमें चंबल के डकैतों के आने का यह अध्याय आज भी स्थानीय संस्कृति और इतिहास का एक अनोखा हिस्सा बना हुआ है।















