धनतेरस का त्योहार आते ही देश भर में लोग सोना, चांदी, बर्तन और नए आभूषण खरीदने की तैयारी में जुट जाते हैं। इस दिन कीमती धातुओं को घर लाकर सुख-समृद्धि की कामना करने की परंपरा आम है। हालांकि, राजस्थान के मेवाड़ अंचल में इस पर्व को मनाने की एक बेहद प्राचीन और अनोखी रीति आज भी पूरी निष्ठा के साथ जीवंत है। भीलवाड़ा और उसके आसपास के इलाकों में महिलाएं कीमती धातुओं के बजाय पीली मिट्टी को ही धन और माता लक्ष्मी का स्वरूप मानकर अपने घरों में लेकर आती हैं। सदियों पुरानी यह लोक परंपरा न केवल हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को संभालकर रखती है, बल्कि सादगी और प्राकृतिक पवित्रता का एक अनूठा संदेश भी देती है।
सुबह-सवेरे होती है अनुष्ठान की शुरुआत
धनतेरस के दिन सूरज निकलने से भी काफी पहले गांवों और कस्बों की महिलाएं एकत्र हो जाती हैं। वे अपने साथ खाली बर्तन, कुमकुम, अगरबत्ती, दीपक, धान और सिक्के लेकर घरों से बाहर निकलती हैं। एक निश्चित स्थान पर पहुंचने के बाद महिलाएं पूरी श्रद्धा के साथ पीली मिट्टी की पूजा-अर्चना करती हैं। माता लक्ष्मी का स्मरण करते हुए यह प्रार्थना की जाती है कि वे धन, धान्य और समृद्धि के रूप में उनके निवास स्थान में प्रवेश करें। पूजा संपन्न होने के बाद महिलाएं इस मिट्टी को अपने साथ लाए बर्तनों में भरती हैं और वापस अपने घर की ओर प्रस्थान करती हैं। ऐसी गहरी लोक मान्यता है कि जो महिला जितनी अधिक श्रद्धा और मात्रा में इस मिट्टी को घर लाती है, उसके घर में उतनी ही ज्यादा बरकत और सुख-समृद्धि का वास होता है।
विश्राम स्थल पर पूजा और स्वस्तिक का निर्माण
घर की तरफ लौटते वक्त महिलाएं रास्ते में एक खास जगह पर थोड़ी देर के लिए विश्राम करती हैं। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इसी स्थान पर माता लक्ष्मी को विश्राम कराया जाता है। वहां कुमकुम की सहायता से एक पवित्र स्वस्तिक का निर्माण किया जाता है और माता की विधि-विधान से आरती उतारी जाती है। स्थानीय निवासी पूजा कुमारी सांखला के मुताबिक, पुराने समय में जब पक्के मकान हुआ नहीं करते थे, तब मिट्टी के कच्चे घरों में ही जीवन और खुशहाली का असली वास माना जाता था। इसी मिट्टी से अन्न पैदा होता है और यही इंसानी जीवन का मूल आधार है। यही कारण है कि पीली मिट्टी को अत्यंत पवित्र मानते हुए इसे साक्षात माता लक्ष्मी का रूप मानकर पूजा जाता है।
घर का शुद्धिकरण और तिजोरी में स्थान
इस पीली मिट्टी को घर लाने के बाद इससे पूरे आंगन को लीपा जाता है, जिससे समस्त घर का शुद्धिकरण हो जाता है। दीपावली के पांच दिनों तक चलने वाले इस महापर्व के दौरान लक्ष्मी पूजन में इस मिट्टी का विशेष रूप से उपयोग और महत्व होता है। पूजन प्रक्रिया पूरी होने के बाद इस मिट्टी के एक छोटे से अंश को घर की तिजोरी या पैसे रखने के मुख्य स्थान पर संभालकर रख दिया जाता है। लोक आस्था कहती है कि यह पीला सोना परिवार में अच्छे स्वास्थ्य, मानसिक शांति और धन-धान्य की कभी कोई कमी नहीं होने देता है। मेवाड़ की महिलाएं इस विशिष्ट परंपरा को बेहद गर्व के साथ निभाती आ रही हैं और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी इस समृद्ध लोक संस्कृति से जोड़कर रख रही हैं।























